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सौर तूफ़ान क्या है और क्या इससे धरती पर बिजली गुल हो सकती है
सूर्य की सतह पर तेज़ हलचल हो रही है, जिसकी वजह से इस साल का सबसे बड़ा सोलर फ़्लेयर पैदा हुआ. इस घटना को कैमरे में क़ैद किया है अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के 'सोलर डायनैमिक्स ऑब्ज़र्वेटरी' ने.
अत्यधिक हलचल के दौरान सूर्य से चार्ज्ड पार्टिकल्स का लगातार प्रवाह धरती से टकराता है, जिसे सोलर विंड के नाम से भी जाना जाता है.
इस घटना को सौर तूफ़ान कहते हैं, जो धरती पर टेक्नोलॉजी को प्रभावित कर सकता है और यहां तक कि पावर ग्रिड को भी ठप कर सकता है.
इसके अलावा अंतरिक्ष में मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों पर भी ये असर डाल सकता है. हालांकि धरती पर मौजूद इंसानों के लिए यह नुकसानदेह नहीं है.
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सोलर फ़्लेयर क्या है?
सूर्य की सतह पर सौर तूफ़ान का पैदा होना एक सामान्य परिघटना है. यह तब होता है जब सूर्य पर भारी विस्फ़ोटों से सोलर फ़्लेयर यानी आग के गोले और कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमईज़) के रूप में आवेशित (चार्ज्ड) किरणें उत्सर्जित होती हैं.
सीएमई असल में सूर्य की सबसे बाहरी परत कोरोना से निकलने वाले आग के बड़े-बड़े गोले होते हैं.
सोलर फ़्लेयर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियशन है जो प्रकाश की गति से निकलता है और महज आठ मिनट में ही पृथ्वी पर पहुंच जाता है.
सीएमईज़ के विशाल विस्फोट से निकली ऊर्जा एक घंटे में दसियों लाख किलोमीटर तक की यात्रा करती है.
पृथ्वी पर सौर तूफ़ान अलग-अलग तीव्रता में पहुंचता है.
इसी ऊर्जा की वजह से अक्सर धरती के आसमान में चमकीले प्रकाश देखे जाते हैं, जिन्हें ऑरोरा लाइट्स कहा जाता है. इन्हें नॉर्दर्न लाइट्स या सदर्न लाइट्स के नाम से भी जाना जाता है.
पृथ्वी पर सौर तूफ़ान का क्या असर होता है?
नासा के अनुसार, फ़्लेयर्स और सौर विस्फोट, धरती पर रेडियो कम्युनिकेशन, इलेक्ट्रिसिटी पॉवर ग्रिड और नेविगेशन सिग्नलों पर असर डाल सकते हैं.
साल 2017 में इसी तरह से सूर्य की सतह पर दो विशाल सोलर फ़्लेयर पैदा हुईं जिनसे जीपीएस नेविगेशन सिस्टम जैसे उपकरण बाधित हुए थे.
उससे पहले ऐसी ही एक घटना फ़रवरी 2011 में हुई थी जब एक शक्तिशाली सोलर फ़्लेयर ने पूरे चीन में रेडियो कम्युनिकेशन को बाधित कर दिया था.
बल्कि इससे भी पहले 1989 में, एक सोलर फ़्लेयर के कारण कनाडा के क्यूबेक प्रांत में नौ घंटे तक ब्लैक आउट रहा और इससे दसियों लाख लोग प्रभावित हुए थे.
वर्ष 1859 में सूर्य की सतह पर एक विशाल विस्फोट हुआ था जिसने एक जियोमैग्नेटिक तूफ़ान को पैदा किया और इसकी वजह से विक्टोरियन रेलवे का सिग्नलिंग सिस्टम और टेलीग्राफ़ लाइनें प्रभावित हुई थीं.
लेकिन सूर्य की सतह पर होने वाली ऐसी हलचल आज भी ख़तरा बनी हुई है.
लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में चेताया गया है कि ब्रिटेन के रेल नेटवर्क को एक ऐसे तूफ़ान के लिए तैयार रहना चाहिए जो कभी कभार होने के बावजूद इसके नेटवर्क को बाधित कर सकता है.
स्पेस डॉट कॉम के मुताबिक, सौर तूफ़ान की वजह से मानव जीवन को ख़तरा होने की आशंका बहुत ही कम है. मगर इनके पृथ्वी की मैग्नेटिक फ़ील्ड के साथ टकराने पर हलचल बढ़ सकती है.
सौर तूफ़ान का असर अंतरिक्ष के मौसम पर भी पड़ता है. जहां करीब 7 हज़ार 800 सैटेलाइट्स हैं, जिनमें से 50 से ज़्यादा भारत की हैं.
सौर तूफ़ान कब-कब आते हैं?
सौर तूफ़ान को जानने से पहले हमें ये समझना होगा कि सूर्य की बनावट कैसी है. असल में यह विद्युतीय आवेशित गर्म गैस का गोला है और ये गैस घूमती रहती है, जिससे एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र पैदा होता है.
यह क्षेत्र एक साइकिल से होकर गुजरता है जिसे 'सोलर साइकिल' के नाम से जाना जाता है. इसी कारण सूर्य की सतह पर नियमित रूप से शांत और तूफ़ानी हलचलों के दौर आते रहते हैं.
हर 11 साल में, यानी सोलर साइकिल के अंतिम चरण में सूर्य के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के चुंबकीय क्षेत्र आपस में बदलते रहते हैं.
नासा और यूएस ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) द्वारा सह-प्रायोजित विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह के अनुसार, मौजूदा साइकिल दिसंबर 2019 में शुरू हुआ था. इसे 'सोलर साइकिल 25' कहा जाता है.
सोलर साइकिल की शुरुआत में सूर्य की सतह पर बहुत कम हलचल होती है. इस चरण को 'सोलर मिनिमम' कहते हैं और इस दौरान सूर्य पर सबसे कम सनस्पॉट्स या चमकीले धब्बे होते हैं और इसी समय इस विशाल तारे की गतिविधि का अध्ययन करने का मौका मिलता है.
सूर्य की सतह पर जैसे-जैसे हलचल बढ़ती है, सनस्पॉट्स की संख्या भी बढ़ती है.
सोलर साइकिल के बीच के समय को 'सोलर मैक्सिमम' के रूप में जाना जाता है. इस दौरान सबसे अधिक सनस्पॉट (जिसे डार्कस्पॉट भी कहते हैं) दिखते हैं और फिर सूर्य के चुंबकीय ध्रुव अपनी जगह बदलते हैं.
नासा और एनओओए का कहना है कि सूर्य अपनी मौजूदा साइकिल में 'सोलर मैक्सिमम' काल तक पिछले साल ही पहुंच गया था.
सनस्पॉट में प्रकाश और ऊर्जा के विशाल विस्फोट होते हैं, जो काले धब्बे जैसे दिखते हैं क्योंकि वे आस पास के वातावरण के मुकाबले ठंडे होते हैं.
अधिकांश सनस्पॉट्स का आकार पृथ्वी या उससे भी बड़ा होता है.
अपनी 11 साल की साइकिल के दौरान, सोलर मैक्सिमम के चरम पर सौर आंधी के पैदा होने की अधिक आशंका होती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित