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यूपीआई फ्री, फिर पेमेंट ऐप्स कैसे कमा रहे करोड़ों का मुनाफ़ा- पैसा वसूल
गूगल पे और फोन पे जैसी ऐप्स पेमेंट पर चार्ज नहीं लेतीं, फिर भी ये सालाना हज़ारों करोड़ कमा लेते हैं.
क्या है इनका बिज़नेस मॉडल और कमाई का ज़रिया, पैसा वसूल में आज यही समझने की कोशिश.
प्रेज़ेंटर: प्रेरणा
प्रोड्यूसर: दिनेश उप्रेती
वीडियो: वर्षा चौधरी
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI के जरिए पेमेंट करना न सिर्फ आसान है बल्कि इसके लिए यूजर्स को पैसा खर्च नहीं करना होता है. यह सुविधा पूरी तरह से फ्री है. इसके बावजूद गूगल-पे और फोन-पे ने पिछले साल में मिलकर हज़ारों करोड़ रुपये की कमाई की.
लोग हैरान हैं कि आखिर फ्री में यूज होने वाले इन डिजिटल ऐप्स ने बिना किसी प्रोडक्ट की बिक्री के इतना पैसा कैसे कमाया? अगर आप भी यह ही सोच रहे हैं तो बता दें कि इन डिजिटल दिग्गज ऐप की कमाई एक अनोखे बिजनेस मॉडल से हुई है, जो ट्रस्ट, स्केल और इनोवेशन पर टिका है.
आइस वीसी के फाउंडिंग पार्टनर मृणाल झवेरी ने लिक्डइन पर एक पोस्ट शेयर किया जिसमें उन्होंने गूगल पे और फोन पे के रेवेन्यू मॉडल के बारे में डिटेल से बताया है. टेकसर्किल नामक वेबसाइट ने भी इस बारे में अहम जानकारी शेयर की है.
इनसे होती है कमाई
वॉयस-ऑपरेटिंग स्पीकर सर्विस से कमाई
अगर आपने किसी दुकान पर ये मैसेज सुना है... फोन पे पर 100 रुपये मिले... तो ये सिर्फ़ एक नोटिफिकेशन नहीं है बल्कि पैसे बनाने का एक तरीका भी है. फोनपे, पेटीएम और इन जैसी दूसरी कंपनियां इन वॉयस स्पीकर्स को दुकानदारों को रेंट पर देती हैं और दुकानदारों से रेंट के रूप में हर महीने 100 रुपये तक वसूले जाते हैं. दिखने में ये रकम छोटी लग सकती है, लेकिन वॉल्यूम यानी दुकानों की तादाद देखें तो ये आंकड़ा लाखों में जाएगा और इस तरह कमाई भी करोड़ों रुपये में पहुँच जाएगी. हर बार पेमेंट की कन्फर्मेशन ग्राहक और दुकानदार को तो संतुष्ट करती ही है, इससे ब्रैंड क्रेडिबिलिटी बढ़ाने में भी मदद मिलती है.
दूसरा, स्क्रैच कार्ड्स से कमाई
यह कंपनियां स्क्रैच कार्ड्स से भी कमाई कर रही हैं. यह कार्ड्स कस्टमर्स को कैशबैक या कूपन का लालच देकर लुभाते हैं. हालांकि, यह महज ग्राहकों को खुश करने के लिए नहीं दिए जाते, बल्कि यह ब्रांड्स के लिए विज्ञापन का तरीका भी है. ब्रांड्स अपनी विजिबलिटी और लोगों तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए इन कार्ड्स के लिए पेमेंट करते हैं. इससे गूगल-पे और फोन-पे को दोहरा फायदा होता है.
सॉफ्टवेयर और लोन से मुनाफा
इन कंपनियों ने UPI की विश्वसनीयता को सॉफ्टवेयर ए ए सर्विस (SaaS) लेयर में तब्दील कर दिया है. इनके जरिए छोटे-छोटे बिजनेसमैन के लिए GST हेल्प, इनवॉइस मेकर और माइक्रो-लोन जैसी फैसलिटीज उपलब्ध करवाई जा रही हैं. यूपीआई बेसिक ढांचा बस एक एट्रैक्शन है. इसकी रियल कमाई सॉफ्टवेयर और फाइनेंशियल सर्विस से हो रही है. इस मॉडल में एडमिसिबल कॉस्ट जीरो है, जो इसे और ज्यादा इफेक्टिव बनाती है.
क्या यूपीआई हमेशा फ्री रहेगा?
सवाल ये है कि क्या आम कस्टमर्स के लिए यूपीआई हमेशा के लिए फ्री रहेगा?... तो भारतीय रिज़र्व बैंक यानी आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा का हाल का बयान संकेत दे रहा है कि शायद आने वाले समय में ये सेवा फ्री न रहे.
आरबीआई गवर्नर ने कहा है- यूपीआई सिस्टम अभी यूजर्स के लिए फ्री है. पेमेंट्स इंफ्रास्ट्रक्चर को सपोर्ट करने वाले बैंकों और अन्य स्टॉकहोल्डर्स को सरकार सब्सिडी देकर लागत वहन कर रही है. ज़ाहिर है कुछ लागत तो चुकानी ही होगी.
गवर्नर ने कहा कि किसी भी सर्विस के सस्टेनबल होने के लिए ज़रूरी है कि उसकी कॉस्ट पेमेंट यूजर्स की ओर से की जानी चाहिए.
मतलब आरबीआई गवर्नर का इशारा साफ़ है... आने वाले दिनों में यूपीआई के लिए जेब कुछ ढीली करनी पड़ सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित