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पाकिस्तान की सेना को अपने ही लोगों को उठाने की आदत लगी- ब्लॉग
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, लेखक-पत्रकार, बीबीसी पंजाबी के लिए
भारत, रूस, अमेरिका, चीन या जर्मनी जैसे किसी भी देश में आम तौर पर लोगों को पता भी नहीं होता है कि उनकी ख़ुफ़िया एजेंसी का प्रमुख कौन है.
लेकिन पाकिस्तान में उल्टा हिसाब है. हमें न केवल आने वाले प्रमुख के बारे में पता होता है बल्कि जाने वाले की सारी हरकतों का भी पता चल जाता है.
वैसे तो इंटेलिजेंस काम चुपचाप किया जाता है. भेष बदलकर किया जाता है लेकिन पाकिस्तान में आईएसआई प्रमुख के पोस्टर खंभों पर लगे होतें हैं.
उनके नाम के नारे लगाए जाते हैं और उनके नाम पर सड़कों पर ढोल भी बजाए जाते हैं.
अब हमारे पुराने आईएसआई प्रमुख फै़ज़ हमीद साहब को उनकी ही सेना ने उठा लिया है और साथ ही उनका कोर्ट मार्शल करने की भी घोषणा कर दी है.
फैज़ हमीद जब चीफ़ थे, उस समय न केवल उन्होंने पूरा देश संभाला हुआ था बल्कि ऐसा लगता था कि पूरी दुनिया भी उन्होंने ही संभाली हुई है.
आपको याद होगा कि जब अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका भागा तब फ़ैज़ हमीद साहब एक योद्धा की तरह काबुल पहुंचे थे.
वहाँ उन्होंने इंटरकॉन्टिनेंटल होटल में खड़े होकर कहवे पीते और कैमरे की आँख में आँख डाल कर दुनिया को बताया, "निराश होने की ज़रूरत नहीं है. सब ठीक हो जाएगा."
'मैं हूं ना' टाइप का माहौल उन्होंने बना दिया और दुनिया भी शांत हो गई.
अपने ही उठाए जाने लगे
यहाँ पाकिस्तान में हमें बताया गया था कि आईएसआई प्रमुख के बाद वह देश के सेना प्रमुख बनेंगे.
उसके बाद ऐसा डंडा चलेगा कि जो लोग अब तक सीधे नहीं हुए हैं, वे भी सीधे हो जाएंगे. वह चीफ़ तो नहीं बने, सिर्फ़ शादियों पर रौनक लगाई.
अब सेना ने उठा लिया है और आरोप भी ऐसे-ऐसे हैं, जिन पर इंसान को हँसी भी आती है और डर के मारे अपने कानों को हाथ लगा ले.
कहते हैं कि जिसे आप क़ाबिल समझ रहे थे वो असल में मूक-बधिर गुंडा है, जो अपना क़ब्ज़ा गैंग चलाता था, लोगों की ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करता था.
अब पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान की सेना देश की सबसे बड़ी प्रॉपर्टी डीलर भी है. इस बिज़नेस में छोटे-मोटे क़ब्ज़े करने ही पड़ते हैं. वैसे भी लोगों ने तराना तो पहले ही बनाया हुआ है- वतन के सजीले जवानों सारे रक़बे तुम्हारे लिए हैं.
दूसरा जनरल फै़ज़ पर आरोप है कि वह इमरान ख़ान के साथ मिलकर राजनीति कर रहे हैं.
अब यह काम भी पूरी सेना मिल कर ही करती रही है. वैसे भी आईएसआई प्रमुख राजनीति न करें तो फिर और क्या करें?
यह तो कुछ ऐसा आरोप है कि मस्जिद के इमाम को कहा जाए कि वह अज़ान क्यों देते हैं, नाई खतना क्यों करता है या शायर ग़ज़ल क्यों लिखता है?
आईएसआई माने या न माने लेकिन वे ख़ुद भी राजनीति करते हैं और राजनीति करवाते भी हैं.
फिर जनरल फै़ज़ हमीद ने ऐसी कौन सी राजनीति की कि देश के इतिहास में पहली बार आईएसआई प्रमुख का कोर्ट मार्शल किया जा रहा है. ऐसा भी कहा जाता है कि रिटायर होकर जनरल फै़ज़ हमीद इमरान ख़ान को उल्टी सीधी सलाह देते थे.
इमरान ख़ान का याराना
सब जानते हैं कि सेना का इमरान ख़ान से याराना था और यह याराना कुछ ऐसा निकला, जिसके बारे में कहा जाता है- 'लाई बेकद्रां नल यारी कि टूट गई तड़क करके'
और अब इमरान ख़ान ग़ुस्से में सेना के गले पड़ गए हैं.
जब हमारे पड़ोस में किसी के घर में चोरी हो जाए तो आमतौर पर पड़ोस के लोग यही कहते थे कि उनकी कुत्ती चोरों के साथ मिली हुई है.
भले ही कुत्ती थक गई हो और सो गई हो. आमतौर पर चौकीदारों पर भी आरोप लगता है कि वे चोरों से मिले हुए हैं.
लेकिन अगर हमारा चौकीदारों का सरदार, हमारे जासूसों का प्रधान जासूस, कोई चोर, कोई क़ब्ज़ा गैंग वाला, कोई षडयंत्रकारी निकले तो हम किसकी माँ को मौसी कहें?
जनरल फ़ैज़ हमीद को उठाने का एक और कारण भी हो सकता है.
ख़ुफ़िया एजेंसियों पर आरोप लगता रहा है कि वे अपने मुखबिरों का अगवा कर और उन्हें ग़ायब कर देती हैं.
ये काम बलूचिस्तान में शुरू हुआ था और फिर केपी में भी लोगों को उठाया गया, सिंध में से ग़ायब किए गए और अब पंजाब से भी लोगों को उठाया जा रहा है.
हो सकता है कि सेना को आदमी उठाने की ऐसी आदत हो गई हो कि अब वह अपने ही आदमी उठाने लगी हो. जो कल उठाते थे, अब वह खुद उठ रहे हैं. यह गंदा काम है, क्रूर काम है. दुआ करें कि यह काम रुक जाए और एक बार फिर सब ठीक हो जाए.
रब राखा!
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित