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'गोल्डन ब्लड' ग्रुप क्या है, जिसे लैब में तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं वैज्ञानिक
- Author, जैस्मीन फ़ॉक्स-स्केली
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
दुनिया भर के हर 60 लाख लोगों में सिर्फ़ एक इंसान का ब्लड ग्रुप आरएच नल (Rh null) होता है. अब रिसर्चर इस ब्लड ग्रुप को लैब में तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि लोगों की जान बचाई जा सके.
ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न यानी मरीज़ को ब्लड चढ़ाने की प्रक्रिया ने मॉडर्न मेडिसिन को बदल दिया है. अगर हम कभी घायल हो जाएं या किसी मेडिकल इमरजेंसी में सर्जरी की ज़रूरत पड़े, तो दूसरों का डोनेट किया गया ब्लड जान बचाने में मददगार होता है.
लेकिन हर किसी को ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न का फ़ायदा नहीं मिल पाता. ख़ासकर दुर्लभ ब्लड ग्रुप वाले लोगों को मैचिंग ब्लड पाने में काफ़ी संघर्ष करना पड़ता है.
सबसे दुर्लभ ब्लड ग्रुप्स में से एक, आरएच नल ब्लड ग्रुप, दुनिया में अब तक सिर्फ़ 50 लोगों में पाया गया है. ऐसे में इस ब्लड ग्रुप वाले लोगों को ज़रूरत पड़े तो मैचिंग ब्लड मिलने की संभावना बहुत कम होती है.
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आरएच नल ब्लड ग्रुप वाले लोगों को खु़द अपना ब्लड फ़्रीज़ कर जमा करने को कहा जाता है.
लेकिन, इस ब्लड ग्रुप की कई दूसरी वजहों से भी काफ़ी अहमियत है. मेडिकल और रिसर्च कम्युनिटी में इसे कभी-कभी 'गोल्डन ब्लड' कहा जाता है.
इसकी वजह ये है कि आरएच नल ब्लड ग्रुप यूनिवर्सिल ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न को संभव बनाने में मदद कर सकता है. इसके लिए वैज्ञानिक उन प्रतिरक्षा संबंधी समस्याओं पर काबू पाने के तरीके खोज रहे हैं, जिनके कारण डोनेट किए गए ब्लड का इस्तेमाल करने में समस्याएं आती हैं.
ब्लड क्लासिफ़िकेशन सिस्टम कई तरह के होते हैं, जिनमें से एक एबीओ है.
ब्लड को ग्रुपों में कैसे बांटा जाता है?
आपके शरीर में बह रहे ब्लड का ग्रुप, आपकी रेड ब्लड सेल्स की सतह पर कुछ ख़ास मार्कर्स की मौजूदगी या गैर-मौजूदगी के आधार पर तय होता है.
ये मार्कर, जिन्हें एंटीजन कहा जाता है, प्रोटीन या शुगर से बने होते हैं जो कोशिका की सतह से बाहर निकलते हैं और शरीर का इम्यून सिस्टम इन्हें पहचान सकता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल में सेल बायॉलजी के प्रोफ़ेसर ऐश टॉय कहते हैं, "अगर आपको ऐसा ब्लड चढ़ाया जाता है जिसमें आपके ब्लड से अलग एंटीजन होते हैं, तो शरीर उसके ख़िलाफ़ एंटीबॉडी बनाएगी और उस पर हमला करेगी."
"अगर आपको वह ब्लड दोबारा चढ़ाया जाता है, तो यह जानलेवा हो सकता है."
दो ब्लड ग्रुप सिस्टम जो सबसे बड़ी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया देते हैं, वे हैं एबीओ और रीसस (आरएच). जिसका ब्लड ग्रुप ए होता है, उसके ब्लड सेल्स की सतह पर ए एंटीजन होते हैं, बी ब्लड ग्रुप वाले इंसान के ब्लड सेल्स की सतह पर बी एंटीजन होते हैं.
एबी ब्लड ग्रुप में ए और बी दोनों एंटीजन होते हैं, जबकि ओ ब्लड ग्रुप में ए और बी में से कोई भी एंटीजन नहीं होता. हर ग्रुप या तो आरएच पॉज़िटिव या आरएच निगेटिव हो सकता है.
ओ निगेटिव ब्लड ग्रुप वालों को यूनिवर्सल डोनर कहा जाता है, क्योंकि उनके ब्लड में न तो ए, न ही बी, और न ही आरएच एंटीजन होते हैं. हालांकि, यह काफ़ी सरल व्याख्या है.
अक्तूबर 2024 तक, 47 ब्लड ग्रुप और 366 तरह के एंटीजन के बारे में पता चला है. इसका मतलब है कि ओ निगेटिव ब्लड चढ़ाए जाने वाले व्यक्ति में किसी भी दूसरे एंटीजन की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया हो सकती है - हालांकि कुछ एंटीजन दूसरों की तुलना में अधिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया देते हैं.
वहीं 50 से अधिक आरएच एंटीजन होते हैं. जब लोग आरएच निगेटिव होने की बात करते हैं, तो वे आरएच(डी) एंटीजन की बात करते हैं, लेकिन उनके रेड ब्लड सेल्स में इसके अलावा भी दूसरे आरएच प्रोटीन होते हैं.
दुनिया भर में आरएच एंटीजन भी अलग-अलग तरह के होते हैं, जिससे सही डोनर मैच खोजना मुश्किल हो जाता है.
हालांकि, आरएच नल ब्लड वाले लोगों में सभी 50 आरएच एंटीजन नहीं होते. ऐसे लोगों को कोई दूसरा ब्लड ग्रुप नहीं चढ़ाया जा सकता, लेकिन सभी आरएच ब्लड टाइप के लिए आरएच नल ब्लड ग्रुप सही होता है.
इस तरह ओ टाइप और आरएच नल ब्लड काफ़ी कीमती हैं क्योंकि ज़्यादातर लोगों को ये ब्लड ग्रुप चढ़ाए जा सकते हैं.
इमरजेंसी में जब किसी मरीज़ का ब्लड ग्रुप नहीं पता होता है, तो ओ टाइप आरएच नल ब्लड दिया जा सकता है क्योंकि इससे एलर्जिक रिएक्शन का रिस्क कम होता है.
यही वजह है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक इस "गोल्डन ब्लड" जैसा ब्लड बनाने के तरीके खोज रहे हैं.
प्रोफ़ेसर टॉय कहते हैं, "आरएच (एंटीजन) एक बड़ी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को ट्रिगर करते हैं और इसलिए अगर आपके ब्लड में इनमें से कोई भी नहीं है, तो आरएच के संदर्भ में प्रतिक्रिया करने के लिए कुछ भी नहीं है."
"अगर आप टाइप ओ और आरएच नल हैं, तो यह लगभग यूनिवर्सल हैं. लेकिन अभी भी ऐसे दूसरे ब्लड ग्रुप हैं जिन पर आपको विचार करना होगा."
आरएच नल ब्लड
हालिया रिसर्च से पता चला है कि आरएच नल ब्लड जेनेटिक म्यूटेशन के कारण होता है जो लाल रक्त कोशिकाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एक प्रोटीन को प्रभावित करते हैं, जिसे आरएच एसोसिएटेड ग्लाइकोप्रोटीन या आरएचएजी कहा जाता है.
ये म्यूटेशन इस प्रोटीन के आकार को छोटा कर देते हैं या बदल देते हैं, जिससे यह दूसरे आरएच एंटीजन्स में गड़बड़ी कर देता है.
2018 की एक स्टडी में, यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल के प्रोफ़ेसर टॉय और उनके सहयोगियों ने लैब में आरएच नल ब्लड को फिर से तैयार किया. ऐसा करने के लिए उन्होंने अपरिपक्व लाल रक्त कोशिकाओं से लैब में कुछ कोशिकाएं विकसित कीं.
फिर टीम ने जीन एडिटिंग तकनीक क्रिस्पर-कैस9 का इस्तेमाल करके उन पांच ब्लड ग्रुप सिस्टम के एंटीजन के लिए कोडिंग करने वाले जीन्स को हटा दिया जिनके कारण ज़्यादातर ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न में दिक्कतें आती हैं.
इसमें एबीओ और आरएच एंटीजन, साथ ही केल, डफी और जीपीबी नाम के दूसरे एंटीजन शामिल थे.
प्रोफ़ेसर टॉय कहते हैं, "हमने यह पता लगाया कि अगर हम उन पांच ब्लड ग्रुप सिस्टम के एंटीजन के लिए कोडिंग करने वाले जीन्स को हटा दें, तो एक ऐसी कोशिका बनेगी, जो हर तरह के ब्लड ग्रुप के लिए अनुकूल होगी."
इस तरह की रक्त कोशिकाएं सभी प्रमुख कॉमन ब्लड ग्रुप के साथ-साथ आरएच नल और बॉम्बे फे़नोटाइप जैसे दुर्लभ ब्लड ग्रुप वाले लोगों के लिए भी सही होगी. बॉम्बे फे़नोटाइप ब्लड ग्रुप हर 40 लाख लोगों में से एक में पाया जाता है.
इस ब्लड ग्रुप वाले लोगों को ओ, ए, बी या एबी ब्लड नहीं दिया जा सकता.
हालांकि, जीन एडिटिंग तकनीकों के इस्तेमाल पर विवाद है और दुनिया के कई हिस्सों में इस पर कड़ा नियंत्रण है, जिसका मतलब है कि इस तरह का ब्लड उपलब्ध होने में कुछ समय लग सकता है.
इसे मंज़ूरी दिए जाने से पहले कई दौर के क्लीनिकल ट्रायल और टेस्टिंग से गुजरना होगा.
इस बीच, प्रोफ़ेसर टॉय ने एक स्पिन-आउट कंपनी, स्कार्लेट थेरेप्यूटिक्स की स्थापना की है, वो इसके को-फ़ाउंडर हैं, जो आरएच नल सहित दुर्लभ ब्लड ग्रुप वाले लोगों से ब्लड जुटा रही है.
टीम को उम्मीद है कि उस ब्लड का इस्तेमाल कर ऐसे रेड ब्लड सेल्स लैब में तैयार किए जा सकेंगे, जिनका इस्तेमाल ज़रूरत पड़ने पर दुर्लभ ब्लड ग्रुप वाले लोगों के लिए हो सके.
प्रोफ़ेसर टॉय को उम्मीद है कि वे जीन एडिटिंग का इस्तेमाल किए बिना लैब में दुर्लभ ब्लड के बैंक बना पाएंगे, हालांकि यह तकनीक भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
वह कहते हैं, "अगर हम इसे जीन एडिटिंग के बिना कर सकते हैं, तो बहुत अच्छा है, लेकिन एडिटिंग हमारे लिए एक विकल्प है."
"हम जो कर रहे हैं, उसका एक हिस्सा यह है कि हम डोनर्स को सावधानी से सेलेक्ट कर रहे हैं ताकि उनके सभी एंटीजन ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के लिए अनुकूल बन सकें. फिर शायद ही हमें इसे सभी के लिए अनुकूल बनाने के लिए जीन एडिटिंग करनी पड़े."
2021 में, अमेरिका के मिल्वौकी स्थित वर्सिटी ब्लड रिसर्च इंस्टीट्यूट के इम्यूनोलॉजिस्ट ग्रेगरी डेनोमे और उनके सहयोगियों ने क्रिस्पर-कैस9 जीन एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल करके मानव प्रेरित प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल से आएच नल सहित कस्टमाइज़्ड दुर्लभ ब्लड टाइप बनाया था.
इन स्टेम कोशिकाओं में भ्रूणीय स्टेम कोशिकाओं जैसे गुण होते हैं और सही परिस्थितियों में मानव शरीर की किसी भी कोशिका में बदलने की क्षमता रखते हैं.
दूसरे वैज्ञानिक एक अलग तरह की स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो पहले से ही ब्लड सेल्स में बदलने के लिए प्रोग्राम की गई हैं, लेकिन अभी तक यह तय नहीं किया जा सका है कि वे किस प्रकार की हैं.
उदाहरण के लिए, कनाडा के क्यूबेक स्थित लावल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने हाल ही में ए पॉजिटिव ब्लड डोनर्स से ब्लड स्टेम कोशिकाएं निकालीं.
फिर उन्होंने क्रिस्पर-कैस9 तकनीक से ए और आरएच एंटीजन्स के लिए कोडिंग करने वाले जीन्स को हटा दिया, जिससे ओ आरएच नल अपरिपक्व लाल रक्त कोशिकाएं तैयार हुईं.
स्पेन के बार्सिलोना के शोधकर्ताओं ने भी हाल ही में एक आरएच नल ब्लड डोनर से स्टेम कोशिकाएं लीं और क्रिस्पर-कैस9 का इस्तेमाल करके उनके ब्लड को टाइप ए से टाइप ओ में बदल दिया, जिससे ये अधिक यूनिवर्सल हो गया.
फिर भी, इन प्रभावशाली प्रयासों के बावजूद, यह कहना ज़रूरी है कि लैब में विकसित आर्टिफ़िशियल ब्लड का ऐसे पैमाने पर निर्माण करना जहां लोग इसका इस्तेमाल कर सकें, अभी भी काफ़ी दूर है.
एक कठिनाई स्टेम कोशिकाओं को परिपक्व लाल रक्त कोशिकाओं में विकसित करना है.
शरीर में, लाल रक्त कोशिकाएं यानी रेड ब्लड सेल्स बोन मैरो में स्थित स्टेम कोशिकाओं से निकलती हैं, जो उनके विकास को गाइड करने वाले जटिल संकेत पैदा करती हैं. इसे लैब में तैयार करना कठिन है.
ट्रांसफ़्यूज़न मेडिसिन में विशेषज्ञता वाली एक हेल्थकेयर कंपनी, ग्रिफ़ोल्स डायग्नोस्टिक सॉल्यूशंस में मेडिकल अफ़ेयर्स के डायरेक्टर डेनोमे कहते हैं,
"एक अतिरिक्त समस्या यह है कि आरएच नल या किसी दूसरे नल ब्लड ग्रुप को तैयार करते समय, लाल रक्त कोशिकाओं की वृद्धि और परिपक्वता बाधित हो सकती है."
"ख़ास ब्लड ग्रुप के जीन्स को तैयार करने से कोशिका झिल्ली क्षतिग्रस्त हो सकती है, या कोशिका संवर्धन (सेल कल्चर) में लाल रक्त कोशिकाओं के ठीक से उत्पादन में कमी आ सकती है."
फ़िलहाल, प्रोफ़ेसर टॉय 'रीस्टोर' ट्रायल को लीड कर रहे हैं, जो दुनिया का पहला क्लिनिकल ट्रायल है, जिसमें डोनर, ब्लड स्टेम कोशिकाओं से लैब में कृत्रिम रूप से विकसित रेड ब्लड सेल्स स्वस्थ वॉलंटियर्स को देकर उसकी सुरक्षा की टेस्टिंग की जा रही है.
ट्रायल में कृत्रिम ब्लड का किसी भी तरह से जीन एडिट नहीं किया गया, लेकिन फिर भी वैज्ञानिकों को इंसानों में इसकी टेस्टिंग करने के स्टेज़ तक पहुंचने में 10 साल की रिसर्च लगी.
प्रोफ़ेसर टॉय कहते हैं, "फ़िलहाल, किसी की बांह से ब्लड निकालना कहीं अधिक सफल और किफ़ायती है, और इसलिए हमें भविष्य में ब्लड डोनर्स की ज़रूरत है."
"लेकिन दुर्लभ ब्लड ग्रुप वाले लोगों के लिए, जिनके लिए दूसरे ब्लड डोनर बहुत कम हैं, अगर हम उनके लिए अधिक ब्लड तैयार कर सकें, तो यह वाकई में बहुत अच्छा होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.