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पश्चिम बंगाल: लेफ़्ट की ब्रिगेड रैली में जुटती भीड़ क्या मतदान केंद्रों तक भी पहुंचेगी?
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल में इंडिया गठबंधन के तीनों सहयोगियों यानी तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस और सीपीएम के बीच घमासान जारी है.
लेकिन इस सबके बीच रविवार को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वामपंथी युवा संगठन डेमोक्रेटिक फेडरेशन ऑफ इंडिया (डीवाईएफआई) के बैनर तले आयोजित हुई इंसाफ रैली के आयोजक पूरे राज्य से खासी भीड़ जुटाने में कामयाब रहे.
लेकिन वाममोर्चा के तमाम नेताओं को यह सवाल अब भी मथ रहा है कि क्या इसका कुछ हिस्सा मतदान केंद्रों तक भी पहुंचेगा?
इस सवाल की वजह यह है कि साल 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भी वाममोर्चे ने कांग्रेस के साथ मिलकर इसी मैदान पर एक विशाल रैली आयोजित की थी जिसके चलते महानगर ठप हो गया था.
लेकिन महीने भर बाद हुए चुनाव में उसका खाता तक नहीं खुल सका था. शायद यही वजह थी कि सीपीएम नेता आभास रायचौधरी ने अपने भाषण के दौरान कहा कि मैदान में जुटी इस भीड़ को मतदान केद्रों तक ले आना होगा.
चुनाव में नहीं खुला खाता
लेकिन दूरदराज से आने वाले पार्टी के नेता और कार्यकर्ता रैली ख़त्म होने के बाद यही सवाल पूछते नजर आए कि लोकसभा चुनाव से पहले इतने कम समय में ऐसा कैसे संभव होगा.
दरअसल, डीवाईएफआई ने राज्य के विभिन्न लोकसभा इलाकों में 50 दिन लंबी इंसाफ यात्रा आयोजित की थी.
क़रीब तीन हज़ार किमी की दूरी तय करने वाली इस यात्रा में कुल मिला कर 12 लाख लोग शामिल हुए थे.
वाम नेतृत्व को उम्मीद थी कि अगर इसमें से एक तिहाई लोग भी ब्रिगेड परेड मैदान की रैली में पहुंच सकें तो अपनी ताकत का प्रदर्शन किया जा सकेगा.
रविवार की रैली में भीड़ को लेकर सबके अलग-अलग दावे जरूर हैं. लेकिन इस बात पर आम राय है कि रैली में पार्टी ने खासी भीड़ जुटाई थी.
मतदान से दूर रहती भीड़
राज्य में लोकसभा या विधानसभा की एक भी सीट नहीं होने के बावजूद वामपंथी दलों की रैली में इतनी भीड़ जुटने को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
इस बार पहली बार आदिवासी लोग भी इसमें नजर आए. किसी दौर में चाय बागान इलाकों के आदिवासियों को वाममोर्चा का मजबूत वोट बैंक कहा जाता था.
बंगाल सीपीएम के 2011 में सत्ता से बाहर होने के बाद ही पार्टी में यह सवाल सबसे ज्यादा पूछा जाता रहा है कि रैली की अपील पर तो ब्रिगेड परेड मैदान लाल रंग में रंग जाता है लेकिन चुनाव के समय पोलिंग एजेंट तलाशना भी मुश्किल क्यों हो जाता है.
इसके लिए मंझोले स्तर के नेताओं और ज़मीनी कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता को ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा है. इस रैली के बाद भी फिर वही सवाल उठ रहा है कि क्या लोकसभा चुनाव से पहले इस कमी को दूर करना संभव होगा.
डीवाईएफआई की प्रदेश सचिव मीनाक्षी मुखर्जी कहती हैं, "यह टी 20 नहीं है. हम टेस्ट मैच खेल रहे हैं. यानी रातोरात सबकुछ नहीं बदल सकता. राजनीति के मैदान में धैर्य के साथ टिके रहना होगा."
सीपीएम के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम समेत तमाम नेताओं ने अपने भाषण में भाजपा के अलावा राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पर जमकर हमले किए और इन दोनों में साठ-गांठ के आरोप लगाए.
मोहम्मद सलीम का कहना था, "वर्ष 2014 में केंद्र के भाजपा के सत्ता में आने के बाद यहां तृणमूल कांग्रेस का भ्रष्टाचार तेजी से बढ़ा है. चौकीदार अगर चोर है तो पकड़ेगा कौन?"
सीपीएम नेता ने कहा कि बीते साल हुए पंचायत चुनाव में हमने अपनी ताकत दिखाई थी. लेकिन वह तो ट्रेलर था.
लोकसभा चुनाव में अंतिम नतीजा सामने आएगा. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पूरा जोर अपने परिवार को बचाने पर है.
उन्होंने दावा किया कि हाल में पार्टी के पैरों तले की जमीन काफ़ी मजबूत हुई है और लोकसभा चुनाव के नतीजों से यह बात साबित हो जाएगी.
वाममोर्चे का मत प्रतिशत
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष कहते हैं, "ब्रिगेड रैली में भीड़ तो ठीक-ठाक जुटी थी. लेकिन जो लोग इसमें शामिल होने आए थे वही अपने इलाकों में लौटकर लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट देंगे तो इस आयोजन से सीपीएम को फायदा क्या हुआ."
राजनीतिक विश्लेषक मईदुल इस्लाम कहते हैं, "वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में लेफ़्ट को छह फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे. बीते विधानसभा चुनाव में यह घट कर पांच प्रतिशत से नीचे ज़रूर आ गया था. लेकिन बंगाल में लेफ़्ट वोटरों की अब भी ख़ासी तादाद है. पार्टी की रैली में भीड़ तो जुटती है. अगर इसका छोटा हिस्सा भी वोट में बदल जाए तो चुनावी तस्वीर बदल सकती है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पार्टी ऐसा करने में कामयाब होगी?"
यही सवाल सीपीएम के बड़े नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं को भी मथ रहा है.
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