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बिहार: 40 दिन में सात नेताओं की हत्या और तीन सांसदों को 'धमकी', तेजस्वी के आरोपों में कितना दम
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
सोमवार की सुबह बीजेपी नेता श्याम सुंदर उर्फ मुन्ना शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
यह हत्या बिहार की राजधानी पटना के पुराने इलाक़े पटना सिटी के चौक थाना में हुई.
मुन्ना शर्मा बीजेपी के पटना सिटी चौक के मंडल अध्यक्ष रह चुके थे और पूजा-पाठ भी कराते थे.
इनके पिता रामेश्वर शर्मा भी जनसंघ के कार्यकर्ता रहे हैं. हत्या से जुड़े सीसीटीवी फ़ुटेज में फ़ुटपाथ पर बैठे मुन्ना शर्मा को तीन बाइक सवार गोली मारते दिख रहे हैं.
बिहार पुलिस ने एक्स पर बयान जारी करके कहा है कि मुन्ना शर्मा की हत्या ‘टारगेटेड किलिंग’ है.
स्थानीय मीडिया में चल रही ‘लूटपाट के प्रयास में हुई हत्या’ की बात को पटना पुलिस ने ख़ारिज कर दिया है.
पटना ग्रामीण एसपी रौशन कुमार ने कहा, “सुबह तक़रीबन साढ़े चार बजे मुन्ना शर्मा अपने परिजनों के लिए ऑटो बुक करने के लिए निकले थे. वो सड़क किनारे बैठकर इंतज़ार कर रहे थे. इतने में तीन बाइक सवार उनके पास आकर रुकते हैं और गोली मार देते हैं.”
एसपी बताते हैं, “फ़ुटेज देखने पर साफ़ पता चल रहा है कि उनको टारगेट किया गया था. परिवार ने किसी तरह का विवाद या दुश्मनी की बात नहीं बताई है. वो रोज़ सुबह टहलने जाते थे और ये पैटर्न अपराधियों को मालूम था.”
मुन्ना शर्मा की हत्या के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम करके विरोध प्रदर्शन किया. दरअसल बीते एक महीने में पटना सिटी के इलाक़े में ही बीजेपी के दो नेताओं की हत्या हो चुकी है.
40 दिन में 7 नेताओं की हत्या
बिहार में राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं की हत्या का आंकड़ा देखें तो महज़ एक अगस्त से 9 सितंबर तक कम से कम सात नेताओं की हत्या राज्य के अलग अलग हिस्सों में हो चुकी है.
बीजेपी के मुन्ना शर्मा और अजय साह सहित पश्चिमी चंपारण में जेडीयू नेता विभव राय, सहरसा में जेडीयू नेता जवाहर यादव, हाजीपुर में आरजेडी नेता पंकज राय और मुंगेर में बीजेपी नेता बंटी सिंह की हत्या इस दौरान हुई है.
वहीं सोमवार की शाम यानी कल ही बिहार के अरवल में सीपीआई-एमएल के स्थानीय नेता सुनील चंद्रवंशी की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
सुनील पार्टी के अरवल ज़िला कमिटी के सदस्य थे. 9 सितंबर की शाम जब वो बाइक से अपने घर लौट रहे थे तो घात लगाए अपराधियों ने घटना को अंजाम दिया.
एक और बीजेपी नेता की हत्या
मुन्ना शर्मा के घर से क़रीब पांच किलोमीटर दूर अजय साह का घर है. अजय साह बीजेपी के नेता थे. उनकी हत्या 13 अगस्त को हुई थी. 50 साल के अजय को उनके घर के पास मौजूद उनकी दुकान में ही अपराधियों ने सात गोली मारी थीं.
अजय साह के परिजन मामले में पुलिस की कार्यशैली से नाराज़ हैं.
उनके भतीजे रोहन गुप्ता बीबीसी से कहते हैं, “अभी तक पुलिस एनएमसीएच (सरकारी अस्पताल) से पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक नहीं ले पाई है. जब हम लोग जाते हैं तो कहा जाता है कि गिरफ्तारी हो जाएगी. बीजेपी के नंद किशोर यादव और नेता सब हमें सपोर्ट कर रहे हैं लेकिन पुलिस का कोई सहयोग नहीं है. हमारे परिवार की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी.”
राज्य के डिप्टी सीएम और बीजेपी नेता विजय कुमार सिन्हा ने कहा, “ नए डीजीपी आए हैं. सख्ती से एक्शन लेंगें. जिनकी अपराध को, भ्रष्टाचार को पोषित करने की मानसिकता है उन पर अंकुश लगेगा. बिहार में अपराधियों को संरक्षित करने वाला कोई नहीं बचेगा.”
पॉलिटिकल मर्डर में दूसरे नंबर पर बिहार
बिहार में एनडीए गठबंधन की पार्टियां राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के शासन काल को ‘जंगलराज’ कहती रही हैं. इस बार लोकसभा चुनाव में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने भाषणों में जंगलराज शब्द का इस्तेमाल करते रहे.
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से ही तेजस्वी लगातार बिहार का 'अपराध बुलेटिन' जारी कर रहे है. इस बुलेटिन में राज्य में हो रही अपराध की घटनाओं की हेडलाइन्स होती हैं और कई बार उन्हें ‘रिकॉर्ड तोड़ अपराध’ की संज्ञा दी जाती है.
पटना में हुई हत्या के बाद भी तेजस्वी यादव ने एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “एनडीए के कर्ता धर्ता बढ़ते बेलगाम अपराध से बेख़बर हैं. इधर-उधर में मस्त, व्यस्त और पस्त सीएम से बिहार बिल्कुल भी नहीं संभल रहा है.”
जिस पर जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन उन्हें 1990 से 2005 का समय याद दिलाया है.
राजीव रंजन बीबीसी से कहते हैं, “आंकड़ों के ज़रिए बिहार की तस्वीर पर प्रहार करने वाले तेजस्वी यादव को ये याद रखना चाहिए कि बिहार आज भी 90 से 2005 का दौर नहीं भूला है. आंकड़ों को प्रति लाख की आबादी के लिहाज़ से भी देखेगें तो बिहार में अपराध कम है.”
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक़, साल 2022 में पूरे देश में बिहार राजनीतिक हत्याओं में दूसरे नंबर पर था. पहले नंबर पर झारखंड था जहां 17 राजनीतिक हत्याएं हुईं और बिहार-ओडिशा में आठ पॉलिटिकल मर्डर हुए.
तीन सांसदों को कथित धमकी मिली
राज्य में सिर्फ़ नेताओं की हत्या ही नहीं हो रही बल्कि हाल के दिनों में तीन सांसदों ने धमकी मिलने की शिकायत भी स्थानीय थानों में दर्ज कराई है. ये तीन सांसद हैं, अररिया सांसद प्रदीप सिंह (बीजेपी), खगड़िया सांसद राजेश वर्मा (लोजपा-आर) और बक्सर सांसद सुधाकर सिंह (आरजेडी).
अररिया सांसद प्रदीप सिंह का दावा है कि उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई है. इसकी शिकायत सांसद ने अररिया के नगर थाने में बीती 2 सितंबर को की थी.
खगड़िया सांसद राजेश वर्मा का कहना है कि उन्हें भी फोन करके जान से मारने की धमकी मिली थी, जिसके बाद सांसद के निजी सचिव ने खगड़िया के साइबर थाने में 28 अगस्त को एफ़आईआर दर्ज कराई थी.
इस मामले में पुलिस ने बिट्टू कुमार नाम के व्यक्ति की गिरफ़्तारी की है. स्थानीय मीडिया के मुताबिक़, बिट्टू ने शराब के नशे में धमकी देने की बात को स्वीकारा है. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
वहीं बक्सर सांसद सुधाकर सिंह ने कैमूर के रामगढ़ थाने में बीती 2 सितंबर को अविनाश कुमार नाम के व्यक्ति द्वारा कथित धमकी देने की शिकायत दर्ज कराई थी. इसके बाद 8 सितंबर को उन्होंने कैमूर एसपी के पास रामगढ़ थाना प्रभारी द्वारा कथित धमकी देने की शिकायत भी भेजी है.
सुधाकर सिंह बीबीसी से कहते हैं, “एक सांसद को थाना प्रभारी धमकी दे रहा है, ऐसे में तो बिहार सरकार का पूरा सिस्टम फ़ेल हो गया है और यहां पुलिस ही संगठित अपराध में लिप्त है. मैनें तो थाना प्रभारी से किसानों के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाई के बारे में ही पूछा था.”
सांसदों को इस तरह धमकी मिलने को किस तरह देखा जाए, इस सवाल पर जेडीयू नेता राजीव रंजन कहते हैं, “देश के किसी भी राज्य में ऐसी घटनाएं हो सकती हैं. महत्वपूर्ण बात ये है कि पुलिस, पश्चिम बंगाल या इंडिया ब्लॉक शासित किसी राज्य की पुलिस की तरह काम करती है या फिर अपनी ज़िम्मेदारियों को ठीक से निभाती है?”
‘क्राइम कंट्रोल सिर्फ़ पुलिस की ज़िम्मेदारी नहीं’
तो अपराध के संदर्भ में बिहार की स्थिति क्या है? क्या यहां अपराध बढ़ा है या फिर उस पर कंट्रोल है? ये सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब साल 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ये दोहराते रहे कि वो ‘थ्री सी’ से समझौता नहीं करेंगे. थ्री सी यानी क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म.
बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद कहते है, “अपराध बढ़ा है कि नहीं, ये डेटा के बारीक विश्लेषण से ही पता चलेगा. लेकिन अपराध में डेटा से ज़्यादा परसेप्शन महत्वपूर्ण होता है. आम लोगों को क्या लगता है, ये महत्वपूर्ण है. साल 2005 में जब नीतीश कुमार सीएम थे तब एडीजी रहते हुए मैंने उनसे यही डिमांड की थी कि जो कुछ भी हो, क़ानून के हिसाब से हो. बाद में उन्होंने न्याय के साथ विकास का नारा दिया.”
अभयानंद क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम को एक रिले रेस जैसा बताते हुए उसके चार एलीमेंट गिनाते है.
वो कहते हैं, “विधायिका, पुलिस, न्याय व्यवस्था और रिफार्मेटरी – इन चार एलीमेंट्स में अच्छा समन्वय ज़रूरी है. हर किसी की सीमा तय है जिसमें उसको दौड़ना है. दिक्कत ये है कि क्राइम कंट्रोल को सिर्फ़ पुलिस की ज़िम्मेदारी मान लिया जाता है.”
‘जाति बनाम जाति की हिंसा बढ़ी’
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के पूर्व निदेशक पुष्पेन्द्र कहते हैं, “एनसीआरबी के आंकड़ों से आप ठीक से क्राइम को नहीं समझ सकते. क्योंकि ये अंडर रिपोर्टेड होते हैं. दूसरा ये कि समाजशास्त्रीय शोध में दो शब्द हैं- हिंसा और अराजकता. बिहार में सरकार ने अराजकता से कुछ हद तक डील किया लेकिन हिंसा समाज की बुनियाद में रही है.”
ऐसे में बिहार जहां सामाजिक संघर्ष एक ऐतिहासिक सच्चाई है, वहां क्या इसका रिश्ता वर्तमान में हो रही हिंसा और अपराध से है?
पुष्पेन्द्र कहते हैं, “बिहार में लिबर्टी और इक्वालिटी पर कुछ हद तक काम हुआ है, लेकिन भाईचारे या बंधुत्व पर यहां काम नहीं हुआ है. यानी एक जातीय दायरे में भाईचारा आपको दिखाई देगा लेकिन जब एक जाति बनाम दूसरी जाति होगा तो ये भाईचारा नहीं दिखेगा. जिसकी वजह से ये सोसाइटी ज़्यादा बंटी हुई है और हिंसा बढ़ी है. बल्कि पहले की तुलना में रोज़ाना जो अपराध घट रहे हैं वो लगातार भयावह होते जा रहे हैं.”
क्या तेजस्वी यादव अपने पिता और आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के शासनकाल में क़ानून व्यवस्था की असफलताओं वाली छवि के बरक्स एक काउंटर नैरेटिव खड़ा करना चाहते हैं?
इस सवाल पर पुष्पेन्द्र कहते हैं, “विपक्ष की कोशिश है कि भाईचारे की कमी के चलते जो अपराध हो रहे हैं उसको कैप्चर करके सामने लाना और सत्ता उसको डिफेंड करेगी, जो वो कर भी रही है.”
वरिष्ठ पत्रकार अरुण श्रीवास्तव कहते हैं, “कांउटर नैरेटिव गढ़ने की कोशिश तो है ही, लेकिन साथ ही तेजस्वी अप्रत्यक्ष तौर पर लालू के शासनकाल में हुईं क़ानून व्यवस्था की विफलताओं को जस्टिफ़ाई करने की भी कोशिश कर रहे हैं. और इतिहास भी आप देखें तो 1912 में बिहार जब राज्य बना तो यहां वर्चस्व की लड़ाई तेज़ हुई. ये लड़ाई 1964-65 के बाद समाज के निचले हिस्से में आकर ज़्यादा आक्रामक हुई. इसलिए यहां के मूल में ही हिंसा है.”
बिहार में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं. तेजस्वी यादव ने अपराध के मुद्दे पर हमलावर रणनीति अपनाकर, क़ानून-व्यवस्था के सवाल को बहस के केंद्र में ला दिया है. देखना होगा कि बिहार में जदयू और बीजेपी इस मुद्दे से कैसे निपटते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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