पेरिस में 2024 में ओलंपिक खेलों से पहले खटमलों के फैलने से दहशत का माहौल

    • Author, हयू स्कोफ़ील्ड
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, पेरिस

इन दिनों पेरिस और फ़्रांस के अन्य शहर खटमलों से परेशान हैं. यहां तक कि अगले वर्ष पेरिस में होने वाले ओलंपिक खेलों पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगा है.

कम से कम फ़्रांस की मीडिया में तो ये सवाल उठ ही रहे हैं.

कुछ हद तक ये सवाल जायज़ तो हैं पर पूरी तरह से नहीं. पिछले कुछ हफ़्तों में खटमलों की संख्या बढ़ने की ख़बरें आई हैं लेकिन ये बढ़ोतरी कई वर्षों से हो रही है.

फ़्रांस के मार्साय शहर के ज्यां-मिशेल बेरेंगर एंटोमोलोजिस्ट हैं. एंटोमोलोजिस्ट जीव विज्ञान की उस शाखा से जुड़े होते हैं जो कीड़ों का गहन अध्ययन करते हैं.

बेरेंगर कहते हैं, "हर साल गर्मियां के आख़िर में खटमलों की तादाद बढ़ती है. लोग जुलाई और अगस्त में बाहर जाते हैं और लौटते हुए अपने सामान के साथ खटमल वगैहरा लेकर आ जाते हैं. और हर साल इनकी संख्या बढ़ती जा रही है ”

पेरिस के फ़्लैट में रहने वाले लोग इसकी वजह से दहशत में है. हाल के दिनों में ये रिपोर्ट भी आई है कि खटमल सिनेमा हॉल में भी देखे गए हैं लेकिन इसका कोई सबूत नहीं मिला है.

इसके बावजूद लोग ऐसी बातों को गंभीरता से ले रहे हैं. इसके अलावा ट्रेनों में खटमलों के काटने की ख़बरें में आती रही हैं.

पेरिस ओलंपिक से पहले आई ये मुसीबत

अब पेरिस का नगर निगम और राष्ट्रपति मैक्रों की सरकार भी इसके ख़िलाफ़ क़दम उठाने की बात करने लगी है.

ये इस बात का सबूत है कि मुद्दा कितना गंभीर है. क्योंकि सभी को 2024 पेरिस ओलंपिक खेलों से पहले शहर की इमेज़ की फ़िक्र है.

शायद यही वजह है कि प्रशासन इसे सिर्फ़ सोशल मीडिया पर फैल रहे पैनिक के तौर पर नहीं ले रहा है.

क्योंकि सोशल मीडिया पर इससे जुड़ी पोस्ट अपने आप में एक अलग क़िस्सा हैं.

इंटरनेट पर कई डरावनी कहानियां शेयर की जा रही हैं. अख़बारों के मुकाबले ये ख़बरें अधिक तेज़ी से फैल रही हैं.

सोशल मीडिया पोस्ट्स से सिनेमा हॉल के मालिक़ विशेषकर परेशान हैं. वे उन वीडियोज़ को गंभीरता से ले रहे हैं जिनमें थियेटर की सीटों पर खटमलों को दिखाया गया है.

मेट्रो में बैठने वाले लोग अब अपनी सीट को अच्छे से जांच रहे हैं. कुछ तो सीट पर बैठने के बजाय खड़े रह रहे हैं.

बेरेंगर कहते हैं, “इस साल एक नई बात हुई है. एक डर-सा बन गया है. एक ढंग से ये ठीक भी है क्योंकि इससे लोग खटमलों के ख़तरे से चौकन्ने रहेंगे पर बहुत सी दिक्कतों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है.”

हक़ीक़त तो ये है कि बीते 20 से 30 वर्षों में खटमलों ने वापसी की है. लेकिन ऐसा सिर्फ़ फ़्रांस में ही नहीं हुआ है.

क्या हैं कारण?

इनमें से एक वैश्वीकरण यानी कंटेनर ट्रेड, पर्यटन और अप्रवासन है. इसके लिए क्लाइमेट चेंज को ज़िम्मेदारी से नहीं बचाया जा सकता है.

खटमल को लेटिन भाषा में सिमेक्स लेक्टूलारियस कहा जाता है. ये घरों के भीतर रहने वाला प्राणी है. ये वहीं जाता है जहां मनुष्य होते हैं.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद खटमल और मच्छर आदि लगभग गायब हो गए थे.

इसकी वजह जंग के बाद डीडीटी का व्यापक पैमान पर छिड़काव थी.

लेकिन बीते कुछ दशकों से डीडीटी और अन्य कई कैमिकल बंद कर दिए गए हैं क्योंकि इनका मनुष्यों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है.

इसी बीच खटमलों की संख्या भी कम हो गई थी लेकिन पुराने कीड़ों के कुछ पूर्वज बच गए थे जो एक बार फिर मनुष्यों पर हमला कर रहे हैं.

तीसरा कारण दुनिया में कोकरोचों की गिरती आबादी भी हो सकता है. कोकरोच दरअसल खटमलों को खा जाते हैं.

डरिए मत, हम ये नहीं कह रहे कि खटमलों से निपटने के लिए आप अपने घरों में कोकरोच ले आएं.

बेरेंगर के मुताबिक, विकसित दुनिया में खटमलों की वजह से हड़कंप इसलिए मच जाता है क्योंकि यहां के बाशिंदों को खटमलों के अस्तित्व की कोई याददाश्त नहीं है.

दुनिया के बाक़ी हिस्सों में जहां अब भी खटमल पाए जाते हैं, वहां के लोग इनसे इतना नहीं डरते.

जिस्म ही नहीं दिमाग़ पर भी पड़ता है असर

लेकिन सच्चाई तो यही है कि खटमल एक मुसीबत तो हैं ही लेकिन डर शारीरिक होने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक भी है.

सिमेक्स लेक्टुलारिस (खटमल का लेटिन नाम) ख़तरनाक तो हैं लेकिन अब तक मालूम जानकारी के आधार इनसे किसी बीमारी का संक्रमण नहीं होता.

ये जब काटते हैं तो दर्द होता लेकिन ये दर्द अधिक देर तक नहीं रहता.

खटमल अपने पीछे काले धब्बे छोड़ जाते हैं जो दरअसल उनका मल होता है. मानव गंध के बाद वे तुरंत अपनी छिपने की जगह से बाहर आ जाते हैं.

खटमल बिना खाए एक साल तक भूखे रह सकते हैं. लेकिन उनके काटने से असली नुकसान मानसिक सेहत पर पड़ता है.

एक साल पहले मेरे 29 वर्षीय बेटे को हमारे 20वीं मंज़िल पर स्थित फ़्लैट पर खटमलों ने काटा.

उसने अपना सारा बिस्तर फेंक दिया, अपने सारे कपड़े धो डाले और सारे घर को ऊपर से लेकर नीचे तक साफ़ किया.

इतना करने के बाद भी उसे नींद नहीं आ रही थी. उसे लगता था कि उसकी चमड़ी पर खटमल रेंग रहे हैं. उसके लिए ये एक जुनून बन गया था.

एक बड़ी पेस्ट कंट्रोल कंपनी की स्टीम-ट्रीटमेंट के बाद ही उन्होंने चैन की सांस ली. कुछ पेस्ट कंट्रोल कंपनियां खटमलों को पकड़ने के लिए कुत्तों का प्रयोग भी करती हैं.

बेरेंगर कहते हैं, “घर में खटमल होना कोई हंसी-खेल की बात नहीं है. ऐसी कई कहानियां हैं जो बताती हैं कि ये जीव कितनी तेज़ी से फैलते हैं. मेरे ख़्याल में इनसे निपटने का बेहतरीन तरीका है सुपर-स्प्रैडर्स में इनके फैलाव को रोकना है.”

सुपर स्प्रैडर से आशय सघन आबादी वाले इलाक़ों से हैं जहां आर्थिक रूप से कमजोर लोग रहते हैं. समाज के इस वर्ग के पास अपना ख्याल रखने के लिए पर्याप्त साधन नहीं होते.

जब बेरेंगर और उनकी टीम को ऐसे ही एक व्यक्ति के फ़्लैट पर बुलाया गया तो उन्हें वहां सैकड़ों खटमल दिखे जो अलमारियों से लेकर खिड़कियों तक में मौजूद थे.

फ़्लैट में जगह-जगह पर खटमलों के अंडे दिख रहे थे.

कीड़ों पर अध्ययन करने वाले ज्यां-मिशेल बेरेंगर कहते हैं, "जब भी ऐसा कोई व्यक्ति अपने घर से निकल कर सार्वजनिक स्थान पर जाता है तो वो अपने साथ खटमल ले जाता है. बस इसी तबके को मदद की ज़रूरत है.”

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