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पोर्क विंदालू: ईसाइयों में लोकप्रिय व्यंजन का क्या है भारतीय कनेक्शन
- Author, जान्हवी मूले
- पदनाम, बीबीसी मराठी
ईसाइयों में बेहद लोकप्रिय व्यंजन पोर्क विंदालू की कहानी तीन महाद्वीप के चार देशों और कई पड़ावों से होकर गुज़रती है.
भारतीय उपमहाद्वीप में लोग पोर्क (सूअर का मांस) ज़्यादा नहीं खाते हैं लेकिन कुछ व्यंजनों में इसका इस्तेमाल होता है. ईसाई घरों में क्रिसमस या फिर शादी जैसे मौकों पर इन व्यंजनों को बनाया जाता है.
पोर्क विंदालू इन व्यंजनों में सबसे पसंदीदा है. खट्टे-मीठे स्वाद वाले विंदालू को लोग पारंपरिक तौर पर चावल के साथ खाते हैं लेकिन इसे रोटी और पराठे के साथ भी खाया जा सकता है.
दरअसल यह पुर्तगाली संस्कृति के साथ भारत पहुंचा था और देखते देखते महाराष्ट्र के उत्तरी कोंकण के समुद्र तटीय इलाके और गोवा की खानपान शैली का अभिन्न हिस्सा बन गया. इसके बाद भारत के रास्ते ब्रिटेन और दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा.
विंदालू भारत के बाहर भी बहुत लोकप्रिय है, ख़ासकर ब्रिटेन के भारतीय रेस्तरां या 'करी हाउसेज' में. 1998 में ब्रिटेन में एक बैंड ने 'विंदालू' नाम से एक फुटबॉल एंथम भी बनाया था.
खाद्य इतिहासकारों के मुताबिक पोर्क विंदालू की उत्पत्ति पुर्तगाली व्यंजन कार्ने डे विन्हा डी'अल्होस से हुई है.
विन्हा और अल्होज़ का अर्थ शराब और लहसुन है. इसमें मांस को सिरका और लहसुन के साथ पकाया जाता है. आमतौर पर विंदालू बनाने के लिए सूअर के मांस का इस्तेमाल होता है.
पुर्तगालियों का व्यंजन
मुंबई के कोताची वाडी में रहने वाले पुरातत्वविद आंद्रे बैप्टिस्टा ईस्ट इंडियन समुदाय से हैं और इस समुदाय के इतिहास का अध्ययन भी करते हैं.
वह कहते हैं, "भारत आकर पुर्तगालियों ने जब गोवा, उत्तरी कोंकण के वसई, दीव दमन, कार्ने डे विन्हा डे अल्होज़ जैसे इलाकों पर कब्ज़ा कर लिया तो वे अपने साथ व्यंजन भी लेते आए थे. इसे विंदालू, विंदाल्हो, इंदालियाह जैसे अलग-अलग नाम मिले."
विंदालू को तीखा बनाने के लिए उसमें मिर्च डालते हैं, यह मिर्च भी दक्षिण अमेरिका के ब्राजील से पुर्तगाल होते हुए भारत पहुंचा है. सोरपोटेल भी विंदालू जैसा ही व्यंजन है. विंदालू और सोरपोटेल के बीच मुख्य अंतर मांस को अलग अलग तरह से इस्तेमाल करना ही है.
विंदालू में सूअर के मांस के छोटे-छोटे क्यूब का उपयोग होता है जबकि सोरपोटेल में सूअर के विभिन्न अंगों के साथ बारीक़ी से कटे हुए टुकड़ों का इस्तेमाल होता है.
आंद्रे बैप्टिस्टा बताते हैं, "कोंकण में, कोकम या इमली और नींबू का उपयोग किसी भी शोरबा या पकवान में अम्लता जोड़ने के लिए किया जाता है. लेकिन 16वीं सदी में यहां आए पुर्तगाली अपने व्यंजनों में सिरके का इस्तेमाल करते थे क्योंकि इसे लंबे समय तक संरक्षित करके रखा जा सकता है."
खाने पीने के इतिहास पर काम करने वाले चिन्मय दामले बताते हैं, "विन्हा डी अल्होज़ का सिरका भारत में आसानी से उपलब्ध नहीं था. इसलिए ताड़ी से सिरका तैयार करके उसमें काली मिर्च और इमली का प्रयोग किया गया, इसका उपयोग दक्षिण भारत में भी होता है."
उत्सव और पोर्क
ईस्ट इंडियन रोशेल मोरेस मुंबई में कैटरिंग के व्यवसाय से जुड़ी हुई हैं. वह बताती हैं, "हमारे घर में कोई भी शादी, नामकरण या कोई भी उत्सव पोर्क विंदालू या सोरपोटेल के बिना पूरा नहीं होता है."
उत्तरी कोंकण, बंबई, वसई और आसपास के क्षेत्रों में पुर्तगाली शासन के दौरान कई जातियों के स्थानीय निवासियों को ईसाई धर्म में धर्मांतरित किया गया था, जिनके वंशज आज ईस्ट इंडियन के रूप में जाने जाते हैं.
मुंबई के मूल निवासी इस समुदाय की आबादी लगभग दो लाख से पांच लाख के बीच मानी जाती है. विशिष्ट मराठी बोली और ख़ास तरह के पोशाकों के लिए समुदाय को जाना जाता है. इनकी संस्कृति मुख्य रूप से स्थानीय रीति-रिवाजों और पुर्तगाली विरासत का मिश्रण है और कुछ हद तक अंग्रेजों का प्रभाव भी दिखता है.
पोर्क विंदालू इनकी पुर्तगाली विरासत का प्रतीक है और इस विरासत के बारे में बात करते समय रोशेल अपनी मां और दादी की यादों में खो जाती हैं.
रोशेल कहती हैं, "मेरी दादी मलाड में रहती थीं, जहां वह खेतों में बड़े खीरे और तरबूज उगाती थीं. वहां सूअर भी पाले जाते थे."
"तब चूल्हे पर खाना बनाया जाता था. इसमें जलाने के लिए गोबर का प्रयोग किया जाता था. मैं हमेशा सोचती हूं क्या कभी मेरा बनाया पोर्क विंदालू कभी उतना ही स्वादिष्ट होगा जितना मेरी मां या दादी पकाया करती थीं."
जिस तरह भारत में हर किसी की खिचड़ी बनाने की विधि अलग-अलग होती है, उसी तरह लोग पोर्क विंदालू भी अलग-अलग तरीक़ों से बनाते हैं. रोशेल कहती हैं, "प्रत्येक ईस्ट इंडियन घर में एक अलग 'बोतल मसाला' होता है, और यही विंदालू को अनूठा स्वाद देता है."
विंदालू बनाने की विधि
विंदालू को बनाने के लिए सूअर के मांस के टुकड़ों को मसालों और सिरके के मिश्रण में रातभर या कम से कम कुछ घंटों के लिए रखा जाता है. इसके बाद लहसुन और मिर्च के साथ इसे पकाया जाता है. इसमें सबकी पसंद के मुताबिक प्याज़, टमाटर और कुछ अन्य सामग्री भी डाली जाती है.
सोरपटोल बनाने की विधि भी समान है, लेकिन आंद्रे बैपटिस्टा बताते हैं, "ईस्ट इंडियन घरों में विंदालू और सोरपटोल को कुछ दिन पहले तैयार किया जाता है और कुछ दिन रखने के बाद इसका स्वाद और भी बेहतर होता है."
"ईस्ट इंडियन सोरपोटल थोड़ा तीखा होता है और इसे अचार की तरह कम मात्रा में खाया जाता है. इसे ज़्यादा खाने से एसिडिटी होने लगती है. गोअन सोरपोटेल को कुछ हद तक ग्रेवी की तरह खाया जाता है. ये व्यंजन मंगलोरियन ईसाई समुदाय में भी परोसे जाते हैं."
"लेकिन तीन समुदायों ईस्ट इंडियन, गोअन और मंगलोरियन की यात्राएँ अलग-अलग रही हैं. मराठों ने 1739 में वसई क्षेत्र में पुर्तगाली शासन को समाप्त कर दिया और बाद में यह क्षेत्र अंग्रेजों के पास चला गया. इसलिए वहां ईसाइयों ने फिर से कुछ मराठी और अंग्रेजी प्रथाओं को अपनाया. ये सब अलग अलग जातियों के लोग रहे होंगे, इसलिए उनकी परंपराएं मिश्रित थीं. हर ईसाई भी पोर्क नहीं खाते हैं."
पोर्क का प्रचलन कैसे बढ़ा?
दरअसल, हाल तक भारत में पोर्क दुकानों में आसानी से उपलब्ध नहीं था.
आंद्रे इसका मुख्य कारण बताते हैं कि मांस के व्यवसाय में मुसलमानों की बड़ी संख्या है और इस्लाम में पोर्क खाना वर्जित है. यहूदियों के प्रावधानों के तहत भी पोर्क वर्जित है. भारत में उच्च जाति के हिंदू भी पोर्क को गंदा समझते हैं.
आंद्रे कहते हैं, "जाहिर तौर पर, केवल वे लोग ही पोर्क खा सकते हैं जो सूअरों की देखभाल कर सकते हैं. हमारे पूर्वज वसई क्षेत्र में रहते थे और हाल तक वहां कई ईस्ट इंडियन परिवार सूअर पालते थे. उन्हें पूरे साल खाना खिलाया जाता था और उनका मांस क्रिसमस, ईस्टर या शादी में खाया जाता था.''
चिन्मय दामले कहते हैं, "जब पुर्तगाली भारत आए तो उन्होंने अंग्रेजों से अलग किया था. उन्होंने जहां भी शासन किया, वहां उन्होंने न केवल बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराया बल्कि स्थानीय नागरिकों की खान-पान की आदतों को भी बदल दिया."
“इसलिए एक ओर अधिकांश हिंदू गोमांस नहीं खाते हैं और मुस्लिम और यहूदी पोर्क खाने से परहेज़ करेंगे. लेकिन गोवा में पुर्तगाली शासन के तहत लोगों ने इन दोनों का मांस खाना शुरू कर दिया. इसमें पुर्तगाली और स्थानीय खाद्य संस्कृति का मिश्रण भी था."
विंदालू दुनिया तक कैसे पहुंचा?
19वीं सदी की शुरुआत यानी 1813 से 1815 तक, जब गोवा कुछ समय के लिए ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब अंग्रेजों को मिश्रित गोवा-पुर्तगाली खाद्य संस्कृति से परिचित कराया गया. वहां से विंदालू जैसे खाद्य पदार्थ पहले भारत में अंग्रेजों तक पहुंचे और फिर बाद में ब्रिटेन तक गए.
चिन्मय कहते हैं, "गोवा के रसोइयों के बनाए व्यंजनों पर हिंदू और मुस्लिमों की तरह कोई प्रतिबंध नहीं था. वे कुछ भी पका सकते थे. पुर्तगाली प्रथा के कारण वह यूरोपीय प्रथाओं से भी भली-भांति परिचित थे. इसलिए 19वीं सदी के मध्य से, गोवा का रसोइया रखना अंग्रेजों के लिए प्रतिष्ठा और धन का प्रतीक बन गया.''
1880 के दशक की एक एंग्लो-इंडियन खान पान संबंधी किताब में विंदालू का उल्लेख पुर्तगाली करी या दक्षिण भारतीय करी के रूप में किया गया है.
चिन्मय दामले बताते हैं, "एडवर्ड पामर नाम के एक लेखक थे, उनकी दादी भारतीय थीं और उनका सरनेम विरास्वामी था. इसलिए वह ईपी विरास्वामी के नाम से भी लिखते थे. खानपान पर उनकी किताब 1885 में प्रकाशित हुई थी. इसमें पोर्क विंदालू है और इसे किसी भी वसायुक्त मांस यानी बत्तख, हंस या गोमांस से पकाया जा सकता था."
यह कहना कठिन है कि विंदालू को सबसे पहले ब्रिटेन में कौन ले गया था. लेकिन इन्हीं एडवर्ड पामर ने 1926 में लंदन में 'वीरास्वामी' नाम से एक भारतीय रेस्तरां खोला जो आज भी वहां के सबसे पुराने भारतीय रेस्तरां में से एक है.
वीरास्वामी ने निज़ाम ब्रांड के तहत अलग-अलग तरह के करी व्यंजन को बनाया और इसमें पोर्क विंदालू भी शामिल था.
दो महाद्वीपों की यात्रा के बाद भारत आगमन
चिन्मय दामले बताते हैं कि 20वीं सदी की शुरुआत में सिलहट और बंगाल से बड़ी संख्या में लोग ब्रिटेन गए और उन्होंने भारतीय व्यंजनों वाले छोटे छोटे रेस्तरां शुरू किए.
चिन्मय कहते हैं, "बंगाल के इन लोगों ने कभी भी वास्तविक रोगन जोश या विंदालू का स्वाद नहीं चखा होगा. लेकिन वे लगभग सभी व्यंजन एक साथ बना लेते थे. पब कल्चर के बढ़ने और बियर के साथ भारतीय व्यंजन को पसंद करने के चलते यह चालीस-पचास के दशक में ब्रिटेन में फैल गया."
जहां मुस्लिम रसोइये थे, उन्होंने सूअर के मांस के स्थान पर अन्य प्रकार के मांस का उपयोग करना शुरू कर दिया, जबकि शाकाहारियों ने सब्जियों को शामिल किया और विंदालू का एक अलग रूप तैयार हो गया.
चिन्मय कहते हैं, "विंदालू के कुछ व्यंजनों में आलू का भी उपयोग किया जाता था. अब विंदालू में 'आलू' होने के चलते हुआ या फिर बंगाली रसोइयों के प्रभाव के कारण हुआ है."
"बंगाल में पुर्तगाली भी थे, उनके ज़रिए जो आलू आता था, वह 19वीं सदी के बंगाल में एक स्वादिष्ट व्यंजन था और अंग्रेज़ों को ख़ूब पसंद भी था. इसलिए असली वजह के बारे में बता पाना मुश्किल है."
आज, विंदालू अपने विभिन्न रूपों में दुनिया भर के कई भारतीय रेस्तरां के मेनू में प्रमुखता से शामिल है.
दो महाद्वीपों की यात्रा के बाद भारत आया यह व्यंजन आज न केवल गोवा और ईस्ट इंडियन समुदायों की बल्कि एक तरह से भारतीय खाद्य संस्कृति की भी पहचान बन गया है.
आंद्रे कहते हैं, ''आख़िर में, खान पान का समुदाय से गहरा संबंध है. यह धर्म से परे और समुदाय की संस्कृति से जुड़ा हुआ है."
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