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इंग्लैंड की ओर झुका टाई है ये

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|सोमवार, 28 फरवरी 2011, 02:37

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बंगलौर में हुए मैच के बाद भारत को भी एक अंक मिल गया और ग्रुप बी की अंक तालिका में वो बेहतर रन औसत के आधार पर नंबर एक पर रहने में क़ामयाब हो गया.

आधिकारिक रूप से भले ही मैच के नतीजे की सुई बीच में अटक गई हो मगर मेरे ख़्याल से ये बीच में रुककर भी इंग्लैंड की ओर झुकी मानी जाएगी.

भारतीय टीम को ख़ुद को सौभाग्यशाली मानना चाहिए कि उसे एक अंक मिल गया पर उस एक अंक की भी हक़दार शायद इंग्लैंड टीम ही थी.

भारतीय क्रिकेट प्रेमी मैच के बाद यही नहीं समझ पा रहे थे कि उन्हें एक अंक पाने की ख़ुशी मनानी चाहिए या पहले जिस मैच को वो भारत की झोली में मान रहे थे उसके टाई हो जाने का ग़म.

मेरे ख़्याल से तो ख़ुशी मनाएँ तो ही अच्छा है क्योंकि भागते भूत की लंगोटी की तरह कम से कम एक अंक पा तो गए.

जिस तरह अंतिम सात विकेट सिर्फ़ 33 रनों के अंतर में गिरे उसने दिखाया कि भारत की मज़बूत बल्लेबाज़ी ग़ैर-ज़िम्मेदारी से खेलना भूली नहीं है.

किस-किस को दोष देंगे आप. 'अगर' की तो लाइन लगी है.

अगर अंतिम गेंद पर एक शॉर्ट रन न हुआ होता तो स्कोर 339 होता और एक रन से भारत जीत भी सकता था.

जिन सात गेंदों पर अंतिम सात विकेट गिरे उनमें से अगर कुछ बच जातीं और उन गेंदों पर रन बन जाते तो स्कोर बड़ा भी हो सकता था.

अगर फ़ील्डिंग में थोड़ी और चुस्ती होती तो कुछ रन रुक सकते थे.

अगर गेंदबाज़ी की क़मियाँ सुधारी जा सकतीं तो न जाने कितने रन रोके जा सकते थे. अगर, अगर, अगर....

इंग्लैंड को देखिए. शुरू से लेकर अंत तक जीत का जज़्बा शायद ही कभी छूटा हो. पीटरसन की पारी देखिए, एंड्रयू स्ट्रॉस की या इयन बेल की.

स्ट्रॉस और बेल जब तक क्रीज़ पर थे मैच तो भारत के हाथों से निकल ही चुका था.

ज़बरदस्त शुरुआत के बाद भारत को 350 तक नहीं पहुँचने देना इंग्लैंड की जीत है.

स्ट्रॉस और बेल के बीच तीसरे विकेट के लिए 170 रनों की साझेदारी इंग्लैंड की जीत है.

इतने बड़े स्कोर का पीछा करते हुए विश्व कप में भारत को भारत की ज़मीन पर टाई के लिए मजबूर करना दरअसल इंग्लैंड की जीत है.

स्पिन खेलने में कमज़ोर मानी जाने वाली इंग्लैंड का हरभजन और पीयूष चावला का डटकर सामना करना इंग्लैंड की जीत ही है.

सात विकेट गिरने के बावजूद अंतिम दो ओवरों में 29 रन बनाने की कोशिश में 28 रन बना ले जाना इंग्लैंड की जीत ही तो है.

इसलिए ये टाई दरअसल इंग्लैंड की ओर झुका हुआ नतीजा है.

भारतीय टीम को शायद समझ आ गया होगा कि वर्ल्ड कप सिर्फ़ बल्लेबाज़ों के दम पर नहीं जीता जा सकता.

टीम नंबर वन या सर्वश्रेष्ठ टीम

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|मंगलवार, 21 दिसम्बर 2010, 00:49

टिप्पणियाँ (16)

दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध भारत को सेंचूरियन में मिली हार के कई पहलू हैं.

पहली पारी की बल्लेबाज़ी के बाद हार तो तय हो गई थी, देखना सिर्फ़ ये बच गया था कि हार कितने दिनों में मिलती है और पारी से मिलती है या विकेटों से.

वैसे इस हार के लिए भारत की बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी दोनों बराबर के ज़िम्मेदार हैं. भारतीय टीम शायद इस समय दुनिया की सबसे अनुभवी टीम है जहाँ वीरेंदर सहवाग, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर और वीवीएस लक्ष्मण जैसे खिलाड़ी उसका हिस्सा हैं.

इतने अनुभवी बल्लेबाज़ी क्रम का पहली पारी में लुढ़क जाना शर्मनाक था. वीरेंदर सहवाग पहली और दूसरी पारी में जिस शॉट पर आउट हुए वो ग़ैर-ज़िम्मेदाराना था.

ये ठीक है कि सहवाग का खेलने का अंदाज़ बिंदास है मगर खिलाड़ी में अनुभव के साथ ज़िम्मेदारी भी आती है और वो ज़िम्मेदारी इस अहम दौरे पर सहवाग से अपेक्षित थी.

ये बात सिर्फ़ सहवाग ही नहीं दूसरे बल्लेबाज़ों पर भी लागू होती है जो 'तू चल मैं आता हूँ' कि तर्ज पर मैदान में जा रहे थे.

सुरेश रैना के बल्ले के रन क्यों सूख गए हैं ये समझ से बाहर हो गया है.

इसी तरह भारतीय गेंदबाज़ी का पैनापन पूरी तरह ग़ायब है. दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाज़ों ने इस टेस्ट में 20 विकेट झटके मगर भारतीय गेंदबाज़ सिर्फ़ चार खिलाड़ियों को पैवेलियन की राह दिखा पाए.

जहाँ टीम 20 विकेट लेना चाहती है वहाँ सिर्फ़ चार नियमित गेंदबाज़ों के साथ उतरने का क्या औचित्य है. जो काम छह विशेषज्ञ बल्लेबाज़ नहीं कर पाएँगे उसे सातवाँ बल्लेबाज़ अकेले दम पर कैसे कर दिखाएगा.

ये बात सही है कि सिर्फ़ एक हार के बाद टीम का सारा पिछला प्रदर्शन धो-पोंछकर नहीं रख सकते मगर विश्व की नंबर एक टीम से ऐसी बुरी हार की भी तो अपेक्षा नहीं की जा सकती.

ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के विरुद्ध जारी ऐशेज़ शृंखला के दूसरे मैच में हारने के बाद ऑस्ट्रेलिया ने ज़बरदस्त वापसी करते हुए तीसरा मैच जीता. वो जीत ऑस्ट्रेलिया का जज़्बा दिखाती है जो कभी भी हार को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती.

क्या भारतीय टीम नंबर एक के ताज को सिर्फ़ घरेलू शृंखलाओं के दम पर बचाना चाहती है या वास्तव में विदेशी पिच पर जीत हासिल करके श्रेष्ठ टीम होने का दावा ठोंक सकती है.

अगले दो टेस्ट में इसी का टेस्ट होगा.

इन खेलों का 'स्वर्णिम' सुख

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|सोमवार, 11 अक्तूबर 2010, 22:14

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पिछले दिनों जब राष्ट्रमंडल खेल एक के बाद एक विवाद में फँसते जा रहे थे तो मेरे एक दोस्त ने बहुत ही वाजिब सवाल रखा कि क्या इन खेलों पर क़रीब दस हज़ार करोड़ रुपए ख़र्चना रुपए की बर्बादी और फ़िज़ूलख़र्ची नहीं है?

हो सकता है कि स्टेडियम और खेल गाँव बिल्कुल आख़िरी मौक़े पर आयोजन समिति के हवाले किए गए हों या खेलों से मात्र एक सप्ताह पहले मुख्य स्टेडियम के पास दर्शकों के चलने का फ़ुट ओवरब्रिज धराशायी हो गया हो या दिल्ली में आई बाढ़ के पानी से जूझ रहे खेल गाँव में साँप निकल आया हो लेकिन जिस तरह के खेल अब तक हुए हैं और जिस तरह का प्रदर्शन भारतीय खिलाड़ियों का रहा है, उसने इन सभी अवरोधों और खिजाने वाली चीज़ों को भुलवा दिया है.

खरबों रुपए की अर्थव्यवस्था में दस हज़ार करोड़ रुपयों की बिसात क्या है? और फिर क्या 'फ़ील गुड फ़ैक्टर' का मोल रुपयों में लगाया जा सकता है?

देश के एथलीटों के प्रदर्शन के बारे में अख़बारों में पढ़ने और उन्हें अपनी आँखों के सामने या टेलीविज़न पर 'लाइव परफ़ॉर्म' करते देखने में ज़मीन आसमान का फ़र्क है.

अलका तोमर द्वारा एथेंस ओलंपिक की रजत पदक विजेता तोन्या वरबीक को पटखनी देने या विजेंदर के नामीबियाई मुक्केबाज़ को मात्र 98 सैकंडों में स्टेडियम की छत दिखा देने के थ्रिल को सिर्फ़ देख कर ही महसूस किया जा सकता है.

स्टेडियम में दर्शक भले ही नदारद हों( सौजन्य कलमाडी ऐंड कंपनी) लेकिन टेलीविज़न पर जितने लोग इन खेलों का आनंद ले रहे हैं, उसने क्रिकेट के एकाधिकार को ( मोहाली में रोमांचक जीत और सचिन तेंदुलकर के 49 वें शतक के बावजूद) फीका किया है.

दूसरी सबसे बड़ी बात भारतीय खिलाड़ी उन खेलों में पदक ला रहे हैं जो ग्लैमरस स्पर्धाएं नहीं कहलाती हैं.

तीरंदाज़ी, जिमनास्टिक, और पैरा स्विमिंग में भारत को इससे पहले कभी राष्ट्रमंडल खेलों में पदक नहीं मिला.

इन खेलों में कई पदक विजेता बड़े शहरों से न होकर भारत के अनजान गांवों और क़स्बों से आए हैं.

तीरंदाज़ी में सोना जीतने वाली 16 वर्षीया दीपिका कुमारी झारखंड के रतुचेती गांव की रहने वाली हैं जिनके पिता राँची में ऑटो रिक्शा चलाते हैं. लंबी कूद में रजत पदक लेने वाली प्रजुषा के पिता त्रिचूर में रसोइया थे. और इस समय बेरोज़गार हैं.

जिमनास्टिक में रजत और काँस्य पदक जीतने वाले आशीष कुमार और हॉकी में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ गोल करने वाले दानिश मुज़्तबा इलाहाबाद के हैं और बहुत ही साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं. ये भी सोचने वाली बात है कि हरियाणा जिसका कि बालिका शिशु हत्या में बहुत ख़राब रिकॉर्ड है, किस तरह से बार-बार इतनी महिलाओं को विजेता पोडियम पर भेज रहा है.

हरियाणा के पुरुष खिलाड़ियों का प्रदर्शन भी चाहे वो योगेश्वर दत्त हों या रविंदर सिंह या संजय कुमार, महिला खिलाड़ियों से कम नहीं रहा है.

कुछ हल्कों में तो राष्ट्रमंडल खेलों को हरियाणा के खेल कहा जा रहा है.

और जिस तरह से इन खेलों ने दिल्ली का काया-पलट किया है वो भी क़ाबिले-तारीफ़ है. चौड़ी साफ़ सड़कें, ख़ूबसूरत फ़्लाई ओवर, दूरदराज़ के इलाक़ों तक मैट्रो ट्रेन ने दिल्ली की छवि को भारतवासियों के साथ विदेशियों की निगाह में भी उठा दिया है.

साइक्लिंग स्पर्धा के दौरान जब हेलीकॉप्टरों पर रखे कैमरे ऊपर से दिल्ली के दृश्य दिखा रहे थे तो लग ही नहीं रहा था कि ये वही गंदी अनियोजित दिल्ली है. अपने पूरे वैभव में दिल्ली दुनिया के किसी भी सुंदर नगर से टक्कर ले रही थी.

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