जश्न के आगे की चुनौती
राष्ट्रमंडल खेलों की रंगारंग शुरुआत हो गई और दुनिया भर में उस पर अधिकतर अच्छी प्रतिक्रिया भी आई.
मगर अगले ही दिन से सामने आ गई नई चुनौती और वो थी खेलों से दर्शकों का नदारद होना.
टिकट मिलने में लोगों को कितनी जद्दोजहद करनी पड़ रही है ये बात भी अलग-अलग माध्यमों से सामने आ रही है और नतीजा ये कि आयोजकों को अब तुरंत क़दम उठाने के बारे में सोचना पड़ रहा है.
खिलाड़ी का मनोबल तभी बढ़ेगा जब उसका प्रदर्शन देखने और उसका उत्साह बढ़ाने के लिए लोग मौजूद हों.
भारत पाकिस्तान हॉकी मैच छोड़कर अभी तक कहीं से भी ये ख़बर नहीं मिल रही है कि सभी टिकट बिक चुके हैं.
ज़रा सोचिए कि किसी संगीतकार या गायक को अगर आठ दस लोगों के सामने अपने हुनर का प्रदर्शन करना पड़े तो कैसी स्थिति बनेगी. ठीक उसी तरह की परेशानी खिलाड़ियों को उठानी पड़ रही है.
एक तरफ़ तो देश में खेलों की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए खेलों के आयोजन की दुहाई दी जा रही थी और दूसरी तरफ़ खाली स्टेडियम उन दावों को मुँह चिढ़ाते दिख रहे हैं.
मुक्केबाज़ी, कुश्ती और एथलेटिक्स जैसी लोकप्रिय स्पर्द्धाएँ इस बात का टेस्ट होंगी कि वाक़ई लोग स्टेडियम तक पहुँचेंगे या नहीं.
आयोजकों ने अब कहा है कि वे सुविधाओं से वंचित रहे बच्चों और स्कूली बच्चों को बुलाकर स्टेडियम में बैठाएँगे.
ये फ़ैसला तो अच्छा है मगर टिकट बिक्री की स्थिति देखते हुए पहले ही ये फ़ैसला कर लेते तो शुरू में ही बात नहीं उठती.
पर शुरू में करते कैसे तब तो पैसे पाने पर ध्यान था.
तो अब निष्कर्ष यही लगता है कि देश में खेलों की संस्कृति का विकास और इस आयोजन का ख़र्च निकालना, ये दोनों लक्ष्य हाथ में हाथ डालकर नहीं चल पा रहे.
