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रेत से उठकर एवरेस्ट के शिखर तक | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या आप यकीन कर सकते हैं कि पेरिस के ईफिल टावर से उतरते समय बुरी तरह डर जाने वाला इंसान एक दिन दुनिया की ऊँची पहाड़ियों पर अपने देश का झंडा लहरा सकता है. ज़ैद अल रिफाई ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है. कुवैत में पैदा हुआ 38 वर्षीय यह व्यापारी अरब जगत का पहला ऐसा इंसान है जिसने दुनिया भर की सात सबसे ऊँची चोटियों पर विजय पाई है. ज़ैद 24 मई 2003 को माउंट एवरेस्ट पर पहुँचा और 19 अक्तूबर 2004 को यूरोप की कठिन मानी जाने वाली चोटी मैटरहॉर्न पर भी अपना झंडा फहराया. मैटरहॉर्न की कामयाबी के बारे में ज़ैद ने कहा, "मैटरहॉर्न एक बहुत बड़ा चैलेंज था, मैं चार बार नाकाम भी हुआ मगर ठान चुका था कि हार नहीं मानूँगा, सो कोशिश नहीं छोड़ी और कामयाब हुआ. इस चोटी पर चढ़ने के लिए ज़ैद ने स्विट्ज़रलैंड और इटली की सीमा पर तीन महीने एक बेस कैम्प में ट्रेनिंग की और अपने शरीर को ठंढक में ढालने के बाद मैटरहॉर्न की चढ़ाई केवल पाँच घंटे में पूरी की. एवरेस्ट ज़ाहिर है कि ज़ैद को सबसे अधिक कठिनाई माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान हुई होगी कि वह दुनिया की सबसे ऊँची चोटी है. वे इस कोशिश में बुरी तरह घायल भी हुए और उनको दिमाग़ में सूजन की बीमारी भी हुई मगर फिर भी ज़ैद ने हिम्मत नहीं हारी. एल्पाइन क्लब ऑफ़ पाकिस्तान के ज़ुबैर फारूकी कहते हैं "ज़ैद का कारनामा हर लिहाज से सराहनीय है, इतनी सारी चोटियों पर जीत हासिल करने के लिए केवल शरीर की नहीं, बल्कि मानसिक ताकत की भी जरूरत होती है. ऐसी क्षमता ज़ैद में कूट-कूट कर भरी है." एल्पाइन क्लब ने हाल ही में ज़ैद को उनकी कामयाबियों के लिए सम्मानित भी किया है. ज़ैद अब अपने अनुभव को अरब क्षेत्र के युवाओं के साथ बाँटना चाहते हैं. वह कहते हैं, "खाड़ी के देशों में रेत ही रेत है, बर्फ से ढँके पहाड़ नहीं हैं इसलिए यहाँ के लोगों को पर्वतारोहण में अधिक रुचि नहीं है. मगर मैं एक पर्वतारोहण क्लब के ज़रिए यह सब बदलना चाहता हूँ." ज़ैद की कामयाबी से खाड़ी के लोगों में पर्वतारोहण के लिए उत्साह पैदा होने की पूरी संभावना है. |
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