|
छोटी उम्र का एक बड़ा चैंपियन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वह अभी ग्यारह साल का है लेकिन वह शतरंज का चैंपियन है. इस छोटी सी उम्र में उसके नाम दर्जनों ख़िताब हैं और एक ग्रैंड मास्टर को भी हरा चुका है. उसका नाम परिमार्जन नेगी है और यदि उससे आप पूछ लें कि इतनी सी उम्र में चैंपियन हो जाना कैसा लगता है तो मुस्कुराकर धीरे से कहता है, “मुझे तो कुछ भी अलग सा नहीं लगता.” लेकिन उसमें बहुत कुछ अलग सा है. वह दस वर्ष से कम उम्र के खिलाड़ियों के वर्ग का कॉमनवेल्थ खेलों का गोल्ड मैडल जीत चुका है और 14 वर्ष के वर्ग में उपविजेता रह चुका है. वह 2002 में एशिया का चैंपियन रह चुका है. बैड विसेस इंटरनेशनल टूर्नामेंट, जर्मनी में उसे सबसे कम उम्र के अंतरराष्ट्रीय चैंपियन का दर्जा मिल चुका है. ऐसी दर्जनों उपलब्धियाँ परिमार्जन के खाते में हैं और वह अभी ग्रैंड मास्टर बनना चाहता है. विश्वनाथन आनंद की तरह या गैरी कास्परोव की तरह. वह कोई साढ़े चार साल का था जब उसके पिता के एक मित्र ने उसे शतरंज लाकर दे दिया था और कुछ चालें सिखा दी थीं. चालें भी उन्हीं को इसलिए सिखानी पड़ीं क्योंकि न तो परिमार्जन के पिताजी शतरंज खेलते थे न उसकी माँ. वे तो अब भी शतरंज नहीं खेलते लेकिन परिमार्जन अब विश्व स्तर का खिलाड़ी बन गया है. रणनीति परिमार्जन से शतरंज के बारे में बात करें तो अहसास होता है कि उसके भीतर एक परिपक्व खिलाड़ी है. इस सवाल पर कि वह खेलते वक्त किन बातों का ध्यान रखता है तो उसका जवाब था, “मेरा ध्यान प्रतिद्वंद्वी की चालों और उसकी रणनीति पर रहता है, मैं कोशिश करता हूँ कि मैं उसकी अगली चालों का अनुमान लगा पाऊँ और मेरा खेल भी तर्कसंगत हो.” ज़ाहिर कि अब पिता के मित्र से काम नहीं चल सकता और उसे अंतरराष्ट्रीय कोच की ज़रुरत पड़ती है. वे बताते हैं कि वे रुस के ब्रुसलान शेरबकोव और कज़ाकिस्तान के एफ़ज़ीनी ब्लादीमिरोव से कोचिंग लेते हैं. और भारत में उन्हें विशाल सरीन और जीबी जोशी शरतंज सिखाते हैं.
लेकिन क्या इस खेल से उनकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होती? इस सवाल पर परिमार्जन स्वीकार करते हैं कि असर तो होता है लेकिन उनका स्कूल उनके लिए विशेष इंतज़ाम करता है और वे अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं. परिमार्जन एमिटी इंटरनेशनल स्कूल, साकेत, दिल्ली का छात्र है और उसके स्कूल को गर्व है कि ऐसा मेधावी छात्र उनके स्कूल में पढ़ता है. गर्व उनकी माँ परिधि को भी है जो एलआईसी में अधिकारी हैं. परिमार्जन के पिता जेबी सिंह नागरिक विमानन विभाग में एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल में हैं. परिधि कहती हैं कि एक चैंपियन की माँ होना तो अच्छा लगता है लेकिन वे चाहती हैं कि आख़िरकार उसे अच्छा इंसान होना चाहिए. परिमार्जन की पढ़ाई के बारे में कहती हैं, “वह पढ़ाई में अच्छा है और एकाध दिन की पढ़ाई के बाद भी वह कक्षा में पहले दो तीन छात्रों में से एक होता है.” वह जानती हैं कि एक दिन हो सकता है कि उन्हें पढ़ाई और शतरंज में से एक को चुनने की नौबत आ सकती है तब वे यक़ीनन शतरंज को ऊपर रखेंगी लेकिन वे चाहती हैं कि परिमार्जन जितनी पढ़ाई अच्छी तरह कर सकता है उसे कर लेना चाहिए. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||