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महिला हॉकी का गढ़ झारखंड | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रतिभा अनुकूल परिस्थितियों की मोहताज नहीं होती और कुछ इसी बात की मिसाल हैं झारखंड की महिला हॉकी खिलाड़ी. जंगली बाँस को छीलकर हॉकी स्टिक बनी और फिर जो सिलसिला शुरू हुआ तो आज भी महिलाओं की राष्ट्रीय टीम में झारखंड की खिलाड़ियों का प्रमुख स्थान है भले ही सरकार की ओर से बहुत मदद न मिली हो. बिजली, पानी से वंचित गाँवों से आने वाली इन लड़कियों को ट्रायल के लिए राजधानी राँची आना होता है और उनकी बुरी माली हालत का अंदाज़ा इसी बात से लगता है कि कई बार तो राँची पहुँचने वाली इन लड़कियों के पैर में चप्पल तक नहीं होती. होती है तो सिर्फ़ एक ही धुन, कुछ कर दिखाने की. स्वर्णिम युग झारखंड में हॉकी का स्वर्णिम युग 1928 में जयपाल सिंह मुंडा के समय से माना जा सकता है. उस समय हॉकी स्टिक ख़रीदने के बारे में तो लड़कियाँ सोच भी नहीं सकती थीं इसलिए वे जंगली बाँस को छील-छीलकर हॉकी स्टिक बनाती थीं.
राज्य में महिलाओं की प्रतिभा और इस खेल की ओर उनका रुझान देखते हुए ही 1976 में राँची के बरियातू में हॉकी सेंटर का गठन किया गया था. फिर जब 1980 में बिहार महिला हॉकी संघ का गठन हुआ तब टीम को राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का मौका मिला. झारखंड तब बिहार राज्य का ही हिस्सा था और राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनीं सावित्री पूर्ति जब छोटानागपुर की इस खिलाड़ी को 1983 में टीम में शामिल किया गया. फिर तो जैसे झारखंड की महिलाओं के लिए उम्मीदों के नए द्वार ही खुल गए और यदि मौजूदा महिला टीम की बात की जाए तो 16 में से सात खिलाड़ी झारखंड की ही हैं. गाँव में इन लड़कियों का जीवन मुश्किलों भरा होता है. जंगल से लकड़ियाँ काटकर लाने से लेकर महुआ चुनने और जंगली आम बेचने से ही इनका गुज़ारा होता है. फिर देर-सबेर किसी तरह पैसे जुटाकर आख़िर वे हॉकी स्टिक ख़रीद लेती हैं. हालाँकि अभ्यास के लिए इनके पास वही बाँस या एक तरह की जंगली लकड़ी क्योंद की स्टिक होती है और भूसे में बाँस के टुकड़े भरकर उसे गोल हॉकी बॉल का आकार दिया जाता है. इस तरह शुरू होता है अभ्यास का सिलसिला. 'खस्सी टूर्नामेंट' महिलाओं में हॉकी के लिए रुचि जगाता है स्थानीय स्तर पर होने वाला एक बेहद रोचक मुक़ाबला जिसका नाम भी उतना ही कौतूहल जगाने वाला होता है. उपलब्धियाँ
राज्य के गाँवों का एक लोकप्रिय खेल है, ‘खस्सी टूर्नामेंट’. इस प्रतियोगिता में जीतने वाली टीम को खस्सी यानी एक बकरा या मुर्गी मिलती है. शुरूआती तौर पर जब लड़कियाँ पिता या भाई के साथ जब ये प्रतियोगिता देखने जाती थीं तो उनके दिल में यही बात आती थी कि एक दिन वे भी ऐसी प्रतियोगिता जीतेंगी और फिर उन्हें भी भरपेट खस्सी या मुर्गी खाने को मिलेगी. मगर अब ये शोहरत और इज्ज़त का काम होता जा रहा है. आज इन्हें पहचान चाहिए. इनका लक्ष्य होता है मुख्यमंत्री की ओर से होने वाला स्वागत, रेलवे की नौकरी, अख़बारों में तस्वीरें या टीवी पर ख़ुद को देखने की ललक. बदहाल प्रशिक्षण केंद्र राँची के बरियातू में केंद्र सरकार की ओर से संचालित होने वाले महिला प्रशिक्षण केंद्र के प्रशिक्षक मनोहर राव कहते हैं, “महिलाओं के प्रशिक्षण के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण ने 1987 में एक योजना शुरू की थी. यहाँ दो छात्रावास हैं जिनमें से एक झारखंड सरकार और दूसरा केंद्र सरकार के नियंत्रण में है.”
झारखंड सरकार की ओर से नियंत्रित होने वाले सेंटर में आज तक राज्य सरकार कोई प्रशिक्षक नियुक्त नहीं कर पाई है जबकि वहाँ भी 25 लड़कियाँ हैं. वहीं केंद्र सरकार के प्रशिक्षण केंद्र में 20 लड़कियाँ हैं जहाँ 45 रुपए प्रतिदिन प्रति लड़की मुहैया कराया जाता है. प्रशिक्षक राव कहते हैं कि ये रकम बहुत ही कम है क्योंकि लगातार अभ्यास के लिए शारीरिक क्षमता अच्छी होनी चाहिए और इसके लिए खान-पान भी अच्छा होना चाहिए. प्रमुख खिलाड़ी झारखंड की पहली महिला खिलाड़ी सावित्री पूर्ति इस समय भारतीय रेलवे में क्लर्क के पद पर कार्यरत हैं और साथ ही झारखंड और रेलवे की हॉकी टीम की प्रशिक्षक और राज्य महिला हॉकी संघ की महासचिव हैं.
सावित्री उन सुनहरे दिनों को याद करते हुए कहते हैं, “वे दिन ही कुछ और थे. कोई तनाव नहीं, बिल्कुल स्वतंत्र जीवन. खेल के अलावा कुछ और नहीं मगर अब तो परिवार का बोझ है. हमारे समय में तो सरकार ने हमें पूछा ही नहीं. नाश्ते के समय चाय-ब्रेड या कपटी(मिट्टी का छोटा प्याला) में दूध. मगर फिर भी बस एक ही जुनून था- खेल,खेल और खेल.” सोल एशियाई खेल में काँस्य पदक जीतने वाली टीम की सदस्य दयामणि सोय राँची के नौरंगा गाँव में रहती हैं. बस स्टैंड गाँव से 30 किलोमीटर दूर है. पहाड़ी इलाक़ा होने की वजह से कोई वाहन तो वहाँ पहुँच नहीं सकता इसलिए जाने के लिए बस पैरों का ही सहारा है. दयामणि को उनकी प्रतिस्पर्द्धी ‘चीन की दीवार’ कहा करती थीं. उन्हें किस्मत पर नाज है और वह कहती हैं, “सब किस्मत की बात है. मुझे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से मिलने उनसे हाथ मिलाने का मौका मिला. मगर बाद में तो सरकार की बेरुख़ी ही मिली.” दयामणि के अनुसार, “वर्षों तक कोई पूछने वाला भी नहीं था. नौकरी के लिए न जाने कितने चक्कर लगाने पड़े.” इसी तरह इंदिरा गाँधी स्वर्ण कप जीतने वाली टीम की सदस्य विश्वासी पूर्ति की रुचि बचपन से ही खेलों के लिए थी. खस्सी टूर्नामेंट देखने जाने वाली पूर्ति कहती हैं, “उस वक़्त बस एक ही बात दिमाग़ में आती थी कि टूर्नामेंट जीतने पर एक दिन तो भरपेट खस्सी-भात खाने को मिलेगा.” सरकार का लापरवाह रवैया केवल खिलाड़ियों को ही नहीं सालता. झारखंड महिला हॉकी सेंटर की पूर्व प्राध्यापिका मृदुला सिन्हा कहती हैं, “आज झारखंड इतने खिलाड़ी देता है फिर भी सरकार की ओर से बेरुख़ी ही मिल रही है.” उनका सुझाव है कि सरकार को एक नीति के तहत ये घोषणा करनी चाहिए कि वह कौन सी प्रतिष्ठित प्रतियोगिताएँ जीतने पर कितनी इनामी राशि देंगे. |
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