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2004 ओलंपिक की मशाल रौशन हुई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ग्रीस के ओलंपिया शहर में वह मशाल एक बार फिर रौशन कर दी गई है जो 2004 के ओलंपिक खेलों के दौरान जलेगी. ये वही स्थल है जहाँ 2700 साल पहले ओलंपिक खेलों की शुरुआत हुई थी. इस समारोह में ग्रीस की एक अभिनेत्री ने मशाल को ऊँची सतह वाले दर्पण के सामने रखा और सूर्य की किरणों से मशाल जल उठी. इस समारोह के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए. सैकड़ों सुरक्षाकर्मी जगह-जगह तैनात थे और हैलिकॉप्टरों, खोजी कुत्तों और मैटल डिटेक्टरों की मदद से शहर के चप्पे-चप्पे पर नज़र रखी गई. ये मशाल ओलंपिया से सात दिन का सफ़र तय कर दक्षिण ग्रीस के रास्ते चार जून तक संगमरमर के उस स्मारक भवन में स्थापित होगी जहाँ पहले आधुनिक खेल सम्पन्न हुए थे. इसके बाद उसे आस्ट्रेलिया समेत दूसरे देशों में ले जाया जाएगा. ये पहला मौक़ा होगा जब ये मशाल ओलंपिक रिंग की पहचान वाले पाँचों महाद्वीपों में जाएगी. ये पूरा सफ़र 78 दिन में तय होगा. तेरह अगस्त को मशाल वापस एथेंस पहुँचेगी और पारंपरिक समारोह के साथ ओलंपिक 2004 की शुरूआत होगी. इस मौके पर मशाल लेकर दौड़ने वाली पहली धावक रहेंगी जैवलीन में स्वर्ण पदक हासिल करने वाली पूर्व विश्व चैम्पियन कोस्तास गातसियोदिस. गातसियोदिस ये मशाल रूस के तैराक अलेक्जेंडर पोपव को सौंप देगीं, जिन्होंने 1992 और 1996 के ओलंपिक में दो-दो स्वर्ण पदक और 2000 में चाँदी का पदक जीता था. इनके अलावा दूसरे प्रमुख धावकों में होंगे - मोनॉको के प्रिंस अलबर्ट, जिन्होंने विंटर ओलंपिक में भाग लिया था. तेरह से 29 अगस्त तक एथेंस में होने वाले इन खेलों का बुधवार को हुआ 'ड्रैस रिहर्सल' काफ़ी सफल रहा. ओलंपिक की मशाल जलाने और जुलूस निकालने की परंपरा खेलों का एक अहम हिस्सा बन चुकी है. लेकिन दरअसल ये परंपरा 1936 के बर्लिन ओलंपिक खेलों में ही शुरू हुई थी. ये परंपरा उन प्राचीन खेलों का हिस्सा नहीं थी, जो 776 ईसा पूर्व में शुरू हुए माने जाते हैं. |
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