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मुसलमान महिला मुक्केबाज़ों की दास्तान
हर रोज़ सुबह होते ही कोलकाता के खिदिरपुर की बस्ती के अपने टूटे-फूटे घर से एक दुबली-पतली लड़की दौड़ती हुई निकलती है और जा पहुँचती है इंपीरियल लाइब्रेरी के हरे-भरे गार्डन में. अगले एक घंटे तक रज़िया शबनम कसरत करती हैं और सुबह की सैर करने वाले लोग उन्हें थोड़ी हैरानी के साथ देखते हैं. लोग आपस में फुसफुसाते हैं, "बचके रहना, मुक्केबाज़ है." कोलकाता के ग़रीब मुसलमान परिवार से आने वाली शबनम ने बॉक्सिंग रिंग तक लंबा रास्ता तय किया है. वे ऐसे समुदाय से आती हैं जो महिलाओं को पर्दे पर रखता है और इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता कि उनके घर की लड़की मुक्केबाज़ी करे. शबनम भारत की पहली मुसलमान महिला मुक्केबाज़, प्रशिक्षक और अंतरराष्ट्रीय स्तर की रेफ़री हैं.
इस समय भारत में लगभग 150 महिला मुक्केबाज़ हैं और उनमें से ज़्यादातर कोलकाता के मुस्लिम परिवारों से आती हैं. इन सभी महिला मुक्केबाज़ों को दुनिया के सबसे नामी मुक्केबाज़ मोहम्मद अली की बेटी लैला अली से प्रेरणा मिलती है जो इन दिनों बॉक्सिंग करती रही हैं. वे अपने मुहल्ले के एक और लड़के मोहम्मद अली क़मर की भी ख़ासी इज़्ज़त करती हैं, क़मर ने मैनचेस्टर में पिछले कॉमनवेल्थ खेलों में बॉक्सिंग में स्वर्ण पदक जीता था. रज़िया शबनम के समाजसेवी पिता राहत हुसैन कहते हैं, "ये लड़कियाँ बॉक्सिंग को अपने समाज की मान्यताओं के ख़िलाफ़ जिहाद की तरह अपना रही हैं." शुरूआती समस्याएँ ज़ाहिर है, परंपरागत माहौल से निकलकर मुक्केबाज़ी को अपनाना किसी मुस्लिम महिला के लिए आसान फ़ैसला नहीं है.
कोलकाता में बॉक्सिंग क्लब चलाने वाले असित बनर्जी याद करते हैं कि किस तरह ये लड़कियाँ बुर्क़ा पहनकर निकलती थीं और बॉक्सिंग रिंग में आकर ही खेल के कपड़े पहनतीं थीं. असित बनर्जी बताते हैं कि उन पर लड़कियों को रास्ते से भटकाने का आरोप भी लगते रहे हैं, "लोग नाराज़ होते हैं, रिश्तेदार लड़कियों को डाँटते हैं, कुछ उर्दू अख़बारों ने मुझे काफ़िर तक कहा." असित कहते हैं कि अब स्थिति बदल रही है और लड़कियाँ बड़ी संख्या में आ रही हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि उनकी समस्याएँ कम हो गई हों, मिसाल के तौर पर शबनम अपने मुहल्ले की पहली मुस्लिम महिला ग्रैजुएट हैं लेकिन उन्हें अब तक कोई नौकरी नहीं मिली है. वे ग़रीब लड़कियों को पढ़ाकर वे मुश्किल से 600 रूपए कमा पाती हैं, दूसरी लड़कियाँ सिर्फ़ इस उम्मीद के साथ जुटी हैं कि अगर वे कोई पदक जीत गईं तो उन्हें कहीं नौकरी मिल जाएगी. अब भी दिक़्कतें रेलवे, बैंक, टाटा स्टील और इंडियन एअरलाइंस जैसी कंपनियों में खिलाड़ियों को नौकरी मिलती रही है लेकिन मुक्केबाज़ों, और वो भी महिला मुक्केबाज़ों के लिए किसी के पास नौकरी नहीं है. असित बनर्जी कहते हैं, "मुक्केबाज़ी इन लड़कियों की पहचान से जुड़ा है, वे अब गुमनाम लड़कियाँ नहीं हैं जो चारदीवारी के पीछे चुपचाप ज़िंदगी गुज़ार दें."
ये लड़कियाँ न सिर्फ़ एक कमरे के घरों में बड़े परिवारों के बीच रहती हैं बल्कि उन्हें बॉक्सिंग के लायक़ ख़ुराक़ भी नहीं मिलती. आम तौर पर उनका खाना दाल रोटी ही होती है, कभी-कभी मुर्गी के वे टुकड़े जिन्हें आम ग्राहक नहीं लेना चाहते. लेकिन इन लड़कियों में जोश की कमी नहीं, वे हफ़्ते में छह दिन तीन-तीन घंटे तक मुक्केबाज़ी करती हैं. चमकीली आँखों वाली 17 वर्षीय साजिदा परवीन एक कालीन बुनने वाले मज़दूर की बेटी हैं और अब तक सात प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं. वे कहती हैं, "मेरे परिवार के लोग कहते थे कि मैं मुक्केबाज़ी करूँगी तो मेरा चेहरा ख़राब हो जाएगा, मैं लड़की नहीं रह जाऊँगी लेकिन अब मुझे बॉक्सिंग के अलावा किसी और चीज़ से प्यार नहीं." शबनम कहती हैं कि दिक़्कतें हैं लेकिन लड़कियाँ इतनी आसानी से हार नहीं मानेंगी, वे कहती हैं बॉक्सिंग से हमें पहचान मिली है जो कोई मामूली चीज़ नहीं. |
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