खेल पुरस्कारों को लेकर क्यों होता है विवाद?

इमेज स्रोत, Ian MacNicol/Getty images
- Author, नॉरिस प्रीतम
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
वर्ष 1974 में जब मैराथन रनर दिवंगत शिवनाथ सिंह तत्कालीन राष्ट्रपति से अर्जुन पुरस्कार लेकर राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों पर अपने दोस्तों और साथी एथलीटों से मिले तो उनसे मिलने वालों में मैं भी था.
मेरे लिए उनका पहला रिएक्शन था, "इस (पुरस्कार) को रखने के लिए घर तक तो है नहीं क्या करेंगे इसका?"
शिवनाथ सेना में जवान थे और उनका कोई पुश्तैनी घर वग़ैरह नहीं था.
6 साल बाद 1980 में जब फुटबॉल के सुपरस्टार मोहम्मद हबीब को वही अर्जुन अवॉर्ड मिला तो उनका रिएक्शन भी शिवनाथ से खास फ़र्क नहीं था.
"एक शॉर्ट्स और टी-शर्ट के लिए खेलो और यह अवॉर्ड जीतो."
इन दोनों महान खिलाडियों के यह कमेंट्स उस समय के हैं जब इन भारतीय खेल पुरस्कारों में पैसा नहीं था. हाँ, एक बात ज़रूर थी की इन चुने हुए खिलड़ियों की क़ाबलियत पर कोई आँख नहीं उठा सकता.
अब उठ रहे हैं सवाल

इमेज स्रोत, Ian MacNicol/Getty images)
पिछले कुछ सालों में यह पुरस्कार विवादों से घिरे हैं. खिलाडियों पर उंगलियां उठी हैं और साथ ही चयन प्रणाली और चयनकर्ताओं पर भी सवाल उठते हैं.
अब इसका कारण पुरस्कार में मिलने वाली 5 लाख की इनाम राशि हो या फिर कोई और वजह. लेकिन यह तो है की एक तरह से पुरस्कारों का बाज़ारीकरण हो गया है.
खिलाडियों के एजेंट्स और उनकी कंपनियां कभी-कभी अपने खिलाड़ियों को अवॉर्ड दिलवाने के चक्कर में हद पार कर जाती हैं.
इस वर्ष के राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार को लेकर भी विवाद छिड़ा है.
चयनकर्ताओं ने हॉकी के पूर्व कप्तान सरदार सिंह और दिव्यांग जेवलिन थ्रोअर देविंदर झाझरिआ को सयुंक्त विजेता चुना.
सवाल ये उठा की क्या सरदार को पुरस्कार मिलना चाहिए क्योंकि उन पर इंग्लैंड की एक पूर्व महिला हॉकी खिलाडी ने आरोप लगाकर पुलिस में शिकायत दायर कर रखी है. महिला खिलाड़ी ने सरदार पर यौन शोषण का आरोप लगाया है.

इमेज स्रोत, PHILIPPE DESMAZES/AFP/Getty Images
जो लोग सरदार को जानते हैं, जिनमे मैं भी शामिल हूँ, उनके लिए यह बात गले से नहीं उतरती.
सरदार जितना खेल के मैदान में उच्च कोटि के खिलाड़ी हैं उससे कहीं ज़्यादा मैदान के बाहर एक बहुत ही अनुशासित और शील इंसान हैं.
दरअसल सरदार की और भारतीय मूल की उस महिला खिलाड़ी की शादी की बात तय थी. यहाँ तक की वो लड़की सरदार के घर पंजाब में आकर भी रही.
लेकिन जब किसी वजह से शादी को लेकर खटास पैदा हुई तो उस महिला ने यह रास्ता इख्तयार किया.
'शिकायत कोई भी किसी के खिलाफ कर सकता है'
तीन साल पहले दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री ने एक कार्यक्रम कराया था. उसमें भारत के पूर्व गोलकीपर शंकर लक्ष्मण की पत्नी भी आयी थीं.
करीब 85 वर्षीय वो महिला व्हील चेयर पर थीं. कई हॉकी के पूर्व और वर्तमान खिलाड़ी उनसे मिले लेकिन जिस तरह से सरदार उनसे मिले उससे उनके चरित्र की झलक साफ़ नज़र आयी थी.
सरदार ने उनके पांव में अपना सर झुका कर उनसे आशीर्वाद लिया और कहा कि "शंकर लक्ष्मण जी से तो नहीं मिला लेकिन आपके कदमों में सर झुका कर अपने आप को गौरवशाली महसूस कर रहा हूँ."
ऐसे खिलाड़ी पर लंदन की उस महिला खिलाड़ी का आरोप कुछ जमता नहीं.
वैसे भी अभी मामला शिकायत तक सीमित है. शिकायत कोई भी किसी के ख़िलाफ़ कर सकता है.
ऐसे में क्या सरदार सिंह या किसी अन्य खिलाडी को इसकी बिना पर अवॉर्ड से वंचित रखना चाहिए?

इमेज स्रोत, PUNIT PARANJPE/AFP/Getty Images
सरदार सिंह उस भारतीय टीम के कप्तान थे जिसने 2015 के एशियाई गेम्स में पाकिस्तान को फ़ाइनल में हरा कर गोल्ड जीता था और रियो ओलम्पिक के लिए क्वालिफाई किया था.
सरदार की तरह झाझरिआ पर कुछ विवाद है उनके व्यक्तित्व पर ना भी सही.
कई लोगों का कहना है कि दिव्यांगों के लिए एक अलग कैटेगरी होनी चाहिए. उनका मत है की इस कैटेगरी में मुकाबला कम होता है और मैडल जीतना थोड़ा आसान होता है.
द्रोणाचार्य और ध्यानचंद पुरस्कार की चयन कमिटी में कुछ चयनकर्ताओं ने इस बात को उठाया. अगर मानव अधिकारों के दृष्टि से देखें तो यह बात गलत लगती है. लेकिन अगर दिव्यांगों के खेल अलग हैं तो पुरस्कार भी अलग क्यों न हो यह तर्क बार-बार सामने आता है.
सवाल यह की क्या इन पुरस्कारों में दिल से काम लेना चाहिए या दिमाग और तर्क से.
हरमनप्रीत कौर के पुरस्कार पर भी सवाल

इमेज स्रोत, Richard Heathcote/Getty Images
महिला क्रिकेट में हरमनप्रीत कौर को मिले अर्जुन पुरस्कार पर भी सवालिया निशान लगाए गए हैं.
कुछ लोगों का मानना है की हरमनप्रीत के बदले भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज को यह पुरस्कार मिलना चाहिए था.
यह बात अलग है की खेल के आधार पर हरमनप्रीत का प्रदर्शन मिताली से अच्छा था. यह सवाल उठ रहा है की यह पुरस्कार सिर्फ खेल प्रदर्शन पर देने चाहिए या पॉपुलरिटी को भी ध्यान में रखना चाहिए.
अगर भारतीय टीम वर्ल्ड कप के फाइनल में न पहुँचती तो यह सब बवाल होता ही नहीं. चढ़ते सूरज को सलाम करने वाली बात है.
लेकिन क्योंकि अभी इन पुरस्कारों को सिर्फ़ चयनकर्तओं ने चुना है, फाइनल लिस्ट पर सरकारी मुहर अभी बाक़ी है.
अगले दो तीन दिन में विवाद बढ़ भी सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












