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2003 में अर्थव्यवस्था
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अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था

 

आर्थिक मज़बूती-मंदी, इराक़ पर युद्ध में तेल की भूमिका, इराक़ के पुनर्निर्माण के ठेके, कैनकुन में अमीर और ग़रीब देशों के बीच आम राय नहीं होने से विश्व व्यापार संगठन की बैठक की विफलता, अमरीकी अर्थव्यवस्था की सुधरती तस्वीर और एशिया में विकास के सबसे तेज़ होने की बातों के बीच वर्ष 2003 गुज़र गया.

साल जब शुरू हुआ तो हर तरफ़ यही हायतौबा मची थी कि अमरीका इराक़ के तेल पर नज़र लगाए है और व्यापक विनाश की क्षमता वाले हथियारों के नाम पर इराक़ पर हमला करके इराक़ के तेल पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहता है.

इराक़ पर हमला हुआ, अमरीका ने वहाँ नियंत्रण प्राप्त कर लिया और अब उसका कहना है कि इराक़ के पुनर्निर्माण के ठेके उसी को दिए जाएँगे जिन्होंने हमले में अमरीका की मदद की हो.

इस तरह एक नए विवाद का जन्म हुआ और इस विवाद की दुनिया भर में निंदा भी हुई.

अर्थव्यवस्था में सुधार

इस बीच अमरीका की अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत मिले. अमरीका की अर्थव्यवस्था के जुलाई से सितंबर तक के आँकड़े दिखाते हैं कि इस दौरान वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही और उसकी अर्थव्यवस्था उम्मीद से भी तेज़ी से आगे बढ़ रही है.

उधर आर्थिक सहयोग और विकास से लिए गठित संगठन 'द ऑर्गनाइज़ेशन फ़ॉर इकॉनॉमिक कोऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट' ने घोषणा की कि विश्व की अर्थव्यवस्था अब मंदी से उबरती नज़र आ रही है.

संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में कारोबार गति पकड़ने लगा है.

उधर एशिया डेवलपमेंट बैंक के अनुमानों के अनुसार दक्षिण एशिया में इस साल अच्छी फसल की संभावना रही और इससे आर्थिक विकास की दर भी अच्छी होने की संभावना भी व्यक्त की गई.

बैंक की एक रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि पिछले दिनों सार्स बीमारी के कारण पड़े आर्थिक असर के बावजूद एशियाई देश दुनिया में सबसे तेज़ी से विकास कर रहे हैं.

भारत

भारत की अर्थव्यवस्था के भी सुधरने की बात कही जा रही है.

यह साल अच्छी वर्षा वाला रहा. कई साल से पानी की कमी से मार खा रहे किसान को ज़रूर कुछ राहत मिली.

पिछले वर्ष, कृषि क्षेत्र 13.8 प्रतिशत से घटा था मगर अब मॉनसून के बाद उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था में सात प्रतिशत की बढ़त होगी.

अख़बारों में चर्चा आम है 'फ़ील गुड फ़ैक्टर' की. शेयर बाज़ार ने 5,000 अंक पार किए और इसे भी ख़ूब सराहा गया.

इस फ़ील गुड के साथ ही कुछ 'फ़ील बैड' भी रहा.

बेरोज़ग़ारी बढ़ी और बढ़ा बजट घाटा जो कि ख़तरे के निशान से ज़्यादा है.

इसके अलावा सेवा क्षेत्र को छोड़कर निर्यात दर निराशाजनक रही है.
 
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