![]() | ||
![]() अकाल तख़्त के पूर्व जत्थेदार – जोगिंदर सिंह वेदांती के अनुभव जब ऑपरेशन ब्लूस्टार घटा तब मैं हरिमंदिर साहब में ग्रंथी था. मैं तीन जून को केंद्रीय रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स के साथ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के कुछ सेवादारों की झड़प के समय हरिमंदिर साहब में ही था. शाम को कर्फ़्यू लगा दिया गया था, लेकिन उन दिनों ये होता ही रहता था. अनेक श्रद्धालु, लगभग पाँच हज़ार लोग, गुरु अरजन देव के शहादत दिवस के मौक़े पर हरिमंदिर साहब में दर्शन के लिए आए हुए थे. चार जून को मैं तड़के परिसर के अंदर आया. भाई अमरीक सिंह हरिमंदिर साहब में कीर्तन कर रहे थे. सुबह लगभग चार बजे एक बहुत ही बुलंद आवाज़ वाला गोला सिंधियों की धर्मशाला पर गिरा जो अकाल तख़्त के पास स्थित थी. ख़ासी मोर्चाबंदी, भीषण फ़ायरिंग
वहाँ मौजूद श्रद्धालु सहम गए. कई लोग दर्शन कर वापस निकलने लगे. शाम को दोनो और से गोलियाँ चलने लगीं. मेरा घर पिछले 40 साल से परिसर में ही पहली मंज़िल पर है. यहाँ भी चारों और और मेरे घर के ऊपर भी सिख लड़ाकों ने मोर्चाबंदी की हुई थी. चारो तरफ़ से गोलियों की बारिश हो रही थी. उस समय तक हरिमंदिर साहब परिसर के साथ कई इमारतें जुड़ी हुई थीं और आसपास के सभी मकानों पर सेना के जवानों ने पोज़िशन ले रखी थी. मशीनगनें इन मकानों की छतों पर लगाई गई थीं. उसके बाद पाँच तारीख की रात को तो बहुत भीषण गोलाबारी हुई और टैंकों और बख़्तरबंद गाड़ियों से भी फ़ायरिंग हुई. फिर टैंक परिसर के बीच भी आ गए, मैंने चार टैंक देखे. सिख लड़ाकों ने एक टैंक पर रॉकेट दाग़ा और उसे नकारा कर दिया. छह को सुबह आठ बजे तक पूरी तरह सेना परिसर में दाख़िल हो गई थी. उन्होंने एक-एक कमरे में बम फेंके और वहाँ मौजूद लोगों को बाहर निकालने की कोशिश की, कई लोग इस कार्रवाई के दौरान भी मारे गए और कई जगह पर आग लग गई. सीधा टकराव छह जून की सुबह अकाल तख़्त में संत जरनैल सिंह के साथ लगभग 15-20 लोग होंगे. इसके अलावा अकाल तख़्त के सेवादार और हेड ग्रंथी भाई प्रीतम सिंह और कुछ अन्य लोग भी वहाँ थे. बाक़ी सभी लोग अकाल तख़्त से समय-समय पर बाहर निकल गए थे. छह की सुबह ही संत जरनैल सिंह, सिख स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन के भाई अमरीक सिंह और उनके 13-14 साथियों का सीधा टकराव सेना से हुआ. ये झंडा बुंगा यानी जिस जगह पर आप दो निशान साहिब देख सकते हैं, वहाँ हुआ. इस टकराव में संत जरनैल सिंह, भाई अमरीक सिंह और उनके साथी मारे गए.
छह को शाम पाँच बजे गोलाबारी बंद हुई. परिक्रमा में फ़र्श पर चारो और गोलियों के खोखे बिखरे हुए थे. कई जगह शव पड़े थे और ख़ून बिखरा हुआ था. तब मुझे और लगभग 50 सेवादारों को और 250-300 अन्य लोगों को परिसर के आट्टा मंडी के पास वाले क्षेत्र से गिरफ़्तार किया गया. कई कमरों से आग निकल रही थी. सेना जिस भी नौजवान को देखती उसे अलग कर किसी और जगह ले जाती थी. हरिमंदिर साहब में पाठ तो पहले ही बंद हो चुका था. पाँच जून तक हम ड्यूटी करते रहे लेकिन इसके बाद छह, सात और आठ तारीख को गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश वहाँ नहीं हुआ. फिर सेना ने अपने ग्रंथी लाकर प्रकाश किया. हमें एक स्कूल में रखा गया जहाँ लगभग चार हज़ार अन्य लोग भी थे. हमें फिर 19 जून को रिहा किया गया. (सभी तस्वीरें और रिपोर्टिंग: बीबीसी संवाददाता अतुल संगर) | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ^^ऊपर चलें | |||