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![]() तेल का खेल जब इस वर्ष की शुरुआत से ही लगभग पूरी दुनिया में ज़रूरी सामानों की क़ीमतें बढ़नी शुरु हुई तो सबका ध्यान कच्चे तेल पर गया. आख़िर इसी तेल के सहारे सामानों की ढुलाई होती है, कारखानों में काम होता है और उद्योग धंधे फल-फूल रहे होते हैं.
जब तेल के दाम में 'आग' लगनी शुरु हुई तो बाकी सामानों के दाम भी बढ़ने लगे. हालाँकि यही एकमात्र कारण नहीं कहा जा सकता. मसलन खाद्यान्न उत्पादन में कमी का इससे कोई लेना-देना नहीं है. पर भारत जैसे देशों में तेल की ऊंची क़ीमतों ने बढ़ती महँगाई में घी डालने का काम किया जहाँ उर्जा का सबसे बड़ा साधन पेट्रोलियम पदार्थ हैं. बल्कि यूँ कहें कि भारत की अर्थव्यवस्था जो दिसंबर 2007 तक सरपट भाग रही थी, तेल के दाम बढ़ने से रेंगने लगी है. कारण यही है कि भारत कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम बढ़ने का सीधा असर भारत पर पड़ा है-प्रत्यक्ष भी परोक्ष भी. असर अब अगर कोई कहे कि भारतीय शेयर बाज़ार की गिरावट का तेल से क्या लेना-देना तो जवाब साफ है. तेल के दाम बढ़ने से भारतीय तेल मार्केटिंग कंपनियों को नुकसान तो हुआ ही, तेल के आसरे टिकी बुनियादी संरचना की कंपनियों, बिजली कंपनियों को भी नुकसान हो रहा है. अब इन पर आश्रित दूसरे क्षेत्रों को नुकसान हो रहा है. मतलब एक के बाद एक अर्थव्यवस्था 'दुष्चक्र' में फँसती गई. क़ीमतें बढ़ीं तो ब्याज़ दर बढ़ाए गए ताकि बाज़ार में लोगों को आसानी से कर्ज़ ना मिले. मतलब बैंकिंग कंपनियों के फलते-फूलते कारोबार पर बट्टा लगा. जब ये सब हो रहा हो तो भारत में चांदी काटने आए विदेशी निवेशक कन्नी काटने लगते हैं. नतीजा, उन्होंने भी पैसा खींच लिया और शेयर बाज़ार धड़ाम! हम कह सकते हैं कि ये सब तेल का खेल है. इसलिए इस खेल के मैदान, खिलाड़ियों और रेफरी के बारे में जानना ज़रूरी है. प्रस्तुति: आलोक कुमार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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