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![]() फ़लस्तीनी संघर्ष के प्रतीक- अराफ़ात का निधन फ़लस्तीनी संघर्ष के प्रतीक और फ़लस्तीन समस्या की ओर पहली बार दुनिया का ध्यान आकर्षित करने वाले यासिर अराफ़ात का 11 नवंबर को पेरिस के एक अस्पताल में निधन हो गया.
वे 75 साल के थे. अराफ़ात तीन नवंबर से ही बेहोशी की हालत में थे और बाद में उनके दिमाग़ की नसें फट गई थीं. वे गंभीर रूप से बीमार थे और इलाज के लिए उन्हें पेरिस के एक सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहाँ डॉक्टर लगातार उनकी सघन चिकित्सा कर रहे थे. फ़लस्तीनी प्रशासन के मुख्य वार्ताकार और वरिष्ठ नेता साएब एराकात ने अराफ़ात की मृत्यु के दिन को 'फ़लस्तीनी इतिहास में काला दिन' बताया. मृत्यु से कुछ दिन पहले उनकी हालत बहुत बिगड़ गई और उन्हें मशीनों के सहारे ज़िंदा रखा गया था. अराफ़ात की मौत की ख़बर से फ़लस्तीनी क्षेत्रों में मातम छा गया.
वहीं पश्चिमी नेताओं ने अराफ़ात की मौत से मध्य पूर्व की समस्या को सुलझाने का कोई नया रास्ता खुलने की संभावना जताई. विश्व नेताओं की प्रतिक्रिया ज़्यादातर नेताओं ने यासिर अराफ़ात को प्रमुख फ़लस्तीनी राजनीतिक नेता क़रार दिया जबकि इसराइल के एक मंत्री ने अराफ़ात को "इसराइल के ख़िलाफ़ आतंकवाद का नेता" कहकर पुकारा. बीबीसी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के संवाददाता पॉल रेनॉल्ड्स के अनुसार इसराइल के पास शांति की ओर बढ़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा क्योंकि वह लगातार कहता रहा है कि 'शांति के रास्ते में अराफ़ात सबसे बड़ा रोड़ा हैं.' अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने कहा कि फ़लस्तीनी प्रशासन के नए नेतृत्व के साथ शांति वार्ताओं की फिर से शुरुआत हो सकती है.
बुश का कहना था कि अगर लोग आगे आएंगे तो अमरीका को उनकी मदद करने में कोई आपत्ति नहीं होगी. रामल्ला में दफ़नाया फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को पश्चिमी तट के शहर रामल्ला में संगमरमर और पत्थर से बनी एक क़ब्र में दफ़नाया गया. रामल्ला में मौजूद बीबीसी संवाददाता का कहना था कि अंतिम श्रद्धाँजलि देने के लिए हज़ारों की संख्या में उनके फ़लस्तीनी समर्थक रामल्ला पहुँचे और चारों ओर अफ़रा-तफ़री मच गई. अराफ़ात का शव काहिरा से लेकर आने वाला हेलीकॉप्टर जैसे ही ज़मीन पर उतरा तो उनके शोक संतप्त समर्थकों ने हवाई फ़ायर किए.
इससे पहले उनका शव मिस्र की राजधानी काहिरा ले जाया गया जहाँ राजकीय सम्मान के साथ शोक सभा हुई और उनके शव को दफ़नाने के लिए पश्चिमी तट के रामल्ला में उनके परिसर ले जाया गया. इस अवसर पर दुनिया के विभिन्न देशों के राजनीतिक नेताओं ने काहिरा पहुँचकर अराफ़ात को श्रद्धाँजलि दी जिनमें भारतीय नेता भी शामिल थे. भारत से जो राजनीतिक नेता पहुँचे उनमें विदेश मंत्री नटवर सिंह, रेल मंत्री लालू यादव, संसदीय कार्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद और विदेश राज्य मंत्री ई अहमद शामिल थे. काहिरा में राजकीय सम्मान के साथ अराफ़ात की शवयात्रा निकाली गई. जहाँ अल्जीरिया, बांग्लादेश, मिस्र, इंडोनेशिया, लेबनान, दक्षिण अफ़्रीका, सूडान, ट्यूनीशिया, यमन और ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति काहिरा पहुँचे, वहीं पाकिस्तान, श्रीलंका, मलेशिया और स्वीडन के प्रधानमंत्री काहिरा शामिल हुए. अमरीका की ओर से सहायक विदेश मंत्री विलियम बर्न्स पहुँचे जबकि ब्रिटेन की ओर से विदेश मंत्री जैक स्ट्रॉ श्रद्धांजलि देने पहुँचे. जोर्डन के शाह अब्दुल्ला और सऊदी अरब के युवराज अब्दुल्ला भी अराफ़ात को श्रद्धाँजलि देने काहिरा गए. अराफ़ात की क़ब्र में यरूशलम की अल अक़्सा मस्जिद की मिट्टी भी मिलाई गई. उनका शव एक ऐसे ताबूत में रखकर दफ़नाया गया जिसे ज़रूरत पड़ने पर सुरक्षित निकाला जा सके. फ़लस्तीनियों का कहना है कि उनको उम्मीद है कि कभी भविष्य में उनके ताबूत को यरूशलम ले जाने की इजाज़त मिली तो वे अराफ़ात का शव निकालकर उन्हें यरूशलम में दफ़न कर सकेंगे. अराफ़ात की इच्छा थी कि उन्हें यरूशलम में ही दफ़नाया जाए मगर इसराइल ने इसकी अनुमति नहीं दी. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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