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अमरीका से शुरुआत" />संकट का जड़ खेल शुरु हुआ अमरीका के सब प्राइम संकट से. ये संकट था घर ख़रीदने के लिए कर्ज़ लेने वाले की ख़स्ताहाली से. भारी संख्या में ऐसे लोन वाले लोग कर्ज़ की किश्त चुकाने में नाकाम रहे और बदले में अपने घर को नीलाम कराने के लिए आगे आने लगे.
बस सारी दिक्कतें यहीं से शुरु हो गई. आख़िर बैंक इन घरों का क्या करते? मान लीजिए किसी अमरीकी ने एक लाख डॉलर का कर्ज़ लिया और एक आसियाना ख़रीदा लेकिन ख़स्ताहाली के आलम में रूपए के बदले घर ही लौटा दिया. अब ऐसे में बैंक घर ले भी ले लें तो नकदी कहाँ से लाएंगे. इस संकट ने अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी. अमरीकी केंद्रीय बैंक के पूर्व गर्वनर एलन ग्रीन्सपैन की 'बाज़ार में पैसा छोड़ो' की नीति विफल साबित हुई दिख रही है. लेहमन ब्रदर्स और वाचोविया जैसे वित्तीय संस्थान पानी माँगने लगे. नतीजा नतीजा, खुले बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था की हिमायत करने वाले अमरीका को इन संस्थानों को बचाने के लिए आगे आना पड़ा. ये एक तरह से राष्ट्रीयकरण जैसा क़दम ही है क्योंकि अमरीकी सरकार ने दिवालिया होने की कगार पर आ चुके इन संस्थानों और बैंकों में सरकारी हिस्सेदारी ले ली.
ख़ैर, अमरीकी सरकार अपने पास मौजूद पर्याप्त नकदी का इस्तेमाल कर इस स्थिति से निपट सकती है. उसके पास डॉलर छापने का भी विकल्प मौजूद है क्योंकि दुनिया की अन्य मुख्य मुद्राएँ डॉलर की तुलना में ही आँकी जाती है. लेकिन अमरीका से आपसी व्यापार के सहारे देशों को इसकी भारी मार भुगतनी पड़ रही है. यूरोपीय देशों की हालत तो और ख़राब है. भारत भी इससे अछूता नहीं, लेकिन निश्चित रुप से इसका कोई ख़ास असर यहाँ नहीं पड़ेगा, ऐसा सरकार मानती है. कारण साफ हैं, भारत में बैंकों, वित्तीय संस्थानों, बीमा कंपनियों में शत प्रतिशत विदेशी निवेश नहीं है और हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की एक निश्चित सीमा निर्धारित है. साथ ही धीरे-धीरे विश्व बाज़ार से जुड़ने की भारतीय नीति भी कारगर साबित हो रही है. यहाँ रूपया पूर्ण परिवर्तनीय नहीं है. मतलब कोई भी विदेशी निवेशक भारत में अपनी संपत्ति को डॉलर में बदलकर रातोरात यहाँ से पैसा अपने देश में हस्तांतरित नहीं कर सकता. इसके बावजूद आईटी, कपड़ा जैसे क्षेत्र में निर्यात का बड़ा हिस्सा अमरीका को जाता है और भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक मंदी का असर लाज़िमी है. हम आगे जानने की कोशिश करेंगे कि इस मंदी ने भारतीय शेयर बाज़ार पर क्या असर छोड़ा है. प्रस्तुति - आलोक कुमार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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