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कौन है किसके भरोसे?
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हिंदुस्तान, भारत और इंडिया
 
 
 
 
 
 
फ़ुटपाथ

हिंदुस्तान, भारत और इंडिया

 

हिंदुस्तान, भारत और इंडिया

पहले सिर्फ़ एक देश था, उसी को हिंदुस्तान कहते थे, उसी को भारत और बाद में उसी को इंडिया कहा गया. विभाजन का विवाद खड़े किए बिना अगर देखें तो बहुत से लोगों के लिए ये तीनों अब भी एक हैं.

लेकिन जो लोग देश की नब्ज़ को पहचानते हैं और ज़मीनी हक़ीकतों से वाकिफ़ हैं वे जानते (या मानते) हैं कि ये तीनों एक देश के भीतर बसे तीन देश हैं.

इंडिया वो है जो महानगरों की अट्टालिकाओं में बसा करता था और अब तेज़ी से छोटे शहरों में भी दिखने लगा है. इंडिया विकसित है. इसमें देश की जनसंख्या का इतना ही प्रतिशत रहता है जिसे ऊँगलियों पर गिना जा सके. उच्च आय वर्ग वाला और तमाम सुख सुविधाओं से लैस. इनके शहर योजना के अनुसार बसते हैं और अगर बिना योजना के बदलते हैं तो उसे योजना में शामिल कर लिया जाता है.

इसके ठीक पास में रहता है भारत. यह विकासशील है. इसमें आबादी का वो हिस्सा रहता है जो इंडिया की रोज़मर्रा की ज़रुरतों की आपूर्ति करता है. मसलन घरेलू काम करने वाली बाई, कार की सफ़ाई करने वाला, दूध वाला, धोबी, महाअट्टालिकाओं के गार्ड, इलेक्ट्रिशियन और प्लंबर आदि-आदि. भारत में रहने वालों के पास अक्सर न अपना कहने के लिए ज़मीं होती है और न अपनी कोई छत. वो झुग्गियों में रहता है, अवैध बस्तियों में या फिर शहर के कोने में बच गए पुराने किसी शहरी से गाँव में.

इंडिया का कोई ऐसा काम नहीं है जो भारत के बिना चल जाए. पता नहीं भारत का काम इंडिया के बिना चल सकता है या नहीं. लेकिन विकासशील होने के नाते विकास की सहज इच्छा से वह विकसित इंडिया के पास रहता है. अक्सर ऐसा लगता है कि इंडिया की योजनाओं में भारत की हाशिए के अतिरिक्त कोई जगह नहीं है. न बसाहट में न जीवन शैली में. न वर्तमान में और न भविष्य में. इंडिया अक्सर या शायद हमेशा, भारत को हिकारत की नज़र से देखता है.

लेकिन यह सवाल बार-बार ज़हन में उठता है कि कौन किसके भरोसे हैं. बदलने का दावा कर रहे एक देश में यह सवाल अहम दिखता है और इस सवाल के जवाब में ही संतुलित विकास का मंत्र भी छिपा दिखता है.

और हाँ, रह गया हिंदुस्तान. तो वह इस देश की अर्थव्यवस्था का सबसे अनदेखा हिस्सा है. अविकसित, पिछड़ा हुआ और सबसे ग़रीब. भारत से भी ग़रीब. हिंदुस्तान को आप गाँव में रहने वाले लोगों से पहचान सकते हैं. वह आज भी खेती करता है या कृषि आधारित गतिविधियों से ही रोज़गार जुटाता है. वह तो इस बदलते भारत का हिस्सेदार अभी भी नहीं दिखता. लिहाज़ा उसकी चर्चा फिर कभी.
 
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