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2003 की किताबें
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2003 की किताबों पर बात
 
 
 
 
बीते साल की कुछ महत्वपूर्ण किताबों पर चर्चा

2003 की किताबें

 

हर साल की तरह एक साल और बीत गया.

इस साल भी हर साल की तरह ढेरों किताबें छपीं. इनमें से बहुत सारी पढ़ी गईं और कुछ सराही गईं.

इससे पहले कि वे महत्वपूर्ण किताबें अतीत का या लाइब्रेरी का हिस्सा हो जाएँ यह जान लेना महत्वपूर्ण है कि इन किताबों के ढेर से ऐसी कौन सी किताबें ऐसी हैं जिनको ढूँढ़ा जाए और उनमें से कुछ को पढ़ने का समय निकाल लिया जाए.

अंग्रेज़ी और अन्यान्य भाषाओं में अपने साहित्यकारों से उनकी पसंद की किताबों के बारे में जानने समझने की एक समृद्ध परंपरा है.

लेकिन हिंदी में एक तो ऐसी परंपरा नहीं है और दूसरे ऐसा सवाल पूछते ही हिंदी के साहित्य समाज में वाद और खेमे का सवाल उठने लगता है.

विनोद कुमार शुक्ल ठीक कहते हैं कि इसी तरह के सवालों के चलते पढ़ी हुई किताबों का ढेर जितना बड़ा होता है उससे बहुत बड़ा बिना पढ़ी हुई किताबों का होता है.

इस बार हमने हिंदी के दो प्रमुख साहित्यकारों से जानना चाहा कि उन्होंने 2003 में जो किताबें पढ़ीं उनमें से कौन सी दस किताबें उन्हें महत्वपूर्ण लगीं और क्यों.

अशोक वाजपेयी और गिरधर राठी ने बीबीसी हिंदी के पाठकों के लिए अपनी सूची हमें भेजी हैं.

इनमें से कुछ किताबें हो सकता है कि 2003 से कुछ पहले प्रकाशित हो चुकी हों लेकिन उनका ज़िक्र अब आ रहा हो.

अशोक वाजपेयी इस समय के प्रमुख संस्कृतिकर्मियों और साहित्यकारों में से एक हैं. वे कवि और समीक्षक हैं. भोपाल के भारत भवन की परिकल्पना से लेकर अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति होने तक उन्होंने ढेर सारे महत्वपूर्ण किए हैं.

लेखक और कवि गिरधर राठी इस समय रचे जा रहे साहित्य पर गंभीर नज़र रखे हुए हैं. वे साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' के संपादक हैं.

जो सूची इन दोनों विद्वानों ने हमें भेजी हैं उनमें हिंदी के अलावा दूसरी भाषा की किताबें भी हैं, खासकर अंग्रेज़ी की. जो अंग्रेज़ी की नहीं हैं उनका अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध है.
 
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