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![]() बदलता मौसम बदलता मौसम मौसम परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 1997 में क्योटो में एक बड़ा सम्मेलन किया था. इसमें यह तय हुआ कि अलग-अलग चरणों में विकसित, विकासशील और पिछड़े देश तापमान बढ़ाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले गैसों का ऊत्सर्जन कम करेंगे. इसका पहला चरण वर्ष 2012 में ख़त्म हो रहा है लेकिन अभी भी इन गैसों का उत्सर्जन जारी है. यह आईपीसीसी की रिपोर्ट से ज़ाहिर हो जाती है. आईपीसीसी विभिन्न देशों के विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों को मिलाकर बनाया गया साझा पैनल है जो संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से अपना काम करता है. इसके मौजूदा अध्यक्ष भारत के आरके पचौरी हैं. रिपोर्ट आईपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर दुनिया के निर्धन इलाक़ों पर पड़ेगा, करोड़ों लोगों को पानी नहीं मिलेगा, फसलें चौपट हो जाएँगीं और बीमारियाँ फैलेंगी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि छह साल पहले वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि जलवायु परिवर्तन के पीछे मानवीय गतिविधियाँ हो सकती हैं लेकिन अब इसमें कोई शक नहीं रहा. जलवायु परिवर्तन के परिणाम दिखने लगे हैं और यह पूरी दुनिया में दिखाई दे रहे हैं किसी एक क्षेत्र विशेष में नहीं. वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि जिन लोगों ने वैश्विक तापमान बढ़ाने में सबसे कम योगदान दिया है वे सबसे अधिक पीड़ित हैं. हम भारत पर मौसम परिवर्तन के संभावित असर के बारे में आगे बता रहे हैं. प्रस्तुत - बीबीसी संवाददाता आलोक कुमार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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