तस्वीरों में-  भारत में मोबाइल के दस वर्ष
दुर्वेश कुमार
भारत में मोबाइल क्रांति के दस वर्षों बाद लोगों की ज़िंदगी में कहाँ और कितनी पैठ बना पाया है मोबाइल, इसकी पड़ताल कर रहे हैं पाणिनी आनंद.
अगर मोबाइल फ़ोन न आए होते तो मैं शायद अपने देश के तमाम बेरोज़गारों की सूची में शामिल होता. इससे मुझे अपने जीवन का एक सहारा मिला है और मेरे जैसे न जाने कितने ही लोगों को काम करने के लिए एक ज़रिया भी मिला है.

दुर्वेश कुमार, मोबाइल विक्रेता.

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