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![]() 2003 की विश्व घटनाएँ सन 2003 की अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में अमरीका की इराक़ के ख़िलाफ़ सैनिक कार्रवाई सबसे अहम थी.
अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने जनवरी में ही इराक़ को चेतावनी देते हुए कहा था कि 'राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के दिन गिनती के रह गए हैं.' उधर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत हथियार निरीक्षक इराक़ में जाकर अपने काम में जुटे हुए थे और दुनिया को थोड़ी-बहुत आशा ज़रूर थी कि शायद निरीक्षण के बाद अमरीका भी संतुष्ट हो जाएगा. लेकिन अमरीका इंतज़ार करने के लिए तैयार नहीं था और उसे मनाने के सभी कूटनीतिक प्रयास असफल रहे. अमरीका ने 20 मार्च को इराक़ पर हमला कर दिया. अमरीकी नगरों में बाथ पार्टी मुख्यालयों और सरकारी इमारतों पर भीषण बमबारी हुई. बहुत सारे आम अमरीकी नागरिक भी इस हिंसा की चपेट में आ गए. अमरीका ने तो मारे गए इराक़ियों की संख्या के बारे जानकारी नहीं दी है लेकिन अमरीका के एक शोध संस्थान ने अनुमान लगाया कि युद्ध के दौरान लगभग 13,000 इराक़ी मारे गए जिनमें से करीब 4300 आम नागरिक थे. पहली मई को अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने घोषणा की कि इराक़ में युद्ध स्तर की कार्रवाई ख़त्म हो गई है. उस समय तक 139 अमरीकी सैनिक और 33 ब्रितानी सैनिक मारे गए थे. अमरीका ने इराक़ में अंतरिम शासकीय परिषद का गठन किया और कहा कि वह इराक़ में लोकतंत्र की स्थापना करना चाहता है. लेकिन इराक़ में हिंसा का दौर थमा नहीं बल्कि तेज़ ही हुआ. अब भी इराक़ में आए दिन अमरीकी सैनिकों पर हमले हो रहे हैं. पहली मई के बाद, इस साल दिसंबर के तीसरे सप्ताह तक इराक़ में 271 अमरीकी सैनिक मारे गए हैं. चाहे हमले से पहले अमरीका और ब्रिटेन ने आरोप लगाए कि ईराक़ के पास महाविनाश के हथियार हैं लेकिन हमले के बाद अमरीकी जाँच टीम के कई महीनों की खोज के बाद भी इराक़ में ऐसे कोई हथियार नहीं मिले हैं. अमरीकी सेना ने बाथ पार्टी और सद्दाम हुसैन की सरकार के 55 ऐसे लोगों की सूची जारी की जिन्हें 'मोस्ट वॉंटिड' बताया गया. सद्दाम हुसैन और उनके दोनों बेटों उदै और क़ुसै के नाम भी इस सूची में रखे गए. सद्दाम हुसैन के दोनों बेटे उदै और क़ुसै जुलाई में मूसल में अमरीकी सेना की कार्रवाई में मारे गए. ख़ुद सद्दाम हुसैन 14 दिंसबर को अपने गृह नगर तिकरीत के पास एक 'फ़ार्महाउस' से पकड़े गए. लेकिन इराक़ अब भी शांति और लोकतंत्र से काफ़ी दूर है और पर्यवेक्षक कहते हैं कि देखना ये है कि क्या अमरीका हस्तक्षेप के बाद इराक़ ये सफ़र तय कर पाता है या नहीं? फ़लस्तीन और इसराइल मध्य पूर्व में हिंसा जारी रही और इसराइल के आम चुनावों में लिकुद पार्टी की भारी जीत मिली जिसे प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन ने 'ऐतिहासिक' बताया. लिकुद पार्टी को वामपंथी दलों पर जीत मिली और प्रधानमंत्री शेरॉन ने सभी पार्टियों से आग्रह किया कि मिलीजुली 'राष्ट्रीय सरकार' बनाई जाए. लेकिन लेबर पार्टी ने इससे साफ़ इनकार कर दिया. फ़लस्तीनी संसद ने भारी मतदान से प्रधानमंत्री के नए पद के गठन को मंज़ूरी दे दी और इसे फ़लस्तीनी प्रशासन में सुधारों के रास्ते में एक महत्वपूर्ण क़दम माना गया. फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद अपने अधिकारों मे कटौती और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर राज़ी हो गए थे. महमूद अब्बास फ़लस्तीन के पहले प्रधानमंत्री बने लेकिन उनके वरिष्ठ नेता यासिर अराफ़ात के साथ कई मुद्दों पर मतभेद रहे और अंत में उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. काफ़ी राजनीतिक खींचतान के बाद ही फ़लस्तीन की विधान परिषद ने पहले प्रधानमंत्री महमूद अब्बास के मंत्रिमंडल को अपनी मंज़ूरी दी. उधर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने दो साल के अंदर इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष को समाप्त करने की चरणबद्ध योजना 'रोड मैप' का ख़ुलासा किया. लेकिन हिंसा का दौर नहीं थमा और आरोप-प्रत्यारोप के दौर के बीच 'रोड मैप' के भविष्य पर अनिश्चितता बनी हुई है. यूरोपीय संघ यूरोपीय संघ के बहुत सारे सदस्य देशों का ये मानना था कि जब यूरोपीय संघ का संविधान लिखा गया था तब उसके केवल छह सदस्य हुआ करते थे और अब उन नियमों में संशोधन करने की ज़रूरत है. उन्हें उम्मीद है कि नए संविधान के अपनाए जाने के बाद संगठन के लक्ष्य और स्पष्ट हो जाएँगे और इन देशों की जनता भी इन्हें बेहतर समझ सकेगी. लेकिन दिसंबर में हुई शिखर बैठक में महत्वपूर्ण मुद्दों पर आम राय नहीं बन पाई. फ़ैसले लेने के लिए मतदान की प्रक्रिया, सुरक्षा, साझा मुद्रा आदि विषयों पर अब भी यूरोपीय संघ में मतभेद बने हुए हैं. अन्य प्रमुख घटनाएँ अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सन 2002 में ईरान, उत्तर कोरिया और इराक़ को 'दुष्टता की धुरी' की संज्ञा दी थी. जहाँ अमरीका और संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर बार-बार चिंता जताई वहीं उत्तर कोरिया ने तीख़े तेवर दिखाते हुए अमरीका को ही धमकी दे डाली. फ़िलहाल इस समस्या का कोई समाधान नहीं हो पाया है. उधर ईरान ने इराक़ युद्ध के बाद कुछ नरम रुख़ अपनाते हुए संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निरीक्षण की संस्था अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को अपने परमाणु संयंत्रों का निरीक्षण करने की इजाज़त दे दी है. दूसरी और लीबिया ने अपने महाविनाश के हथियारों के कार्यक्रम को त्याग देने की घोषणा कर पूरी दुनिया को चौंका दिया. लेकिन इसके बाद अरब देशों और ईरान ने माँग की कि इसराइल भी ऐसा कदम उठाए. लेकिन इसराइल की ओर से इसका सकारात्मक जवाब नहीं आया है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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