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कला जगत 2005
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कला जगत 2005
 

कला जगत 2005

एक नए पग से पहले....

 

जैसा कि हर साल होता है, ये साल भी आया और बहुत कुछ देकर चला गया, बहुत कुछ लेकर चला गया. बात चाहे जीवन के जिस भी क्षेत्र की हो, जीवन का स्वाद एक ही सा रहता है, सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, आदि-इत्यादि. वर्ष 2005 में कला जगत ने भी जीवन का यही स्वाद चखा.

अब वर्षांत के इस पड़ाव पर समय है, एक बार ठहरकर उन पलों की ओर देखने का, जिनमें कुछ प्रेरणा देते हैं तो कुछ सीख.

समय का पहिया घूमने के लिए बना है और पथिक के पग आगे बढ़ने के लिए, लेकिन पग आगे बढ़ाने से पहले पथ की पहचान आवश्यक है, इसीलिए एक बार पलटकर देखना भी आवश्यक है.....प्रख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तियाँ शायद ऐसे ही पड़ाव की बात करती है...

"पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले.

पुस्तकों में है नहीं
छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की ज़ुबानी

अनगिनत राही गए
इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी

यह निशानी मूक होकर
भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले.

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले."
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