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![]() भारत और पड़ोस - 2006 भारत और पड़ोस - 2006 भारत के लिए वर्ष 2006 अनेक क्षेत्रों में काफ़ी महत्वपूर्ण रहा. जहाँ सुरक्षा के मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष में बहस और तीख़ी हुई, वहीं न्यायपालिका ने अपने कई फ़ैसलों से जनता को चौंका दिया और अनेक लोगों को इसमें एक आशा की किरण भी दिखी. भारत-पाकिस्तान रिश्ते बहुत बेहतर तो नहीं हुए लेकिन कुछ घटनाओं से जहाँ उन्हें क्षति पहुँचने के संकेत मिल रहे थे, उनका समाधान हो पाया. मुंबई बम धमाकों ने देश का ध्यान सुरक्षा स्थिति की तरफ़ ख़ींचा. पाकिस्तान पर चरमपंथ का समर्थन करने के आरोप लगे. लेकिन आरोपों का खंडन करने के साथ-साथ पाकिस्तान ने सहयोग का हाथ बढ़ाया. भारत ने परिपक्वता का परिचय देते हुए शांति वार्ता को पटरी से उतरने से बचा लिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की हवाना में गुट निरपेक्ष देशों की बैठक के दौरान मुलाकात हुई. भारत ने अमरीका के साथ अपने रिश्ते सुधारे और विशेष तौर पर ऊर्जा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण भारत-अमरीका परमाणु सहमति पर अमरीकी कांग्रेस ने विधेयक पारित किया. लेकिन विपक्ष ने इसे भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और परमाणु नीति के लिए ख़तरा बताया. उधर अदालत ने मंत्री शिबू सोरेन को हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई. जेसिका लाल मामले में मनु शर्मा को उम्रकैद हुई और प्रियदर्शिनी मट्टू मामले में संतोष सिंह को मौत की सज़ा सुनाई गई. इन मामलों में सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनता ने भी दबाव बनाकर अपनी जागरूकता दिखाई. कई अन्य महत्वपूर्ण फ़ैसले भी आए और कम से कम मध्यवर्ग को वर्तमान व्यवस्था में एक आशा की किरण नज़र आने लगी. राजनीतिक दृष्टि से पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए लेकिन भाजपा और अन्य विपक्षी दल ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए. भाजपा ढ़ाई साल सत्ता से बाहर रहने के बावजूद संगठित और व्यवस्थित नहीं नज़र आई. उसने सत्ता पक्ष को लाभ के पद के मुद्दे पर और भारत-अमरीका परमाणु सहमति के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की लेकिन ज़्यादा सफल नहीं हो पाई. संसद पर हमले के दोषी पाए गए अफ़ज़ल को मौत की सज़ा के मामले पर उसने काफ़ी जनसमर्थन हासिल किया लेकिन विपक्ष की लाख कोशिश के बावजूद हर मुद्दे पर सत्ता पक्ष उसके घेरे से बाहर फिसलता नज़र आया. पड़ोसी देश पड़ोसी देशों में नेपाल में काफ़ी महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं. जनसंघर्ष और प्रदर्शनों के बाद नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र सत्ता राजनीतिक दलों को सौंपने के लिए तैयार हुए और कई महीने की बातचीत के बाद दस साल से विद्रोह चला रहे माओवादी भी मुख्यधारा में शामिल होने को तैयार हो गए. पाकिस्तान में अफ़ग़ानिस्तान की सीमा के साथ लगते इलाक़ों में सेना और कबायलियों के बीच संघर्ष जारी रहा - फिर वह चाहे वज़ीरिस्तान हो या बलूचिस्तान. एक वरिष्ठ बलूच विद्रोही नवाब बुगटी की सैनिक हमले में मौत के बाद वो इलाक़ा पाकिस्तानी राजनीति की मुख्यधारा से और अलग-थलग पड़ता दिखा. श्रीलंका में हिंसा जारी रही और जीनेवा में तमिल विद्रोहियों और सरकार के बीच बातचीत सफल न हो पाई. बांग्लादेश में अगली जनवरी में चुनाव होने हैं लेकिन चुनावों से पहले विपक्ष ने अंतरिम सरकार का ज़ोरदार विरोध किया है और हाल ही में आवामी लीग चुनावों में शामिल होने को राज़ी हुई है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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