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रविवार, 05 अप्रैल, 2009 को 06:06 GMT तक के समाचार
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ज़रा संभल कर चलें लाहौर में...

कठपुतली
लाहौर अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है.
धार्मिक कट्टरता का दंश झेल रहे पाकिस्तान में दिनों दिन बढ़ रही चरमपंथी गतिविधियों का असर अब पाकिस्तान के सांस्कृतिक आयोजनो पर भी दिखाई देने लगा है.

लाहौर में पहले की तरह बेख़ौफ़ पार्टियां आयोजित करना अब बीते दिनो की बात होती जा रही है.

लाहौर का गुलबर्ग जो पार्टियों के लिए जाना जाता है वहां पार्टी की तैयारियां चल रही हैं लेकिन मेज़बान घबराए हुए हैं.के एक आयोजन में शमां कुछ यूं दिखता है.

एक बड़े से हाल में शराब के गिलासों को साफ़ करके करीने से सजाया जा रहा है और नौकर बड़ी मुस्तैदी से कुर्सियों को तरतीब से लगाकर मेहमानों के इंतजार में खड़े हैं.

अपना नाम ना बताए जाने की शर्त पर एक मेज़बान ने कहा कि आजकल माहौल कुछ ऐसा हो गया है कि आप अपनी पार्टी में किसे बुला रहे हैं इस पर कुछ ख़ास लोगों की निगाहें लगी रहती हैं. क्योंकि कुछ लोगों को ये पार्टियां पसंद नहीं आती.

लाहौर की पार्टी का नज़ारा पाकिस्तान में होने वाली दूसरी पार्टियों से अमूमन एकदम अलग होता है. यहां की पार्टियों में उभरते कलाकारों फ़िल्मी हस्तियों, मीडिया के लोगों नौकरशाहों और सत्ता के हुक्मरानों के जमावडे़ के लिए जानी जाती हैं.

इमरान पीरज़ादा, थियेटर संचालक
 प्रतिक्रियावादियों का सबसे पहलानिशाना कला और संस्कृति पर ही होता है

मगर अब पाकिस्तान में तेज़ी से बढ़ते जा रहे कट्टरपंथियों का ख़ौफ देर रात तक चलने वाली शराब की इन पार्टियों में भी साफ़ दिखाई देने लगा है. इस तरह की पार्टियों में शिरकत करने वाले लोगों और टापलेस डांसर्स को धमकियां मिल रहीं हैं.

घबराहट का माहौल......

हाल ही में एक ही महीने के अंदर हुए दो बम धमाकों से लाहौर में हालात और भी ख़राब हुए हैं.

मेहमानों के प्रवेश के लिए दरवाज़ों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है और मेहमान अपने साथ कैमरा न लाएं, इस पर खास ध्यान रखा जा रहा है.

एक मेज़बान के मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में इन पार्टियों में आने वाले मेहमानों की तादाद भी घटी है.

लाहौर के मशहूर रफ़ी पीर थियेटर के हालात भी कुछ ऐसी ही कहानी बयाँ करते हैं. हाल ही के कुछ महीनों में यहां से पाकिस्तान के ग्रामीण और शहरी इलाकों के साथ विदेशों के लिए दर्जनों कार्यक्रम किए जाते थे लेकिन अभी यहां पर कोई भी प्रोग्राम नहीं बनाया जा रहा है.

थियेटर संचालक इमरान पीरज़ादा का कहना है, "प्रतिक्रियावादियों का सबसे पहला निशाना कला और संस्कृति पर ही होता है."

इमरान पीरज़ादा का कहना है कि पिछले साल से हालात बहुत ज़्यादा बिगड़े हैं. जिसकी वजह से बहुत सारे कलाकार और संगीतकार बेरोज़गार हुए हैं. इसका कारण है कि दर्शकों की संख्या घटी है और लाइव शो के लिए स्पांसर भी नहीं मिल रहे हैं. लोग चरमपंथियों से खौफज़दा हैं.

अशुभ घडी

एक उभरती हुई सिंगर अनीका अली का हाल ही में पहला म्यूज़िक एलबम लाँच हुआ है. कहती हैं कि मेरे एलबम का लांच बहुत ही ख़राब वक्त में हुआ है. तीन चार साल पहले हालात इतने बुरे नहीं थे. तेजी़ से बिगड़ते हालात ने कला और कलाकारों के लिए ख़तरा पैदा कर दिया है.

लाहौर के वरिष्ठ पत्रकार अज़मत अब्बास का कहना है, “ इससे पहले पहले कि लोग इस कट्टरपंथ को भूल जाएँ, धार्मिक चरमपंथ के इस मौजूदा ख़ौफ़नाक चेहरे को पूरी तरह से दुनिया के सामने उजागर हो जाना चाहिए.”

पाकिस्तान संभवत बुरे दौर से गुज़र रहा है और उसका सबसे पहला ख़ामियाज़ा कला जगत को झेलना पड़ रहा है.

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