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सोमवार, 15 सितंबर, 2008 को 16:43 GMT तक के समाचार
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बचने की कोशिश विस्फोट तक खींच लाई

सतीश( दाहिए) अपने दोस्त के साथ
सतीश आजमगढ़ के रहनेवाले हैं और दिल्ली में सीए का कोर्स कर रहे हैं
सतीश कुमार सिंह, उम्र-26 साल, आजमगढ़ के रहनेवाले, पिता- सेवानिवृत्त सैनिक, मध्यमवर्गीय परिवार. यानी सतीश के परिचय में उस युवा की साफ झलक है जिनकी लाखों की तादाद सपनों को सच करने दिल्ली आती है.

सतीश की कहानी भी वही है. ग्रेजुएशन करके मन में एक सपना ठाना था कि एक स्थापित चार्टर्ड एकाउंटेंट बनूँगा. परिवार और अपने सपनों को साकार करूँगा. इसी सपने को मन में संजोए सतीश आजमगढ़ से दिल्ली आए थे.

यहाँ कुछ दोस्तों के साथ पढ़ाई में लगे थे. सीए का इंटरमीडिएट कोर्स कर रहे हैं. शनिवार को कुछ काम से कनॉट प्लेस आए थे. वहाँ से निकले और धमाके की चपेट में आ गए.

दरअसल, शनिवार की शाम बाराखंभा पर ही काम करने वाले सतीश के जीजा ने उन्हें बताया कि दिल्ली में धमाके हो रहे हैं, जल्दी घर पहुँचो.

सतीश तुरंत ही बाराखंभा रोड की ओर लपके ताकि बस पकड़ें और घर पहुँचें. उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि वो जिस चीज़ से भाग रहे हैं, वही उनका इंतज़ार कर रही है.

बाराखंभा रोड पर बस स्टेंड के पास सतीश पहुँचे ही थे कि धमाका हुआ और वो उसकी चपेट में आ गए. सतीश को सिर और आँखों में चोट आई हैं.

कुछ रिश्तेदार और दोस्त उन्हें ढूंढते हुए रात को राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुँचे. सतीश यहाँ भर्ती हैं. सोमवार को उनकी एक आँख ऑपरेशन करके निकाल दी गई क्योंकि चोट में यह आँख लगभग नष्ट हो गई थी और संक्रमण दूसरी आँख तक पहुँच रहा था.

दर्द

छोटा भाई सोमवार को ही दिल्ली पहुँचा है. बदहवास, कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं. दोस्त सतीश के हौसले की बात करते हैं, उसकी तस्वीर दिखाते हैं और फिर छलक पड़ते हैं.

सतीश कुमार
सतीश के कमरे में वो सब दिखता है जो महानगर में सपने जीतने आए युवाओं के कमरों में होता है

माँ-पिता अभी बेटे का मुँह नहीं देख पाए हैं. देखेंगे तो पता चलेगा कि उनकी आँखों के तारे की एक आँख जा चुकी है.

दोनों वैष्णो देवी की यात्रा पर गए हुए थे. धमाके की ख़बर लगी तो आधे रास्ते से ही वापस लौट रहे हैं. अब देवी के दरबार में क्या माँगें जब बेटे को ये दिन देखना पड़ रहा है.

इस शहर में ज़िंदगी संवारने का सपना लिए आने वाले लाखों युवाओं की तरह सतीश की भी लड़ाई कुछ कम न थी. ऊपर से यह हादसा बहुत बड़ी चोट दे गया है.

पढ़ाई से बाकी बचे वक्त में कुछ काम करके, कुछ कंपनियों के एकाउंट देखकर सतीश अपना खर्च निकालते थे. इसी नवंबर में होनेवाली सीए की एक अहम परीक्षा अब सतीश के लिए और कठिन हो जाएगी.

सचमुच, एक घटना कितनी ही ज़िंदगियों का कितना कुछ बदल देती है.

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