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सोमवार, 15 सितंबर, 2008 को 13:57 GMT तक के समाचार
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'मैं पहली.... आख़िरी बार दिल्ली आया हूँ'

अरविंद
अरविंद कहते हैं कि काम के सिलसिले में मजबूरी हुई तभी दिल्ली आउंगा
'मैं पहली बार दिल्ली आया था. हिमाचल में अपने गाँव से पत्नी और गोद में एक बच्चे के साथ. इस शहर ने जो पहली बार में दिया है उसके बाद अब दोबारा इधर कभी नहीं आऊँगा... ' कहते कहते अरविंद पठानिया की आवाज़ भर्रा आती है.

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के इस युवा की दवाई की दुकान है. दूसरों को दर्द की दवा देने वाले इस व्यक्ति ने कुछ पैसा जोड़ा और अपनी पत्नी, बच्चे के साथ देश की राजधानी देखने आ गया.

दिल्ली की मैट्रो रेल देखी, सैर की. इंडिया गेट देखा, पालिका बाज़ार देखा, कनॉट प्लेस देखा और यह सब देखते-देखते दिखा आतंक का वो मंज़र जिसने रूह हिलाकर रख दी. अब बाकी का देखा याद नहीं आता.

शुक्रवार की शाम आठ बजे दिल्ली आए अरविंद को राजधानी में 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि ज़िंदगी को दिल्ली ने कुछ और ही दिखा दिया.

अरविंद बताते हैं, "शाम को अपने एक परिचित के घर जाने के लिए हम बाराखंभा रोड पर खड़े थे. तभी धमाका हुआ. मेरी पत्नी को चोट आई. मैं भी गिर पड़ा, चोटें मुझे भी आईं पर मैंने अपने बच्चे को बाहों में समेटे रखा. शुक्र है वो घायल नहीं हुआ."

शनिवार के पाँच सिलसिलेवार धमाकों ने दिल्ली में जो भय और आतंक फैलाया, अरविंद जैसे लोग उसे सबसे क़रीब से देख चुके हैं. उससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं.

अरविंद अभी इलाज के लिए दिल्ली में ही हैं. पत्नी को ज़्यादा चोटें आई हैं इसलिए उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में रखा गया है.

कौन सुनता है यहाँ...?

अरविंद की भी हालत ज़्यादा ठीक नहीं है. उन्हें लगता है कि अभी अस्पताल में ही रखा जाना चाहिए था पर डॉक्टरों ने धमाकों के अगले दिन ही उन्हें जाने के लिए कह दिया था.

 शाम को अपने एक परिचित के घर जाने के लिए हम बाराखंभा रोड पर खड़े थे. तभी धमाका हुआ. मेरी पत्नी को चोट आई. मैं भी गिर पड़ा, चोटें मुझे भी आईं पर मैंने अपने बच्चे को बाहों में समेटे रखा. शुक्र है वो घायल नहीं हुआ

अरविंद के पैरों में तीन जगह पर गहरे ज़ख्म हैं. तकलीफ़ इतनी की दैनिक क्रियाएं भी कर पाने में अक्षम हैं पर डॉक्टर अस्पताल से भीड़ कम करना चाहते हैं. वो बताते हैं कि अगर पेशाब करने भी जाना है तो उन्हें घिसटते-रगड़ते हुए जाना पड़ता है.

अरविंद बताते हैं, "मुझे अपने रिश्तेदार के घर से अस्पताल आना पड़ता है. यहाँ पट्टी बदलवानी होती है. हिमाचल में हम लोगों के लिए अच्छा इलाज मिलना मुश्किल है इसीलिए यहाँ पड़े हैं. पत्नी के ठीक होने तक रुकेंगे."

तो क्या अरविंद ने डॉक्टरों से कहा नहीं कि उनकी तकलीफ़ कम नहीं हुई है.

अरविंद बताते हैं, "मैंने कहा तो था पर यहाँ कह रहे हैं कि हमें बेड खाली चाहिए. अब परदेस से आए हैं. बस से ही वापस जाना होगा और बस में तो और ज़्यादा तकलीफ़ होगी."

वो बताते हैं कि दवाएं पूरी उपलब्ध नहीं है. बस कामचलाऊ व्यवस्था है. देखरेख भी पूरी नहीं हो रही.

इन सबके दौरान अस्पताल के कई आलाअधिकारी और स्टॉफ़ वीआईपी दौरों के लिए ज़्यादा मुस्तैद दिखाई दिए, घायलों के लिए शायद कम.

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