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सोमवार, 15 सितंबर, 2008 को 15:11 GMT तक के समाचार
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'...उनकी भी आस नहीं है बाबू'

सरूपी देवी
सरूपी देवी की एक पोती का रविवार को देहांत हो गया, तीन अन्य सदस्यों की हालत नाज़ुक है

उम्र के 80 बरसों में सरूपी देवी की आवाज़ न तो शायद कभी इतनी कांपी होगी और न ही आंखों से इतनी बेबसी छलकी होगी.

शायद तब भी नहीं जब घर के बाकी लोग बीमारी या बुढ़ापे से गुज़रे होंगे.

इसबार की चोट बहुत गहरी है. दिल्ली के करोलबाग में पिछले शनिवार जो लोग बम विस्फोट की चपेट में आए उनके कई सरूपी के परिवार के सदस्य थे.

कुछ रिश्तेदारों के अलावा चार ख़ून के रिश्ते धमाकों की वजह से ख़ून में लथपथ हो गए थे.

बेटा रामा, बहु कृष्णा और पोती संतोष राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मौत और ज़िंदगी के बीच संघर्ष कर रहे हैं.

सरूपी अपनी एक पोती को दूसरे बेटे की मदद से कल शमशान तक पहुँचाकर आई हैं. कल यानी रविवार को एक पोती ने हिम्मत खो दी और उनकी मौत हो गई.

परिवार के बाकी सदस्यों के बारे में डॉक्टर बहुत कुछ नहीं बता रहे.

आंखों में आंसू भरे सरूपी जब कई चक्कर लगा चुकीं तो बताया गया कि बाकी सदस्यों की भी हालत नाज़ुक है. कुछ कहा नहीं जा सकता.

यहाँ कौन है तेरा..

पानीपत की रहनेवाली सरूपी स्वभाव और व्यक्तित्व में हिम्मती मालूम देती हैं पर अपनों की बात बताते बताते कमज़ोर पड़ जाती हैं.

 दर्द और तड़प में एक वाक्य मुंह से निकलता है- अब उनकी भी आस नहीं है बाबू... और शब्द खामोश हो जाते हैं. गला बंद हो जाता है

दर्द और तड़प में एक वाक्य मुंह से निकलता है- अब उनकी भी आस नहीं है बाबू... और शब्द खामोश हो जाते हैं. गला बंद हो जाता है.

सरूपी देवी का परिवार करोलबाग में इंजन-गाड़ी मरम्मत के लिए इस्तेमाल होने वाले पुराने कपड़े बेचने का काम करता था.

सरूपी पानीपत में थीं, अपने घर पर. और बाकी का परिवार यहाँ दिल्ली में इसी तरह गुज़ारा कर रहा था. फिर एक शनिवार ने इस परिवार की जीने के लिए रोज़मर्रा की जद्दोजहद की कमर तोड़ दी.

अब अस्पताल में एक छड़ी के सहारे ज़िंदगी के आखिरी सहारों के ठीक होने का इंतज़ार कर रही हैं सरूपी. प्रशासन और ग़रीबी, दोनों की मार से असहाय हो चली सरूपी यही दोहराती रहती हैं- कोई सुनवाई नहीं हो रही है.

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