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महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा बढ़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के एक मानवाधिकार संगठन ने कहा है कि देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा में चिंताजनक बढ़ोत्तरी देखी गई है. पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि पिछले एक साल में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में दोगुना बढ़ोत्तरी हुई है और ये मामले बढ़कर चार हज़ार हो गए हैं. आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2007 में देश में आत्मघाती हमलों में वर्ष 2006 के मुक़ाबले बढ़ोत्तरी हुई. देश में पुरुषों और महिलाओं के बीच भेदभाव की घटनाओं में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है और इसके लिए आयोग ने 'दकियानूसी सामाजिक सोच और आदतों और धार्मिक अतिवाद' को ज़िम्मेदार ठहराया है. रिपोर्ट कहती है कि देश के पश्चिमोत्तर इलाक़े में सरकारी सैनिकों का मुक़ाबला करने के लिए इस्लामी चरमपंथियों ने आत्मघाती हमले जारी रखे हैं. पाकिस्तान मानवाधइकार आयोग की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बीते वर्ष यानी 2007 में महिलाओं के मानवाधिकार उल्लंघन के लगभग 4276 मामले तर्ज किए गए. आयोग के सचिव इक़बाल हैदर ने इस रिपोर्ट को मीडिया के सामने पेश करते हुए कहा कि वर्ष 2007 "महिलाओं के लिए एक क्रूर वर्ष" रहा है. आँकड़ों का खेल आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2006 में महिलाओं के मानवाधिकार उल्लंघन के 1821 मामले दर्ज किए गए थे और उनमें उससे पिछले वर्ष यानी 2005 के मुक़ाबले बढ़ोत्तरी हुई थी. लेकिन सचिव इक़बाल हैदर इन आँकड़ों को बहुत छोटी बात कहते हैं क्योंकि उनके अनुसार बहुत से मामले तो दर्ज ही नहीं हो पाते हैं और अनेक मामलों में पुलिस और प्रशासन घटनाओं को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश करते हैं.
आयोग की रिपोर्ट कहती है कि जो मामले दर्ज होते हैं उनमें भी इस बारे में सूचना हासिल कर पाना बहुत मुश्किल होता है कि पुलिस और प्रशासन ने क्या कार्रवाई की और प्रभावित को न्याय मिला या नहीं, अभियुक्तों की गिरफ़्तारियाँ हुईं या नहीं या फिर इन मामलों का मुक़दमा शुरू हुआ या नहीं और अगर शुरू हुआ तो किस हद तक गया. पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 में 636 महिलाओं को ख़ानदान की इज़्ज़त के नाम पर मौत के घाट उतार दिया गया, 731 महिलाएँ बलात्कार का शिकार हुईं और 736 महिलाओं का अपहरण किया गया. ख़ानदान की इज़्ज़त के अलावा बहुत से अन्य कारणों की वजह से भी अनेक महिलाओं को ज़िंदगी से हाथ धोने के लिए मजबूर होना पड़ा. मसलन अनेक महिलाओं को ससुराल वालों ने ज़िंदा जला दिया, अनेक के साथ यौन दुराचार हुआ - कुछ के साथ घर में ही तो कुछ के साथ कामकाज के स्थानों पर. अनेक महिलाओं को घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ा. अरुचि आयोग की रिपोर्ट में ध्यान दिलाया गया है कि पाकिस्तानी समाज में महिलाओं के अधिकारों के प्रति आमतौर पर एक अरुचि नज़र आती है और समाज-सरकार उनमें कोई दिलचस्पी नहीं लेते. रिपोर्ट में उदाहरण देते हुए कहा गया है, "फ़रवरी 2007 में हुए चुनाव से पहले मतदाता सूचियों में दो बार बदलाव किए गए और इन बदलावों से जिस समूह को सबसे ज़्यादा भेदभाव का सामना करना पड़े, वे महिलाएँ ही थीं. " इस बीच देश के पश्चिमोत्तर हिस्से में लड़कियों के स्कूलों पर तालेबान चरमपंथियों के हमले जारी रहे और "इनकी वजह से इन स्कूलों में लड़कियाँ आने से डरने लगी जिससे इन स्कूलों में हाज़िरी बहुत कम हो गई." तालेबान ने पश्चिमोत्तर क्षेत्र में सेना, पुलिस और अन्य सरकारी ठिकानों को निशाना बनाना जारी रखा है और इसके लिए ज़्यादादतर आत्मघाती हमलों का ही सहारा लिया गया. मानवाधिकार आयोग का कहना है कि वर्ष 2007 में देश के विभिन्न हिस्सों में हुए 71 आत्मघाती हमलों में 927 लोग मारे गए. | इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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