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बुधवार, 27 फ़रवरी, 2008 को 16:42 GMT तक के समाचार
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सामाजिक भेदभाव का असाध्य रोग

कुष्ठ रोगी
देश में अभी भी कई क़ानून कुष्ठ रोगी को मुख्य धारा से अलग करते हैं
भारत सरकार का स्वास्थ्य विभाग मानता है कि कुष्ठ रोग न तो लाइलाज है, न ही वंशानुगत है लेकिन देश में सबसे अधिक कुष्ठ रोगियों वाले राज्य छत्तीसगढ़ में ऐसा नहीं है.

कुष्ठ रोग संक्रामक है लेकिन उसका संक्रमण को लेकर आतंक अधिक है वास्तविक ख़तरे बहुत कम.

रायपुर के डॉक्टर विवेक पांडे कहते हैं, " कुष्ठ रोग के अधिकांश मामलों में संक्रमण का खतरा नहीं होता. आप कह सकते हैं कि छूत वाले रोगों में कुष्ठ सबसे कम संक्रमणकारी है. कुष्ठ का प्रसार भी वही रोगी कर सकते हैं, जिनका इलाज नहीं हुआ हो. एक बार उपचार शुरु होने के बाद इसके छूत से फैलने की कोई संभावना नहीं होती."

डॉक्टर विवेक के अनुसार कुष्ठ माइक्रोबैक्टीरियम लेप्रा नामक जीवाणु के कारण फैलता है और लगभग 95 फीसदी लोगों के शरीर में इस जीवाणु से मुकाबला करने की प्रतिरोधक क्षमता होती है.

लेकिन छत्तीसगढ़ का पंचायती राज क़ानून अब भी कुष्ठ रोग को छुआछूत की बीमारी मानता है. यही कारण है कि कुष्ठ से ग्रस्त व्यक्ति के लिए छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम के अंतर्गत पंचायत चुनाव लड़ने की पात्रता नहीं है.

यह नियम मध्य प्रदेश में भी लागू है और छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने के बाद भी इस नियम में परिवर्तन नहीं किया गया है.

कुष्ठ रोगियों के साथ भेदभाव का यह मामला लगभग पूरे देश में फैला हुआ है.

देश में अभी भी दर्जन भर से अधिक ऐसे क़ानूनी प्रावधान हैं, जिसमें कुष्ठ रोगियों को समाज की मुख्य धारा से अलग रेखांकित करते हुए, उनके साथ भेदभाव किया जाता है.

 हमें घर-परिवार, समाज और सरकार सब जगह से केवल दुत्कार मिली है. हमारे नाम पर करोड़ों-अरबों रुपए खर्च किए गए लेकिन हम आज भी सड़क पर हैं
श्रीनिवास, कुष्ठ रोगी

मिसाल के तौर पर भारतीय रेल अधिनियम की धारा 56 में अभी भी कुष्ठ से ग्रस्त व्यक्ति को रेल यात्रा करने से रोके जाने का प्रावधान है. इसके अलावा कुष्ठ होने के आधार पर तलाक का प्रावधान तो लगभग हरेक विवाह अधिनियम में है.

छत्तीसगढ़ में कुष्ठ रोगियों का अनुपात प्रति दस हज़ार की आबादी पर 2.4 है जो भारत में सबसे अधिक है. लेकिन कुष्ठ रोग के उन्मूलन, इसके छूत की बीमारी नहीं होने के सरकारी दावे से कोसों दूर राज्य के हरेक छोटे-बड़े शहर में कुष्ठ से ग्रस्त लोगों की अलग बस्ती है. हज़ारों की संख्या में कुष्ठ रोगी सड़कों के किनारे अपना जीवन गुजार रहे हैं.

दर्द

रायपुर में रेलवे स्टेशन के आसपास की सड़कों पर पिछले कई सालों से रहने वाले कुष्ठ रोगी श्रीनिवास कहते हैं, "हमें घर-परिवार, समाज और सरकार सब जगह से केवल दुत्कार मिली है. हमारे नाम पर करोड़ों-अरबों रुपए खर्च किए गए लेकिन हम आज भी सड़क पर हैं."

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सौरभ डांगी कहते हैं, "आंध्र प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनाव में अब भी कुष्ठ रोगियों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध है, जो पूरी तरह से असंवैधानिक है.

कुष्ठ रोगी
देश भर में कुष्ठ रोगी अलग-थलग ही रहते हैं

एक तरह से यह मौलिक अधिकारों के हनन का मामला है. मैं इस बात से चकित हूँ कि अब तक इस तरह के अधिनियमों में बदलाव क्यों नहीं लाया गया."

लेकिन जिन्हें बदलाव लाना है, उन्हें इस तरह के अधिनियमों की जानकारी ही नहीं है.

छत्तीसगढ़ पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग से संबद्ध सचिव डॉक्टर त्रिविक्रम भोई सफ़ाई देने वाली मुद्रा में कहते हैं, "अगर ऐसा है तो मैं मुख्यमंत्री के सामने इस विषय को लाऊँगा और हमारी कोशिश होगी कि इस मुद्दे पर सरकार कोई सकारात्मक पहल करे."

दूसरी ओर मानवाधिकार संगठन फ़ोरम फ़ॉर फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग डाक्यूमेंटेशन एंड एडवोकेसी के सुभाष महापात्रा कुष्ठ रोगियों के लिए हरसंभव लड़ाई लड़ने का दावा करते हुए कहते हैं.

वे कहते हैं, "भारत में कुष्ठ रोगियों के साथ होने वाले सभी तरह के भेदभाव के ख़िलाफ हम लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. मानवाधिकार आयोग से लेकर उच्चतम न्यायालय तक हम कुष्ठ रोगियों के मौलिक अधिकारों के हनन का मामला उठाएँगे."

सरकार कब पहल करेगी और क़ानूनी लड़ाई कब परवान चढ़ेगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है. जाहिर है, तब तक तो छत्तीसगढ़ के कुष्ठ रोगी पंचायती राज में भेदभाव का शिकार होने के लिए बाध्य हैं.

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