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सोमवार, 14 जनवरी, 2008 को 14:37 GMT तक के समाचार
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पार्टियों में छिड़ी भारत रत्न की होड़

आडवाणी और अटल
आडवाणी ने कहा, अटल महान सांसद हैं
यूँ तो दिल्ली मैं किसी न किसी बात की होड़ मची ही रहती है. चुनाव के पहले जिताऊ पार्टी का टिकट पाने की होड़, चुनाव के बाद सरकार में बढ़िया पद और बेहतरीन बंगला पाने की होड़.

होड़ में पिछड़ गए तो अगली बार के लिए अपने नेता की दयादृष्टि पाने की होड़.

जनवरी से मार्च तक का समय रहता है वित्त मंत्री और रेल मंत्री से अपनी मांगें मनवा लेने की होड़ का.

पर इस बार एक नई होड़ मची है. भारत रत्न की होड़.

विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भारत रत्न क्या माँगा, भानुमति का पिटारा ही खोल दिया.

आडवाणी ने कहा, अटल महान सांसद हैं, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा के बाद सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे हैं, वो भी गठबंधन सरकार के. उन्हें भारत रत्न से नवाजा जाए.

बात निकलेगी तो...

सोनिया गांधी
अल्वी कहते हैं कि सोनिया गाँधी ने भारत में धर्मनिरपेक्षता को मज़बूत किया है

अब एक राजनेता से दूसरे राजनेता के लिए बात निकली थी तो उसे दूर तलक तो जाना ही था.

कांग्रेस के राशिद अल्वी बोले, "यह तो आडवाणी जी का हक है कि वो जिसके लिए चाहें भारत रत्न की मांग करें. मैं उनकी मांग के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. पर कोई यह नहीं भूल सकता कि यह वही अटल जी हैं जिन्होंने कहा था कि गोधरा न होता तो गुजरात न होता. ऐसी कई पुरानी बातें मैं दोहराना नहीं चाहता".

तो फिर किसे मिलना चाहिए भारत रत्न? इस पर राशिद अल्वी कहते हैं, " सोनिया गाँधी. उन्होंने जिस तरह से भारत में धर्मनिरपेक्षता को मज़बूत किया है और एक सांप्रदायिक सरकार से आज़ादी दिलाई है, उसके लिए उन्हें भारत रत्न मिले, मैं ऐसी मांग करता हूँ".

राशिद अल्वी को कांग्रेस अध्यक्ष का योगदान अमूल्य लगता है.

पर सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के नेता अबनी राय सवाल करते हैं कि भारत में केवल कांग्रेस के नेताओं को ही भारत रत्न मिलेगा.

सम्मान में राजनीति

राय को इस सम्मान मैं राजनीति दिखती है. वैसे वह इस सम्मान के लिए सिफारिश और अर्जी के ख़िलाफ़ हैं. "जो काबिल हो उसे मिले, नियम बने".

वैसे अगर देखा जाए तो राजनेताओं को भारत रत्न देने की शुरुआत कांग्रेस ने ही की है अपने दशकों लंबे राज में.

जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी तो दो ऐसे प्रधान मंत्री थे जिन्हें उन्हीं के दस्तखत से सम्मानित किया गया.

इसके अलावा दो बार कार्यवाहक प्रधान मंत्री रहे गुलजारीलाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और एमजी रामचंद्रन.

अस्मिता की लड़ाई

 मुझे तो यह सब कतई अच्छा नहीं लगता. राजनीति बख्शीश के लिए नहीं की जाती. राजनीति की जाती है अंतरात्मा के लिए
जनेश्वर मिश्र, राज्यसभा सदस्य

इसमे अगर रामचंद्रन को छोड़ दिया जाए तो तकरीबन सबका कांग्रेस ने करीबी नाता रहा है.

इत्तेफ़ाक से मोरारजी और मौलाना आजाद का भारत रत्न डाक के ज़रिये भिजवाया गया था.

मोरारजी ने आने में असमर्थता जताई थी और मौलाना का उत्तराधिकारी कौन है इस पर लंबी बहस छिड़ गई थी.

अगर कांग्रेस और भाजपा अपने नेताओं के लिए भारत रत्न मांग रहे हैं तो बाकी क्यों पीछे रहें.

खास तौर पर तब जब गठबंधन की राजनीति का दौर हो और हर दल अपने लोगों की अस्मिता और सम्मान की लड़ाई लड़ रहा हो.

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहुजन समाज पार्टी की सर्वेसर्वा मायावती ने स्वर्गीय कांशीराम का दलितों और पिछड़ों के उत्थान में योगदान रेखांकित किया और उन्हें भारत रत्न दिए जाने की मांग की.

सत्ता में योगदान

उत्तर प्रदेश के ही एक और दल राष्ट्रीय लोक दल के नेता अजित सिंह अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के लिए भारत रत्न की मांग को जायज़ ठहराते हैं.

सिंह का कहना है जो नेता सत्ता में हैं उनका योगदान तो हो ही गया पर जो नहीं हैं उनका भी तो योगदान है.

हरियाणा के लोकदल के नेता ओमप्रकाश चौटाला यह सम्मान अपने पिताश्री चौधरी देवीलाल के लिए चाहते हैं.

समाजवादी पार्टी का मानना है कि डॉक्टर राम मनोहर लोहिया इस सम्मान के पूरे हकदार हैं. रामविलास पासवान ध्यान दिलाते हैं ज्योति बा फुले का.

कहीं और से आवाज़ आई ज्योति बासु क्यों नहीं! हालांकि बासु ने इस पूरे विवाद से पल्ला झाड़ा, कहा मैं रेस मैं नहीं हूँ.

पर वैसे जब से एक दल की सरकारों के दिन जाते रहे तब से राजनीतिज्ञों को ये ख़िताब मिलना बहुत कठिन हो गया है.

किताबी क़ायदा

अब सरकार बनाए रखने में गठबंधन के हर सदस्य का महत्वपूर्ण योगदान होता है और किसी को नाराज़ भी नही किया जा सकता. तो ऐसे विवादास्पद विषयों से सरकारें बचतीं हैं.

मायावती
मायावती ने स्वर्गीय कांशीराम का दलितों और पिछड़ों के उत्थान में योगदान रेखांकित किया

शायद इसीलिए 2001 के बाद से किसी को यह सम्मान मिला ही नहीं.

वैसे तो किताबी कायदे से भारत रत्न और पद्म श्रृंखला के सम्मानों के नाम तय करती है गृह मंत्रालय की एक समिति.

इस समिति में उप राष्ट्रपति, सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश और विपक्ष के नेता भी होते हैं.

वैसे आडवाणी पत्र न लिखते और उनकी पार्टी शासित कोई राज्य भी वाजपेयी के नाम का प्रस्ताव कर सकता था...पर आडवाणी को शायद यह रास्ता अधिक बेहतर लगा..

पर दिल्ली के कायदे तो किताबी कायदों से अलग होते हैं.

सबके सामने जो होता उसके काफी कुछ ज़्यादा वह होता है जो परदे के पीछे होता है. इतनी ज़्यादा लौबिंग होती है, इस तरह के प्रयास होते हैं कि आत्मसम्मान वाला आदमी भारत रत्न लेने के पहले दस बार सोचेगा.

कितना ज़रूरी

राशिद याद दिलाते हैं कि कैसे कुछ साल पहले एक बड़े उद्योगपति के देहांत के बाद स्वर्गीय प्रमोद महाजन के नेतृत्व में सांसदों ने पत्र लिखे थे उद्योगपति को मरणोपरांत भारत रत्न देने के लिए.

हालांकि तत्कालीन सरकार ने टाल दिया पर वो एक ज्वलंत उदाहरण बन गया.

खैर ठीक भी है, कहते हैं न कि जहाँ पानी, वहाँ प्राणी. जहाँ घाट तहां हाट. वैसे ही जहाँ राजनेता वहाँ राजनीति.

पर क्या राजनीति में सामाजिक बदलाव के लिए सत्ता ज़रूरी मानी जाती है वैसे ही क्या भारत रत्न सा सम्मान भी ज़रूरी है?

राज्यसभा सदस्य जनेश्वर मिश्र कहते हैं, " मुझे तो यह सब कतई अच्छा नहीं लगता. राजनीति बख्शीश के लिए नहीं की जाती. राजनीति की जाती है अंतरात्मा के लिए".

अब मिश्र चाहे जो मानें पर होड़ बनी हुई है और आसार पूरे हैं कि यह होड़ बढ़ेगी, कम नहीं होगी....

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