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शुक्रवार, 30 मार्च, 2007 को 12:11 GMT तक के समाचार
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'ज़मीन के झगड़े में मज़हब का सहारा'

लाहौर हाई कोर्ट
लाहौर हाई कोर्ट
पाकिस्तान की एक अदालत ने इस्लाम, क़ुरान और पैगंबर मोहम्मद की तौहीन करने का दोषी क़रार देते हुए मौत की सज़ा के साथ-साथ कई अन्य सज़ाएँ सुनाई हैं.

लाहौर में पतोकी के अतिरिक्त ज़िला और सैशन जज ने पैंतालिस वर्षीय अब्दुल हमीद को तौहीने मज़हब, तौहीने क़ुरान और तौहीन पैगंबर मोहम्मद का दोषी क़रार देते हुए दस साल की क़ैद, उम्र क़ैद, सज़ाए मौत और एक लाख रुपए के जुर्माने की सज़ा सुनाई है.

अब्दुल हमीद पर आरोप है कि उन्होंने अपने घर में कलमे के शब्द बदल कर लिए हुए थे. अब्दुल हमीद ख़ालसा के रहने वाले हैं और मेहनत-मजदूरी करके रोज़ी-रोटी कमाते हैं.

अब्दुल हमीद पर पाकिस्तान की दंड प्रक्रिया संहिता की दफ़ा 295 बी और ए के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया था.

गाँव की मस्जिद के इमाम क़ारी ग़ुलाम मुस्तफ़ा ने सज़ा पाने वाले शख़्स अब्दुल हमीद पर इल्ज़ाम लगाया ता कि उन्होंने अपने घर में ख़ाना काबा का मॉडल रखा हुआ है जिस पर एक चादर डाली हुई है, उस पर इस्लाम के कलमे के शब्द बदल कर इस तरह लिखे गए हैं कि उसमें इस्लाम के पैगंबर के नाम की बजाय उसका अपना नाम आता है.

अभियोजन पक्ष ने अब्दुल हमीद के ख़िलाफ़ तीन गवाब पेश किए. हमीद की तरफ़ से पेश हुए वकील चौधरी परवेज़ असलम ने अदालत को बताया कि अभियोजन पक्ष के एक गवाह राणा शमऊन का हमीद से छह कनाल ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर झगड़ा चल रहा था और इस मुक़दमे के दर्ज होने के बाद उन्होंने हमीद के घर से उसकी बीवी और पाँच बच्चों को निकाल कर उस पर और विवादित ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया.

अब्दुल हमीद की तरफ़ से पेश हुए वकील परवेज़ असलम ने अदालत से कहा कि जो चादर सबूत के तौर पर पेश की गई है वो अभियुक्त अब्दुल हमीद की नहीं है और न उस पर कुछ भी उसके हाथों से लिखा हुआ नहीं है बल्कि शब्द छपे हुए हैं.

एक मुस्लिम छात्र
पाकिस्तान में मज़हब का मामला काफ़ी नाज़ुक है
और वो शब्द भी दरूद इब्राहीमी का हिस्सा हैं.

अभियुक्त के वकील का कहना था कि पुलिस ने अपने चालान में तौहीने मज़हब संबंधी दफ़ा 295 के तहत इल्ज़ाम साबित किया है जबकि 295 सी के तहत इल्ज़ाम साबित नहीं किया.

पाकिस्तान की दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 295 का संबंध तौहीने मज़हब यानी धर्म के अपमान से है जिसकी सज़ा दस साल की क़ैद और जुर्माना है. 295 सी का संबंध इस्लाम के पैगंबर की तौहीन से है जिसकी सज़ा मौत है.

हालाँकि अदालत के जज ख़ालिद बशीर ने अभियुक्त को दोनों धाराओं के साथ-साथ तौहीने क़ुरान से संबंधित धारा 295 बी के तहत भी उम्र क़ैद और जुर्माने की सज़ा सुनाई है.

अभियुक्त अब्दुल हमीद के वकील ने अदालत से कहा था कि ये मुक़दमा प्रशासन या प्रांतीय सरकार की शिकायत पर ही दर्ज किया जा सकता है जबकि इस मुक़दमे में ऐसा नहीं हुआ है.

वकील का ये भी कहना था कि इन अपराधों के तहत किसी मुक़दमे की जाँच-पड़ताल क़ानून के मुताबिक पुलिस अधीक्षक स्तर के किसी अधिकारी ही कर सकते हैं जबकि इस मुक़दमे की जाँच एक सब इंस्पैक्टर ने की.

जाँच करने वाले सब इंस्पैक्टर मोहम्मद मिन्शा ने अदालत में कहा कि उन्होंने जाँच एक सच्चे मुसलमान के तौर पर की है. अभियुक्त के वकील ने कहा है कि इस मुक़दमे के दौरान उन्हें लगातार धमकियाँ दी जाती रहीं कि वे यह मुक़दमा ना लड़ें.

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