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सोमवार, 18 दिसंबर, 2006 को 15:00 GMT तक के समाचार
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सरहद पर अमन की बयार

भारतीय सैनिक
मकरी गाँव के निकट गश्त लगाते भारतीय सैनिक
भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर संघर्ष विराम के तीन साल बाद भारतीय सीमा के अंतिम गाँव मकरी में आम जनजीवन पहले से ख़ुशगवार हो गया है.

तीन तरफ से पाकिस्तान से घिरा, घाटी में बसा मकरी गाँव सरहद से सिर्फ़ 100 मीटर दूर है.

सीमापार से लगातार हुई बमबारी से लगे घावों से यहाँ के लोग पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं लेकिन ज़िंदगी को फ़िर से संवारने का दौर जारी है.

 हम 1947 से पहले अपनी मक्के की फ़सल मीरपुर में बेचा करते थे. हमारा मक्का बहुत बढ़िया हुआ करता था
चेतराम, स्थानीय निवासी

26 नवंबर, 2003 को संघर्ष विराम होने से पहले इस क्षेत्र में दोनों तरफ़ से लगातार गोलीबारी और बमबारी होती रहती थी.

लेकिन अब इलाके में अमन-चैन है और गोलियों और मोर्टारों से छलनी जर्जर घरों की जगह पक्के मकानों ने ली है.

मकरी गांव की ज़मीन बहुत उपजाऊ है. स्थानीय लोगों का कहना है जब भारत और पाकिस्तान एक देश हुआ करते थे तो यहाँ की मक्के की फ़सल पूरे इलाके में मशहूर थी.

पीड़ा

96 वर्षीय चेतराम बताते हैं कि इस गांव के लोगों का मुख्य धंधा खेती और पशुपालन है.

उन्होंने कहा," हम 1947 से पहले अपनी मक्के की फ़सल मीरपुर (पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर) में बेचा करते थे. हमारा मक्का बहुत बढ़िया हुआ करता था और एक मौंड ( तौल की एक पुरानी प्रणाली) पाँच-छः रुपए में बिक जाया करता था."

मकरी के लोग अमन कायम रहने के लिए प्रार्थना करते रहते हैं

लेकिन विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान दो देश बन गए. तब मकरी में जनजीवन बहुत कठिन हो गया, गाँववालों को बहुत कष्ट उठाना पड़ा.

भारत और पाकिस्तान के बीच हुई 1965 और 1971 की लड़ाइयों, 1980 के दशक के अंतिम वर्षों में शुरु हुआ अलगाववादी चरमपंथी आंदोलन, 1999 के करगिल संघर्ष और सीमापार से लगातार होने वाली बमबारी ने मकरी गाँव के लोगों के दुखों को काफ़ी बढ़ा दिया.

अधेड़ उम्र के सोमनाथ रंधावा कहते हैं लोगों को कभी-कभी तो गाँव छोड़ शरणार्थी शिविरों का भी सहारा लेना पड़ता था.

 मेरा अनुभव कहता है कि दोनों देश की सरकारों पर विश्वास नहीं किया जा सकता
बिहारी लाल

रंधावा ने बताया," हम शिविरों में शरण लेते थे या अपने रिश्तेदारों के यहाँ चले जाते थे लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में सम्मान आहत होता था."

गाँव के लोग समूह में गाँव का दौरा करते थे और घरों को हुए नुकसान का जायज़ा लेते थे और अधिकारियों को सूचित करते थे.

चूँकि ज़्यादातर गांववाले किसान थे इसलिए विस्थापित होने पर रोजीरोटी की समस्या हो जाती थी.

एक बेहतर आशियाना

रंधावा बताते हैं, "अधिकतर गाँववाले भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों के लिए काम करने लगे थे. कुछ लोग मज़दूर हो गए थे तो कुछ ने वन विभाग के साथ काम करना शुरु कर दिया था."

अधिकतर हिंदू आबादी वाला मकरी गाँव आज रहने के लिए एक बेहतर जगह है.

गाँव में अपनी यात्रा के दौरान हमने औरतों को अपने मर्दों के साथ काम करते हुए देखा और बच्चों को स्कूल से लौटते हुए देखा. स्कूल सरहद से सिर्फ़ 50 मीटर दूर था.

मकरी में जिंदगी ख़ुशनुमा हो रही है.

दस साल का रवि कुमार कहता है कि वो स्कूल लौटकर काफ़ी खुश है. उसने कहा कि अधिकारी बनने के 'अपने सपने को अब वह पूरा कर सकेगा'.

 हम शिविरों में शरण लेते थे या अपने रिश्तेदारों के यहाँ चले जाते थे लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में सम्मान आहत होता था
सोमनाथ रंधावा, स्थानीय निवासी

शरणार्थी शिविर के जीवन के बारे में रवि कहता है," मैं पढ़ना चाहता हूं. लेकिन शरणार्थी शिविर में रहने पर पढ़ाई नहीं हो पाती. हम हमेशा मस्ती करते रहते थे और कभी-कभी हमें काम भी करना पड़ता था."

रास्ते में हम सीता कुमारी से मिले जो अपने जानवरों के झुंड को हाँक कर घर ले जा रही थीं.

40 वर्षीया सीता कुमारी कहती हैं," बमबारी के दौरान हमारे कई मवेशी मर गए थे. इसलिए हमने मवेशी खरीदना ही बंद कर दिया था. लेकिन संघर्ष विराम के बाद हमने मवेशी खरीदना शुरु कर दिया."

110 साल के अपने जीवन में बिहारी लाल ने अच्छे दिन भी देखे हैं और बुरे भी. हालाँकि वह संघर्ष विराम से खुश हैं लेकिन पुराने बुरे अनुभवों की वजह से वो बहुत आशंकित भी हैं.

छोटी सी आशा

संघर्ष विराम कितने दिन चलेगा इस बात को लेकर युवाओं और बुजुर्गों में मतभेद है.

रंधावा को जहाँ इस संघर्ष विराम से बहुत आशा है वहीं बिहारी लाल का कहना है कि गाँव वाले गलती कर रहे हैं.

 हमारे मवेशी मार दिए गए. हम अपनी ज़मीनों पर लंबे समय तक खेती नहीं कर पाए. हमारे बच्चों का कोई भविष्य नहीं था. अपना घर होने के बावज़ूद हम बंजारों की तरह रहते थे
विद्या देवी

बिहारी लाल कहते हैं," मेरा अनुभव कहता है कि दोनों देश की सरकारों पर विश्वास नहीं किया जा सकता."

चेतराम बताते हैं कि उनकी बेटी की शादी के समय भारी बमबारी की वजह से बारात मकरी नहीं पहुँच पाई थी और हमें दुल्हन को शादी के लिए सुरक्षित स्थान पर ले जाना पड़ा.

लेकिन आज, ज़्यादातर सामाजिक और धार्मिक जलसे गाँव में ही मनाए जाते हैं.

अधिकतर गांववालों का मानना है कि संघर्ष विराम ज़ारी रहेगा.

गोलीबारी में अपना पति खो चुकी विद्या देवी कहती हैं," हमारे मवेशी मार दिए गए. हम अपनी ज़मीनों पर लंबे समय तक खेती नहीं कर पाए. हमारे बच्चों का कोई भविष्य नहीं था. अपना घर होने के बावज़ूद हम बंजारों की तरह रहते थे."

ये सच है कि मकरी में आया अमन मारे गए लोगों को तो वापस नहीं ला सकता लेकिन अब मकरी वाले अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अमन कायम रहने की कामना कर रहे हैं.

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