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बुधवार, 15 नवंबर, 2006 को 17:28 GMT तक के समाचार
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बलात्कार क़ानून में संशोधन को मंज़ूरी
एक पाकिस्तानी महिला
हुदूद क़ानून में विवाहेतर यौन संबंधों के लिए महिलाओं को ही सजा दिए जाने का प्रावधान है
पाकिस्तानी संसद के निचले सदन नेशनल एसेंबली ने बलात्कार से संबंधित कठोर शरिया क़ानूनों में संशोधन वाले विधेयक को मंज़ूरी दे दी है जिसके बाद महिलाओं को ज़्यादा अधिकार मिल जाएंगे.

सरकार ने बुधवार को यह विधेयक नेशलन असेंबली में पेश किया था जिस पर गरमागरम बहस हुई. कुछ कट्टर इस्लामी सांसदों ने मतदान का बहिष्कार किया.

एक ऐसे ही सदस्य ने संशोधनों का विरोध करते हुए कहा कि इसके बाद पाकिस्तान एक मुक्त यौन समाज के रूप में तब्दील हो जाएगा.

पुराने क़ानून के तहत सभी प्रकार के विवाहेतर यौन संबंध ग़ैर-क़ानूनी हैं.

अपने साथ बलात्कार होने का आरोप लगाने वाली किसी महिला को कम से कम चार पुरुष गवाह प्रस्तुत करने होते हैं और अगर वह ऐसा नहीं कर पाती है तो उल्टा उसी पर व्याभिचार का मुक़दमा चलाया जा सकता है.

इस क़ानून में संशोधनों को अगर उच्च सदन-सीनेट और राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की मंज़ूरी मिल जाती है तो वो लागू हो जाएंगे.

प्रस्तावित संशोधन में बलात्कार के मामलों में सटीक जाँच-पड़ताल के लिए डीएनए परीक्षणों और अन्य वैज्ञानिक प्रणालियों का सहारा लेने की व्यवस्था की जा रही है.

हालाँकि कुछ मानवाधिकार संगठनों की माँग है कि इस क़ानून को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

संशोधनों में विवाहेतर यौन संबंधों का दोषी पाए जाने पर मृत्युदंड या कोड़े मारने की सज़ा के बजाय पाँच साल की क़ैद की सज़ा या दस हज़ार रुपए के जुर्माने का प्रावधान किया जा रहा है.

नए क़ानून में जजों को यह विवेकाधिकार भी दिया जा रहा है कि वे बलात्कार के किसी मामले का मुक़दमा किसी दीवानी अदालत या शरिया अदालत में चला सकेंगे.

शरिया क़ानून में व्यवस्था है कि अपने साथ बलात्कार होने का आरोप लगाने वाली महिला को चार पुरुषों को गवाह के तौर पर पेश करना होगा और अगर वह ऐसा नहीं कर पाती तो उल्टे उसी पर व्याभिचार का मुक़दमा चलाया जा सकता है.

हुदूद क़ानून का विरोध

इस व्यवस्था की वजह से बलात्कार करने वालों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई कर पाना लगभग असंभव रहा है क्योंकि बलात्कार की घटनाएँ मुश्किल से ही किसी सार्वजनिक स्थान पर होती हैं और ऐसे में चार पुरुष गवाह इकट्ठा कर पाना भी असंभव सा काम है.

इसी साल सितंबर में भी इस क़ानून को संसद में पारित कराने की कोशिश की गई थी लेकिन उसका बड़ा विरोध हुआ था.

धार्मिक पार्टियों ने चेतावनी दी है कि अगर नया क़ानून ग़ैर-इस्लामी हुआ तो और अधिक विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नया विधेयक उनकी मांगों को पूरा कर पाएगा या नहीं.

विधेयक पारित कराने के सरकारी प्रयास को राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के लिए एक कड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है. एक उदार और जागरूक क़िस्म के इस्लाम के प्रति उनकी कटिबद्धता वाले बयान के लिए भी यह एक परीक्षा की घड़ी है.

विधेयक पर होने वाली बहस से एक दिन पहले सूचना मंत्री मोहम्मद अली दुर्रानी ने कहा कि चाहे किसी भी प्रकार का विरोध हो सरकार इस बिल को पारित कराना चाहती है.

लेकिन बीबीसी के कराँची संवाददाता सैयद शोएब हसन के मुताबिक शक्तिशाली धार्मिक लॉबी के भारी विरोध को देखते हुए सरकार ने इस बिल में थोड़ी ढिलाई दे दी है.

हुदूद अध्यादेश

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के मुताबिक यहाँ प्रत्येक दो घंटे में एक महिला के साथ बलात्कार और हर आठ घंटे में एक महिला के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना होती है.

बलात्कार और व्यभिचार के मामले पाकिस्तान में हुदूद अध्यादेश के तहत सुलझाए जाते हैं. यह विवादास्पद इस्लामी क़ानून 1979 में जनरल जिया-उल-हक ने लागू किया था.

महिलाएँ हुदूद अध्यादेश का विरोध करती रही हैं
महिलाएँ हुदूद अध्यादेश का विरोध करती रही हैं

इस क़ानून में व्यभिचार के लिए कोड़े मारने और पत्थर बरसाए जाने जैसी सज़ाओं का प्रावधान है.

महिला सुरक्षा विधेयक पिछले ग्रीष्मकालीन सत्र में भी लाया गया था लेकिन भारी विरोध के बाद संसद का वह सत्र ही स्थगित करना पडा था.

इसके बाद इस बिल को उलेमाओं या इस्लामिक विद्वानों की एक समिति के सामने पुनर्विचार के लिए रखा गया जिसने तीन संशोधनों का सुझाव रखा है.

क़ानून मंत्री वासी जफ़र ने एक टेलीविजन चैनल को बताया कि छह पार्टियों वाले एमएमए इस्लामिक गठबंधन के कुछ प्रस्तावों को इस विधेयक में शामिल कर लिया गया है.

इस विधेयक का असर अगले वर्ष होने वाले चुनावों में भी नज़र आ सकता है.

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