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क्या कहना है यूसीआईएल का | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जादूगोड़ा में बच्चों, महिलाओं और अन्य लोगों में होने वाली बीमारियों के लिए यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को स्वयंसेवी संस्थाएं ज़िम्मेदार ठहराती हैं लेकिन कंपनी का कुछ और ही कहना है. यूसीआईएल हमेशा से कहती रही है कि आदिवासियों की बीमारियों और अन्य मुश्किलों का यूरेनियम के खनन या यूरेनियम के कचरे से कोई लेना देना नहीं है. 1997 में जब परमाणु मामलों के वैज्ञानिक संघमित्रा गडेकर और सुरेंद्र गडेकर ने इस इलाक़े का सर्वेक्षण किया और यह निष्कर्ष निकाला कि लोगों की बीमारियों के लिए यूरेनियम का खनन और कचरे का डाला जाना ज़िम्मेदार है तो यूसीआईएल ने इसका विरोध किया. हालांकि यूसीआईएल ने गडेकर दंपत्ति द्वारा सुझाए गए कई सुझावों को माना भी और लागू भी किया है. रेडियोधर्मी विकिरणों के ख़िलाफ काम करने वाली संस्था जोहार के घनश्याम बिरुली कहते हैं " गडेकर दंपत्ति के सर्वे के बाद हमें पूरा विश्वास हुआ कि यूरेनियम कचरे के कारण ही सारी समस्याएं हो रही हैं. हम चाहते हैं कि कंपनी आबादी के पास कचरा डालना बंद करे. पर्याप्त मुआवजा दे." बिरुली आरोप लगाते हैं कि यूसीआईएल का रवैया धमकाने वाला रहा है और आदिवासी होने के कारण स्थानीय लोगों को अधिक मुश्किलें हो रही हैं.
जब बीबीसी की टीम ने स्वयंसेवी संस्था के आरोपों से जुड़े सवाल यूसीआईएल के सामने रखने चाहे तो अधिकारियों ने इंटरव्यू देने से इंकार कर दिया. हालांकि अनौपचारिक तौर पर यूसीआईएल यह कहती रही है कि आदिवासियों में ये बीमारियां ख़राब खान पान और शराब पीने के कारण होती हैं. अधिकारी उन तमाम लोगों का हवाला देते हैं जिन्हें कोई बीमारी नहीं है और जो खदान में काम करते हैं. प्रबंधन की समर्थक मानी जाने वाली लेबर यूनियन का मत भी कंपनी जैसा ही है. उनके प्रतिनिधि कहते हैं कि जादूगोड़ा में विकिरणों की कोई समस्या नहीं है और बीमारियों की बात अफवाह है. हालांकि 1997 में ही बिहार विधानपरिषद ( उस समय जादूगोड़ा बिहार में आता था मगर अब यह झारखंड राज्य में आता है) की पर्यावरण समिति की टीम भी जादूगोड़ा आई थी और सर्वेक्षण किया था. इस टीम के अध्यक्ष गौतम सागर राणा मानते हैं कि जादूगोड़ा में अभी भी विकिरणों के कारण समस्याएं और प्रबंधन इस पर ध्यान नहीं दे रहा है. राणा ने बीबीसी से बातचीत में कहा " हम जब जादूगोड़ा गए थे तब प्रबंधन ने माना था कि कहीं न कहीं से वो ज़िम्मेदार है और उसके बाद कई क़दम उठाए गए. लोगों को टेलिंग पांड्स से दूर बसाने की बात भी हुई. अगर समस्या नहीं थी तो प्रबंधन इसके लिए क्यों तैयार हुआ. " लेकिन अब यूसीआईएल की योजनाएं कुछ और ही हैं. जादूगोड़ा के आस पास यूरेनियम के छह और खान खुल रहे हैं. साथ ही चार और टेलिंग पांड्स भी बन रहे हैं जहां हज़ारों टन कचरा फेंका जाएगा और इनके पास रहने वाले लोगों के लिए इस कचरे के साथ जीने के अलावा और कोई चारा भी नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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