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बेज़ुबान है गुड़िया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुड़िया सात साल की है. देखने में किसी भी सामान्य बच्ची की तरह लगती है लेकिन उसके पास जाने पर पता चलता है कि वो कितनी तकलीफ़ में है. गुड़िया चल फिर नहीं सकती और न ही बोल सकती है. वो दिन भर बिस्तर पर लेटी रहती है और बस कुछ कुछ आवाज़ें निकाल सकती है. उसे क्या बीमारी है यह बता पाना मुश्किल है. इतना कहा जा सकता है कि वो मानसिक और शारीरिक रुप से अक्षम है. उसके हाथ पैर मुड़े हुए हैं और इस तरह की बीमारियां जादूगोड़ा में आम है. जादूगोड़ा में भारत की एकमात्र यूरेनियम की खान है और यहीं पर खान से निकलने वाला कचरा फेंका भी जाता है. पिता की तकलीफ़ गुडिया के पिता छतुआ दास ऑटोरिक्शा चलाते हैं और उनकी आमदनी 1500 रुपया माहवार है. बच्ची की बीमारी के बारे में वो कहते हैं " मेरी पत्नी को सही समय पर टीके लगे थे. सबकुछ ठीक था लेकिन पता नहीं विकलांग बच्चा क्यों पैदा हुआ. " यह पूछे जाने पर कि क्या रेडियोधर्मी विकिरणों का प्रभाव है तो वो कहते हैं " जादूगोड़ा में स्थिति कुछ ऐसी है कि एक जानवर बंधा पड़ा है जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि वो कौन सा जानवर है. जानवर से मेरा मतलब कचरे से है. कुछ लोग कहते हैं इसका प्रभाव पड़ता है. कुछ कहते हैं नहीं पड़ता. " अपनी बच्ची की बीमारी का क्षमता के अनुसार इलाज कराने वाले छतुआ दास कहते हैं कि हर डॉक्टर उन्हें गुड़िया की बीमारी का अलग अलग कारण बताता है. छतुआ दास की पत्नी को छह गर्भपात हो चुके हैं. वैसे इस इलाक़े में महिलाओं को गर्भपात और आनुवंशिक बीमारियां आम तौर पर पाई जाती हैं. हालांकि यूसीआईएल प्रबंधन का कहना है कि इस तरह की बीमारियों के लिए यूरेनियम की खान को दोष नहीं दिया जा सकता. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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