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श्रीलंका की घड़ियों में अब एक ही समय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अब तक श्रीलंका एक ऐसा देश था जो सिर्फ़ युद्ध के कारण नहीं बँटा था बल्कि समय के आधार पर भी बँटा हुआ था. लेकिन एक दशक बाद पहली बार श्रीलंका में यह बँटवारा ख़त्म हो गया है. ऐसा श्रीलंका सरकार के एक फ़ैसले से हुआ है जिसके अनुसार नए साल से सभी घड़ियाँ आधे घंटे पीछे कर दी गई हैं. यानी ग्रीनिच मान समय यानी जीएमटी से से साढ़े पाँच घंटे आगे. इससे पहले अधिकृत रुप से श्रीलंका ग्रीनिच मान समय से छह घंटे आगे था. हालांकि उन इलाक़ों में जहाँ तमिल विद्रोहियों का कब्ज़ा है पहले भी यह अंतर साढ़े पाँच घंटे का था. यानी सरकार के इस फ़ैसले से तमिल विद्रोहियों वाले इलाक़े में घड़ियों को 'ठीक' करने की ज़रुरत ही नहीं पड़ी. परिवर्तन 14 अप्रैल को तमिल और सिंहला नववर्ष के साथ ये परिवर्तन लागू हो गया है. अब श्रीलंका का टाइम ज़ोन वही है जो 1996 में हुआ करता था. उस समय बिजली की बचत का हवाला देकर श्रीलंका की तत्कालीन राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग ने घड़ियाँ एक घंटे आगे करवा दी थीं. यानी ग्रीनिच मान समय से साढ़े छह घंटे आगे. लेकिन जब लोगों ने इस पर आपत्ति करते हुए कहा कि जब घड़ी में 'सबेरा' होता है तो बाहर बहुत अंधेरा होता है तब इसमें आधे घंटे का परिवर्तन किया गया था. ग्रीनिच मान समय से छह घंटे आगे. अब सरकार ने अपना फ़ैसला फिर पलटते हुए कहा है कि घड़ियाँ आगे बढ़ाने से बिजली की बचत कभी हुई ही नहीं. वहाँ के कुछ बौद्ध साधु इस परिवर्तन को अच्छा मानते हैं क्योंकि श्रीलंका का यह समय उनके कर्मकांड के हिसाब से सुविधाजनक है. वे मानते हैं कि टाइम ज़ोन बदलने की वजह से ही पिछले दस साल देश के लिए अच्छे नहीं रहे. चाहे समय आध्यात्मिक कारणों से बदले या व्यावहारिक कारणों से लेकिन एक बात तय है कि पिछले कई दशकों में शायद पहली बार श्रीलंका सरकार और तमिल विद्रोही किसी बात पर एकमत हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें श्रीलंका में 'समय-भेद' ख़त्म होने के आसार03 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस भिक्षु करेंगे वैज्ञानिकों की मदद01 अक्तूबर, 2003 | विज्ञान पृथ्वी मंगल के क़रीब 27 अगस्त, 2003 | विज्ञान छुट्टियों की बीमारी24 नवंबर, 2002 | विज्ञान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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