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कराची में बस लूट का आँखों देखा हाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
काली सलवार वाले ने ड्राइवर को धक्का देकर स्टीयरिंग संभाल ली, सफ़ेद सलवार वाले ने बस की चिटकनी बंद करते हुए औरतों से कहा, "आराम से सिर झुकाकर बैठी रहो, शोर मत करना वरना ये देखा है...." उसने अपनी कमर में खुंसी हुई पिस्तौल निकाली, औरतों ने ज़ोर से अपने मुंह पर हाथ रख लिया कि कहीं चीख़ न निकल जाए. बस के पिछले हिस्से में जहाँ मर्द बैठे थे, एक काली दाढ़ी वाला गालियाँ बकता हुआ घुसा और वहाँ खड़े एक आदमी की गर्दन पर दो हाथ जड़ दिए, "बैठो कुत्तों फर्श पर." सबने उसकी इस हिदायत पर अमल किया, वह चिल्लाया, "हाथ ऊपर," एक मुसाफ़िर की कमर पर ठोकर मारते हुए वह चीख़ा, "अबे हाथ सिर पर रख." उसने सीट पर बैठे लोगों से कहा, "खिड़की के परदे गिराकर अपनी-अपनी जगह पर आराम से बैठे रहो, हिले तो....ओए तू मुझे क्या देख रहा है..." यह कहते हुए उसने अगली सीट पर बैठे लड़के के मुँह पर तमाचा जड़ दिया. "किसी का हाथ जेब में न जाए, ज़्यादा चौकसी दिखाने की ज़रूरत नहीं है वरना यहीं लिटा दूँगा...चल भाई तू खड़ा हो जा, शाबाश तू घड़ी उतार...मोबाइल कहाँ है...नहीं है..अच्छा इधर सरक...ये क्या है...अपनी...के नीचे रखके बैठा है साले...चल बटुआ दे...चल भई तू खड़ा हो जा...बस तीन सौ रूपए...हम से हरामीपन...". एक चाँटा गूँजा. "मोज़े में एक हज़ार का नोट छिपा रखा है, कायदे आज़म की तस्वीर मोज़े में." एक और चाँटे की आवाज़. "और आप बड़े मियाँ..." बड़े मियाँ ने फ़ौरन हाथ खड़े कर दिए. "तुम में से कंडक्टर कौन है", एक चौदह साल का बच्चा फ़र्श से उठा, "मैं हूँ." "चल बच्चे, कितनी दिहाड़ी लगाई, हिसाब दे." बच्चे ने मुट्ठी में दबी रक़म उसके हवाले कर दी. "अबे जेब से भी निकाल..." बच्चे ने मैले नोटों की गड्डी उसे सौंप दी.
इस सबके बीच बस शहर के व्यस्त इलाक़े से गुज़रती हुई जा रही थी, मैं सबसे पिछली सीट पर खिड़की के पास बैठा था. मैंने शुरू के दो मिनट की गड़बड़ में अपना बटुआ और मोबाइल खिड़की और सीट के बीच की फाँक में गिरा दिया. सिर्फ़ एक परेशानी हो गई कि मैं मोबाइल ऑफ़ करना भूल गया, अगर किसी ने फ़ोन किया तो.... घड़ी और जेब में मौजूद 50 रूपए मैंने दाढ़ी वाले के हवाले कर दिए. उसने मेरी अगली और पिछली जेब की पूरी तलाशी लेने के बाद घूरते हुए कहा, "शक्ल से तो तू खाता-पीता नज़र आता है कुत्ते, जेब में 50 रूपए लिए घूम रहा है." बस अपनी रफ़्तार से चलती रही, बस चलाने वाला लुटेरा ट्रैफ़िक की नियमों का पूरी तरह से पालन करता रहा, पुलिस की गाड़ी हमारे बग़ल से फर्राटे से गुज़र गई, पुलिसवालों ने भी नहीं सोचा कि दिन में बस की खिड़कियों के परदे क्यों गिरे हुए हैं. पिस्तौल वाले ने अपने साथी से कहा, "जो-जो मोबाइल की सिम माँगे उसे दे दो...", दो-तीन हाथ हवा में उठे, "हाथ ऊपर रखो सालों, दे रहा हूँ, डाल देना अपनी....में" थोड़ी दूर चलने के बाद बस सुनसान रास्ते पर आ गई, उन्होंने बस की बत्ती गुल कर दी, ड्राइवर से कहा, "हमारा तुम्हारा साथ यहीं तक, अब अपनी सीट संभालो, होशियारी मत करना, बत्ती बंद करके गाड़ी चलाओ, अगले चौराहे से पहले रूकना मत..वरना..." उसने कहा, "देखो भाई अगर किसी को क़ानून की याद आए तो अगले चौराहे पर पुलिस थाना है और पीछे के चौराहे पर पुलिस चौकी है...जिसको अपनी....वो वहाँ जा सकता है..." इसके बाद तीनों एक-एक करके बस से कूदे, कोच कुछ दूर तक अँधेरे में चलने के बाद कराची शहर में दोबारा दाख़िल हुई...कंडक्टर ने हमेशा की तरह आवाज़ लगानी शुरू कर दी, "उर्दू कॉलेज, उर्दू कॉलेज...हसन एसक्वायर..हसन एसक्वायर...सोहराब गोठ... सोहराब गोठ..." मैंने कंडक्टर से पूछा, "तुम्हें देखकर लगता है कि कोई फ़र्क ही नहीं पड़ा...." उसने कहा, "तीसरी बार लुटी है....सोहराब गोठ....सोहराब गोठ..." | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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