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'उच्च शिक्षा 20 प्रतिशत जनता को मिले' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष सैम पित्रोदा का कहना है कि छह प्रतिशत लोगों को उपलब्ध विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा को 20 प्रतिशत लोगों तक पहुँचाना भारत के लिए अहम चुनौती है. उनके अनुसार ज्ञान आयोग विश्वविद्यालय शिक्षा पर अपनी सिफ़ारिशें अगले महीने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपेगा. रविवार को बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम आपकी बात, बीबीसी के साथ की विशेष कड़ी में दिल्ली से नगेंदर शर्मा और बंगलौर से सुनील रामन के साथ सैम पित्रोदा ने श्रोताओं के सवालों के जवाब दिए. उनका मानना है कि भारतीय कॉलेजों में सीटों को तीन-चार गुना बढ़ाना होगा, निजि विश्वविद्यालय कायम करने होंगे और विदेशी पूँजी निवेश भी सुनिश्चित करना होगा. रोज़गार के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सूचना तकनीक पर आश्रित 'बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग' क्षेत्र केवल तीन लाख नौकरियाँ उपलब्ध करवा पाया है लेकिन भारत के सामने हर साल सौ लाख नौकरियाँ उपलब्ध करवाने की चुनौती है. सवाल-जवाब का सिलसिला इस तरह चला: नगेंदर- क्या भारत असल में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक अग्रणी देश बन रहा है या फिर केवल बड़ी पश्चिमी कंपनियों के लिए सस्ती श्रमशक्ति का स्रोत? सैम पित्रोदा- नहीं हमें अग्रणी देश तो बनना ही है. देखिए, हमारे देश में 50 करोड़ लोग 25 वर्ष से कम आयु के हैं. दुनिया को अभी वही वर्कफ़ोर्स यानि श्रमशक्ति चाहिए. दुनिया में किसी और देश के पास इतनी श्रमशक्ति नहीं है. दुनिया जिस तरह से आगे बढ़ रही है, उसके साथ ही हमें इन्हें भी तैयार करना होगा. तो यह केवल हमारे लिए नहीं है, यह तो पूरी दुनिया के लिए है. बंगलौर से सुनील रामन- हाल ही में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत को अपनी उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा. राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष होने के नाते आप इस दिशा में कैसे आगे बढ़ेंगे? सैम पित्रोदा- हमारे यहाँ उच्च शिक्षा में कई मुद्दे हैं. एक है संख्या. अभी तक हमारे देश में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा केवल छह प्रतिशत लोगों को ही उपलब्ध करा पाने की क्षमता है. हमें इसे 20 प्रतिशत तक बढ़ाना होगा और इसके साथ ही गुणवत्ता का भी विकास करना होगा. नगेंदर- पर क्या आप जो कह रहे हैं, वह व्यावहारिक बात है. ऐसा कर पाना संभव है? सैम पित्रोदा- बिल्कुल व्यावहारिक है. यह तो ऐसी चीज़ है कि जिसके बिना हम आगे बढ़ ही नहीं सकते. यह तो करना ही पड़ेगा और इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं है. कितनी जल्दी कर सकते हैं और कैसे कर सकते हैं, यह हमें सोचना होगा. संख्या बढ़ानी है, गुणवत्ता बढ़ानी है, प्राध्यापकों को प्रशिक्षित करना है, निजी विश्वविद्यालयों की तादाद बढ़ानी है और कॉलेजों में तीन-चार गुना सीटों का प्रावधान करना होगा. विदेशी निवेश लाना होगा, अनुबंध करने होंगे. ऐसे कई तरह के प्रयास करने होंगे. इस बारे में संशोधनों और सिफ़ारिशों पर काम हो रहा है और अगले महीने तक हम रिपोर्ट बनाकर प्रधानमंत्री के पास भेजेंगे. श्रोता- आउटसोर्सिंग से देश को लाभ तो हुआ है पर कुछ ही राज्यों में. उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे तमाम राज्य इस लाभ से वंचित हैं. दूसरी ओर नोएडा जैसे शहर इससे काफ़ी लाभ उठा रहे हैं. क्या कारण है? सैम पित्रोदा- आउटसोर्सिंग आईटी सेक्टर की देन है. जहाँ-जहाँ संस्थागत रूप से आईटी सेक्टर बढ़ा है, वहाँ आउटसोर्सिंग का काम भी बढ़ा है. बंगलौर में आईटी इंडस्ट्री काफ़ी बढ़ी इसीलिए वहाँ आउटसोर्सिंग को भी बढ़ावा मिला पर यह ध्यान रखना होगा कि प्रति वर्ष देश में एक करोड़ रोज़गार पैदा करने होंगे. अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो हम युवा लोगों को काम का अवसर नहीं दे सकेंगे. ज़रूरत प्रतिवर्ष एक करोड़ रोज़गार की है पर आईटी सेक्टर से केवल तीन लाख लोगों को काम मिल पा रहा है. हमें स्वास्थ्य, निर्माण, कृषि, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण करना है. हम आउटसोर्सिंग में कभी एक करोड़ काम पैदा नहीं कर पाएंगे. श्रोता- भारत में व्यावसायिक वृत्तिधारियों की कमी नहीं है पर शोध पर इतना काम नहीं हो रहा है, क्या वजह है? सैम पित्रोदा- पिछले समय में हमारे यहाँ शोध को विश्वविद्यालयों से अलग कर दिया गया. विश्वविद्यालयों में बड़े शोध नहीं हो रहे हैं और शोधकर्ता विश्वविद्यालयों में पढ़ा भी नहीं रहे हैं. हमें विश्वविद्यालयों में शोध को बढ़ाना होगा और शोधकर्ताओं को विश्वविद्यालयों में जगह देनी होगी ताकि विद्यार्थी शोध क्षेत्र में आगे बढ़ें. अभी तो स्थिति यह है कि विश्वविद्यालयों से चार वर्षों की आईटी या इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद लोगों को अच्छी तनख़्वाह पर काम मिल जाता है. इससे वे शोध की ओर नहीं जा रहे हैं. हमें शोध को उनके लिए आकर्षक बनाना होगा. नगेंदर- आप मानते हैं कि आईटी क्षेत्र में बड़ी तादाद में रोज़गार की संभावनाएं नहीं हैं पर पिछले लगभग 15 वर्षों में सरकारों की नीतियों में रोज़गार की इस सामाजिक ज़िम्मेदारी की कमी रही है. ऐसे में क्या आपको नहीं लगता कि युवा वर्ग उसी तरफ़ बढ़ेगा जहाँ उसे काम और अच्छा पैसा मिल रहा है? सैम पित्रोदा- बिल्कुल सच है और युवा लोगों को ऐसा करना भी चाहिए. पहले युवा वर्ग अपने को देखेगा फिर समाज और देश को. हमें उनके लिए शोध को आकर्षक बनाने की ज़रूरत है. नगेंदर-- पर ऐसा कैसे संभव होगा? सैम पित्रोदा- तनख़्वाह बढ़ानी पड़ेगी, सुविधाएं बढ़ानी पड़ेगी और उन्हें बताना पड़ेगा कि इससे देश का भविष्य बेहतर होगा. अगर अभी शोध छात्रों को हम एक हज़ार दे रहे हैं तो स्वाभाविक है कि वे शोध क्षेत्र में नहीं जाएंगे. वे जाएं, इसके लिए हमें शायद 10 हज़ार देने पड़ेंगे. आज़ादी के बाद बहुत कम विश्वविद्यालय थे. उत्पादन के लिए कोई आधार तो था नहीं. हम पर शासन करने वाले हमारा तमाम खनिज वगैरह ले जाते थे और फिर तैयार की गई वस्तुएँ हमें ही अधिक दामों पर बेचते थे. आज़ादी के वक्त हमारे यहाँ दाढ़ी बनाने का ब्लेड तक नहीं बनता था. साठ वर्षों में एक औद्योगिक आधार बना है, विश्वविद्यालय बने और शोध के तमाम केंद्र खोले गए. सीएसआईआर, नाभिकीय शोध, अंतरिक्ष और रक्षा शोक्ष, कृषि और स्वास्थ्य शोध जैसी एक बड़ी सूची है. श्रोता- हमारे यहाँ के युवा 12वीं पास करते ही कॉलसेंटरों में काम करने लग जा रहे हैं. क्या इससे स्तर में गिरावट नहीं आएगी. सैम पित्रोदा- देखिए, हमारे यहाँ इस वक्त केवल तीन लाख लोग ही कॉलसेंटरों में काम कर रहे हैं और हमें एक करोड़ रोज़गार के अवसर चाहिए. तो इनका अनुपात देखें. मीडिया में आउटसोर्सिंग की ज़्यादा चर्चा है इसलिए सबको लगता है कि देश इसी में लगा हुआ है. कोई अंतरिक्ष अनुसंधान या स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी, ऊर्जा आदि में शोध की बात ही नहीं कर रहा है. यह सारा काम चल रहा है पर न तो वह बहुत शहरी तरह का है और न ही बहुत आधुनिक है. बीस वर्ष पहले पूरे देश में 20 लाख फ़ोन कनेक्कशन थे औऱ अब हर महीने 50 लाख फ़ोन लग रहे हैं. देखिए, हम लोग कहाँ से कहाँ तक आ गए हैं. और भी क्षेत्रों में भी तरक्की हुई है पर आउटसोर्सिंग पर जो ध्यान दिया जा रहा है, वह थोड़ा ज़्यादा हो रहा है. नगेंदर- आईटी को प्रचार उसके अच्छे नतीजों के कारण मिला है. आईटी के आलावा बाकी क्षेत्रों में इतने नतीजे क्यों नहीं आ रहे. इनमें भी सुधार हो, इसके लिए क्या बदलाव लाने होंगे? सैम पित्रोदा- इसी को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री ने ज्ञान आयोग का गठन किया है. हम पाँच चीज़ों पर ध्यान दे रहे हैं- शिक्षा, शोध, विज्ञान, ज्ञान का इस्तेमाल, कृषि और स्वास्थ्य और साथ ही इस बात का कि ई-गवर्नेंस के इस्तेमाल से कैसे सरकार के काम को और तेज़ी दी जा सकती है. हमारा ध्यान इस बात पर है कि कैसे और कहाँ ज्ञान का इस्तेमाल हो. देश में इस बात की शुरुआत हुई है, यही एक बड़ी बात है. हम बीज डालेंगे और 10-20 वर्षों में नतीजे सामने आने लगेंगे. सुनील- हाल ही में एक रिपोर्ट आई है जिसके मुताबिक आने वाले कुछ वर्षों में भारत में अच्छे इंजीनियरों की भारी कमी हो जाएगी. माइक्रोसॉफ़्ट कंपनी के अधिकारियों का भी कहना है कि भारत में इंजीनियर तो काफ़ी बड़ी तादाद में तैयार हो रहे हैं पर इनकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. आपको क्या कहना है इस बारे में? सैम पित्रोदा- मैंने पहले ही कहा कि गुणवत्ता और संख्या, दोनों को ही बढ़ाना है. अगले 10 वर्षों में हम दुनिया में सबसे मज़बूत स्थिति में होंगे क्योंकि हमारे पास ऐसे युवाओं की सबसे बड़ी तादाद होगी. अगर इनके स्तर में सुधार नहीं होता है तो इससे पूरी दुनिया को नुकसान होगा. श्रोता- पश्चिमी कंपनियों के लिए हमारे यहाँ काम कर रहे लोगों को वेतन पश्चिमी देशों के नागरिकों के मुकाबले में कम मिलता है. उसी काम के लिए पश्चिमी देशों को अपने यहाँ काफ़ी पैसा देना पड़ता है. क्या यह भारत की श्रम शक्ति का शोषण नहीं है क्योंकि दूसरी ओर जब भारत को पश्चिमी देशों से तकनीकी स्तर पर कुछ आयात करना होता है तो हमें तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. उदाहरण के तौर पर वर्तमान परमाणु समझौतों को ही देखें? सैम पित्रोदा- दो चीज़ों पर ध्यान देने की ज़रूरत है. दुनियाभर के तेज़ द़िमाग लोग अमीरों की समस्याओं का समाधान कर रहे हैं क्योंकि इसके लिए पैसा मिलता है. उन्होंने ग़रीबों की समस्याओं का समाधान नहीं किया है. दूसरा यह कि पिछले 50 वर्षों में जो तकनीकी आई, वह रक्षा क्षेत्र में आई है. ग़रीब देशों के वैज्ञानिकों को कम तनख़्वाह मिल रही है. हालांकि इसमें धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी हो रही है. पहले हमारे यहाँ 100 डॉलर में अच्छे आईटी इंजीनियर मिलते थे, अब 1000 डॉलर में भी मिलना मुश्किल है. अब विदेशों में जो तनख़्वाह है वहीं यहाँ मिलेगी, ऐसा फ़िलहाल तो नहीं हो सकता है, पर सुधार हो रहा है. श्रोता- पहले आउटसोर्सिंग के क्षेत्र में भारत ही था पर अब चीन और फ़िलिपींस में भी आईटी कंपनियां जाने लगी हैं, तो क्या इससे समझा जाए कि भारत इस क्षेत्र में पिछड़ रहा है? सैम पित्रोदा- दुनियाभर में प्रतिस्पर्धा तो है, लोग वैश्विक स्तर पर नतीजों को देखते हैं. अगर हम प्रतिस्पर्धा में आगे नहीं रहे तो चीन और फ़िलिपींस जैसे देश आगे निकल जाएंगे. हमें रोज़गार के और विकल्प भी ढूंढने होंगे. देश केवल आउटसोर्सिंग से नहीं चलेगा. फिर आउटसोर्सिंग से तो हम दूसरों की तकलीफ़ मिटाते हैं पर हमें अपनी भी समस्याएं हल करनी होंगी. पानी, सफ़ाई, ऊर्जा, निर्माण, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भारत आउटसोर्सिंग नहीं कर सकता है. ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि दुनियाभर का आउटसोर्सिंग केवल भारत में ही आएगा. यह ग़लत धारणा है. श्रोता- क्या भारत में वाकई सूचना क्रांति आ गई है या फिर यह विदेशी ताकतों का प्रचार है? सैम पित्रोदा- देखिए, जब 50 लाख फ़ोन हर महीने खप रहे हैं तो सूचना क्रांति तो आ गई है. आज हर किसी के पास फ़ोन है. आपके घरों में खाना बनाने वाले के पास भी फ़ोन है. कोई कहीं भी बात कर सकता है. श्रोता- आउटसोर्सिंग से देश के कुछ शहरों को तो लाभ हुआ है पर ग्रामीण भारत पीछे छूट गया है. क्या इससे समाज में दरार पैदा नहीं हो रही है? सैम पित्रोदा- यह बात सही है कि हमारे शहर दुनिया के आउटसोर्सिंग सेंटर के रूप में विकसित हो रहे हैं. इसी तरह हमारे शहरों के लिए आउटसोर्सिंग का केंद्र हमारा गांव होना चाहिए. दिल्ली जैसे शहर ही तमाम बड़ी कंपनियों के केंद्र क्यों हैं. हमारे गांव न्यूयार्क का आउटसोर्सिंग सेंटर नहीं बनेंगे पर मुंबई का तो बन ही सकते हैं. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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