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शुक्रवार, 07 अक्तूबर, 2005 को 16:15 GMT तक के समाचार
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चुपके-चुपके फैलता जासूसी का कारोबार

जासूसी के तौर-तरीक़े अब काफ़ी बदल गए हैं
अपने बेटे से परेशान माता-पिता जानना चाहते हैं कि स्कूल के नाम पर बेटा आखिर कहाँ जा रहा है. एक बीबी है जो अपने पति के अक्सर गायब होने का राज जानना चाहती है. पहलू बदलती हुई एक नौजवान लड़की, जो शादी से पहले अपनी जिंदगी में अचानक आए प्रेमी का अतीत जान लेना चाहती है.

और ये तमाम लोग किसी थ्रिलर के पात्र नहीं हैं बल्कि वे एक निजी खुफिया कंपनी के दफ्तर में अकसर आने वाले लोग हैं.

माता-पिता जानकर हैरान रह जाते हैं कि उनका बेटा कुछ दोस्तों के साथ एक फ्लैट में अश्लील सीडी देखने में लगा है.

बीबी तलाक का संकल्प लेकर निकल जाती है और वह लड़की इस बात के लिए एजेंसी के मालिक को धन्यवाद देती है कि उन्होंने उसे डूबने से बचा लिया.

शायद इसीलिए 1965 के भारत-पाक युद्ध में वायुसेना के सक्रिय जासूस की भूमिका निभा चुके और डिटेक्टिव नेटवर्क इंडिया प्रा.लि. के प्रबंध निदेशक सुभाष वधावन कहते हैं कि "लोगों की मदद करने का मजा ही कुछ और है." वे पिछले 35 साल से इस काम में लगे हैं.

उनका कहना है कि यह व्यवसाय जो पिछले 20 साल में तीस गुने से भी ज्यादा फैल गया है.

अब उसके ग्राहकों में अमरीकी और यूरोपीय कंपनियां भी हैं. बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) और ट्रेडमार्क की चोरी से लेकर धोखाधड़ी पकड़ने तक की नई संभावनाएं खुल गई हैं.

अब शादी से आगे

वधावन याद करते हैं कि 1977 में जब उन्होंने कामकाज शुरू किया था तो अखबार विज्ञापन छापने को भी राजी नहीं होते थे.

अब जासूसों के पास काफ़ी काम है

निजी खुफिया एजेंसियों के पास अपने टेलीफोन तक नहीं थे, आम तौर पर शादी से जुड़े मसले ही मिला करते थे.

1990 में उदारीकरण के बाद जहां भारत में कार्पोरेट जगत के मामले आने लगे वहीं 11 सितंबर की घटना ने निजी खुफिया एजेंसियों के लिए विकसित दुनिया के दरवाजे खोल दिए.

वधावन के मुताबिक "ट्रेड टावर ध्वंस के बाद निजी खुफिया एजेंसियों की दुनिया भी बदल गई. अमरीका और यूरोप की कंपनियों की ओर से काफी जानकारियां मांगी जाने लगीं. वे किसी भी व्यापारिक करार से पहले लंबी चैकलिस्ट थमा देते हैं, जिसमें 200-250 सवाल होते हैं. जाहिर है इसकी अच्छी खासी फीस मिलती है."

विदेशी कंपनियों की ओर से एक मामले के डेढ़-दो लाख रुपये मिल जाते हैं. भारत में काम कर रही कंपनियां भी ट्रेडमार्क या नकली उत्पाद के मामलों पर एक-डेढ़ लाख रुपये दे देती हैं. हालांकि ज्यादा मामले शादी से पहले और बाद के आते हैं लेकिन उनकी फीस आमतौर पर 5-10 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होती.

यही कारण है कि हर एजेंसी विदेशी कंपनियों के काम लेने में ज्यादा दिलचस्पी रखती हैं. अमरीका के दो संगठनों वर्ल्ड एसोसिएशन आफ डिटेक्टिव्स इंक और काउंसिल आफ इंटरनेशनल इंवेस्टीगेटर्स इंक की सदस्यता अंतरराष्ट्रीय काम दिलाने में अहम भूमिका अदा करती है.

तकनीक के तेज विकास ने निजी खुफिया एजेंसियों को भी काफी चाक चौबंद कर दिया है. कंप्यूटर ने इस काम को नई धार दे दी है.

वधावन बताते हैं "हाल ही में जब बीपीओ उद्योग में सूचनाएं बाहर जाने की खबरें आईं तो खास किस्म के साफ्टवेयर इस्तेमाल किए जाने लगे जो सूचनाओं की चोरी की इत्तला दे सकते हैं. कंप्यूटर की हार्डडिस्क से नष्ट किए डाटा को हासिल करने से लेकर खुफिया वीडियो रिकार्डिंग तक के काम किए जा रहे हैं."

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