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पहले चुनाव से जुड़ा झारखंड का भविष्य | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
झारखंड के पहले विधानसभा चुनाव में प्राय: सभी राजनीतिक दल अंतर्कलह के शिकार हैं. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के घटक दल कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा(झामुमो), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पिछले लोकसभा चुनाव की तरह एक साथ जुटकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(राजग) की सरकार को धर्मनिरपेक्षता वाले मुद्दे पर चुनौती नहीं दे रहे हैं. फिर भी चुनाव से पूर्व ही राजग सरकार की पराजय की घोषणाएँ हवा में गूंज रही है. वामपंथी दलों को छोड़कर बाकी सभी दलों में बागी और असंतुष्ट उम्मीदवार हैं. भाजपा और जनता दल(युनाइटेड) में भी पहले की तरह तालमेल का अभाव है. यद्यपि सभी राजनीतिक दलों ने अपने घोषणा पत्र जारी किए हैं, पर झारखंड के वास्तविक विकास और यहाँ के आदिवासियों की गहरी चिंताएँ बहुत कम राजनीतिक दलों में है. मुख्य मुद्दे झारखंड में यह चुनाव राजग के कुशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध है, पर विरोधी दल इस मुद्दे पर एकजुट नहीं हैं. झारखंड जैसे नए राज्य में आदिवासियों और ग़रीबों का पलायन-विस्थापन, विधि-व्यवस्था की बदतर स्थिति, राजनीतिज्ञ-पुलिस-अपराधी-माफ़िया गठजोड़, जल-जंगल-ज़मीन पर आदिवासियों का अधिकार, खनिज संसाधनों का आदिवासियों और झारखंडवासियों को समुचित लाभ जैसे सवाल अहम हैं. इन समस्याओं के निदान के लिए राजनीतिक दलों में एकता का अभाव है. राजग के चार वर्ष के कार्यकाल में भूख से अनेक मौतें हुई हैं और किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं. राज्य सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में औद्योगिक नीति बनाई जो प्रभावी नहीं हो सकी. पिछले चार वर्षों में दो मुख्यमंत्री बने, मुख्य सचिव और अन्य वरिष्ठ अधिकारी बदले गए. डोमिसाइल तथा कुर्मी को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के मुद्दे पर दोनों मुख्यमंत्रियों ने अलग-अलग क़दम उठाए और लोगों को आपस में बाँटने की कोशिशें कीं. झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार पर कई बार टिप्पणियाँ की और कई राज्यपालों ने भी कुशासन की ओर ध्यान दिलाया. राज्य सरकार ने बच्चों और बूढ़ों तक को पोटा क़ानून के तहत बंद किया. राजग शासनकाल में झारखंड में अमीरों की संख्या बढ़ी. रोज़गार नहीं बढ़ा. नियुक्तियाँ नहीं की गईं. विभाजित मतदाता झारखंड के मतदाता जाति, समूह, सम्प्रदाय में विभाजित हैं. एक जाति, समूह, सम्प्रदाय और धर्म विशेष में भी अनेक प्रत्याशी हैं. एकजुटता के स्थान पर विभाजन प्रमुख है. नक्सली संगठनों ने चुनाव बहिष्कार की घोषणाएँ हैं. उनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित नहीं है. इस नए राज्य का भविष्य इसके पहले चुनाव पर निर्भर करता है कि यह विकास-मार्ग पर अग्रसर होगा या लूट-मार्ग पर. बदलाव की राजनीति से केवल भाकपा(माले) ही जुड़ी हुई दिखती है. इसके विधायक महेन्द्र सिंह की हत्या के बाद गिरिडीह क्षेत्र में इस पार्टी के पक्ष में हवा भी दिखती है. चुनाव के बाद झामुमो और कांग्रेस की सरकार बनने की अधिक संभावना है. मुख्य प्रश्न यह है कि क्या यह चुनाव झारखंड का कायाकल्प करेगा या स्थितियाँ पूर्ववत बनी रहेंगी. |
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