|
350 से अधिक शेरों के मरने की प्रतीक्षा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के अलग-अलग चिड़ियाघरों और उद्यानों के लगभग 350 शेरों को मरने के लिए छोड़ दिया गया है. ये अफ़्रीकी और एशियाई प्रजाति के शेरों के मेल से पैदा हुए संकर प्रजाति के शेर हैं और इनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है और इनके जीन में कई ऐसी समस्याएँ हैं जिससे ये बीमारियों से लड़ नहीं पा रहे हैं. चिड़ियाघरों के केंद्रीय कार्यालय ने इन शेरों को भविष्य में किसी भी तरह के प्रजनन प्रकिया से अलग रखने के आदेश दिए हैं. अधिकारियों का कहना है कि उन्हें आदेश दिए गए हैं कि शेरों की उस पूरी संकर प्रजाति को ख़त्म करना है जो जो विभिन्न प्रजातियों के मेल से पैदा हुई हैं या फिर किसी वैज्ञानिक देखरेख के दो प्रजातियों के संयोग से पैदा हुई हैं. उल्लेखनीय है कि 1970 के दशक के अंत में विभिन्न प्रजातियों के शेरों से संकर प्रजाति पैदा करने का कार्यक्रम शुरु किया गया था. अधिकारियों का कहना है कि बिना किसी वैज्ञानिक देखरेख अफ़्रीकी और एशियाई प्रजाति के शेरों के मेल से संकर प्रजाति पैदा करने की शुरुआत हुई थी. समस्याएँ अधिकारी बताते हैं कि इसका नतीजा ये हुई कि संकर प्रजाति के शेरों में कई समस्याएँ हैं. उनका कहना है कि एक तो इनकी प्रतिरोधक क्षमता कम है दूसरे उनमें जीन संबंधी समस्याएँ भी पैदा हो चुकी हैं.
इसका नतीजा ये हो रहा है कि वे जल्दी ही किसी बीमारी का शिकार हो रहे हैं और फिर बीमारी ठीक भी नहीं हो रही है. विशेषज्ञों का मानना है, "ये संकर प्रजातियाँ चिड़ियाघरों में तब पैदा हुई होंगी जब सर्कस से छुड़ाए गए अफ़्रीकी प्रजाति के शेरों को चिड़ियाघरों में एशिआई शेरों के साथ रख दिया गया." शुरुआती दिनों में चिड़ियाघरों के अधिकारियों ने प्रजातियों को बचाए रखने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और वे दो प्रजातियों का मेल करवाते रहे. पंजाब के चंडीगढ़ के पास के छतबीर चिड़ियाघर के अधिकारी कहते हैं, "जब तक एशियाई शेरों को अलग रखकर इन संकर प्रजातियों को अलग नहीं रखा जाएगा एशियाई शेरों की प्रजातीय शुद्धता को बचाया नहीं जा सकेगा." छतबीर चिड़ियाघर के निदेशक कुलदीप कुमार कहते हैं, "1980 के मध्य से शुरु हुआ एशियाई और अफ़्रीकी शेरों के मेल से इन शरों को कमज़ोर कर दिया और इनके जीन-संरचना को बिगाड़ दिया." बीमार शेर इस चिड़ियाघर में पहले दो शेर हुआ करते थे जो इस संकर प्रजनन के चलते सौ से अधिक हो गई थी. पहले जिस चिड़ियाघर को अपने शानदार शेरों पर गर्व हुआ करता था अब वहाँ बीमार शेरों का जमघट है. इन शेरों की समस्या यह है कि यदि ये एक बार बीमार हुए या इन्हें चोट लग गई तो इनके ठीक होने की संभावना नहीं होती.
आज इस चिड़ियाघर में तीस शेर हैं और सारे ही संकर प्रजाति के हैं. कुलदीप कुमार कहते हैं कि इस समस्या का एक ही हल है कि अब विशुद्ध एशियाई प्रजाति के शेरों से नई पौध तैयार की जाए. वे बताते हैं कि इसके लिए गुजरात के गीर अभयारण्य के एशियाई शेरों का उपयोग करना होगा जिनकी प्रजाति शुद्ध है. तब तक संकर प्रजनन और संकर प्रजाति की जनसंख्या रोकने के लिए नर शेरों की नसबंदी कर दी गई है. जब तक ये प्रजाति ख़त्म नहीं होती तब तक तो छतबीर चिड़िया घर से और उन सभी जगहों से जहाँ इस प्रजाति के शेर हैं उनकी दर्द भरी दहाड़ गूंजती रहेगी. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||