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चिपको की ज़रुरत आज ज़्यादा है - भट्ट | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चंडीप्रसाद भट् चिपको आंदोलन के वो नेता हैं जिन्होंने चिपको के पहले 1973 में ही चमोली के मंडल गांव में लगभग ऐसे ही आंदोलन की शुरूआत की थी. उस समय खेल का सामान बनाने वाली एक कंपनी सिमंड्स वहां पेड़ काटने आई थी.चंडीप्रसाद भट् ने गांव के लोगो को इकट्ठा करके उन्हें पेड़ काटने से रोका. बाद में उन्होंने अलकनंदा घाटी में पूरी शिद्दत से आंदोलन चलाया और आज भी वो इस इलाके में पर्यावरण जागरूकता और पारिस्थितिकी विकास के कामों में लगे हुए हैं. तीस साल पहले हुए चिपको की बातें करते हुए उनकी आंखें अब भी चमक उठती हैं, “वो एक अलग ही जोश था बहनें अपना काम छोड़कर दल के दल बांध जंगल में आ जाती थीं. सुबह से शाम और कभी पूरी-पूरी रात.” वो कहते हैं, "चिपको का मतलब सिर्फ पेड़ों से चिपकना और उन्हें कटने से ही नहीं बचाना था बल्कि हरियाली फैलाना और जल,जंगल ज्ञमीन पर स्थानीय अधिकारों को बनाए रखना भी था.पर्यावरण की समस्यायों को प्रकाश में लाना था." चंडीप्रसाद भट् राष्ट्रीय वन आयोग के सदस्य भी हैं. वो कहते हैं,” चिपको ने पर्यावरण के प्रति एक अभूतपूर्व संवेदना पैदा की. पेड़ों की कटाई तो बंद हुई ही ये आंदोलन का ही दबाव था कि सरकार और अदालतों के व्यवहार में काफी बदलाव आया.लोगों से संबंधित कार्यक्रम बने. 1975 में वन निगम बनाकर सरकार ने निजी ठेकेदारों से वनोपज पर सभी अधिकार ले लिए.” ये पूछे जाने पर कि ये आंदोलन शिथिल क्यों पड़ गया उनका जवाब है,” ये शिथिल नहीं पड़ा है इसका स्वरूप बदल गया है. अब रचनात्मक काम किये जा रहे हैं. हम इको डेवलपमेंट के काम में लगे हैं. पेड़ लगाए जा रहे हैं. इको डेवलपमेंट शिविर लगाए जाते हैं. पंचायत स्तर पर महिला मंगल दल सक्रिय हैं और दबाव भी चल रहा है कि लोगों को केंद्र में रख कर नीति बनाई जाए. प्राकृतिक साधनों पर स्थानीय अधिकारों के लिये हमारी कोशिश चल रही हैं. कभी काम थोड़ा होता है लेकिन चर्चा ज़्यादा हो जाती है. जिस क्षेत्र मे हम काम कर रहे हैं प्रचार नहीं करते हैं.” आज चंडीप्रसाद विकास के जो काम कर रहे हैं उसके लिये उन्हें सरकार से मदद भी मिलती है. इस वजह से उन पर ये आरोप भी लगते हैं कि उन्होंने चिपको का सरकारीकरण कर दिया. इस सवाल पर वो कहते हैं, “स्थितियां बदलती रहती हैं और हम हमेशा टकराव की मुद्रा में नहीं रह सकते.” उनका इशारा इस ओर है भी है कि चिपको का ज़रूरत से ज़्य़ादा महिमामंडन किया गया. वो कहते हैं कि चिपको ऐसा ही था जैसे अंधों के हाथ हाथी किसी के हाथ पांव लगा तो किसी के हाथ पूंछ और हर किसी ने यही समझा कि वही सबसे ज़्यादा सही है. चंडी प्रसाद भट् कहते हैं, " चिपको की ज़रूरत आज कहीं ज्ञ्यादा है, पेड़ों की कटाई उस तरह से तो रूक गई है लेकिन हरे-भरे पेड़ों के लिये ,नंगे पहाड़ों की हरियाली लौटाने के लिये और लोगों को केंद्र में रख कर खेती और पानी की नीति बनाने के लिये चिपको की प्रासंगिकता बनी हुई है." |
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