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घट रही है गधों के मेले की रौनक़ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
देश के प्राचीन गधा मेलों में से एक जयपुर के निकट भावगढ़ बंध्या गर्दभ मेले की रौनक़ अब फीकी पड़ने लगी है. मेले में घोड़ों की आवक ने अपने इन ग़रीब चचेरे भाइयों से मैदान छीन लिया है. गधों की उपेक्षा का हाल यह है कि कोई भी मंत्री संतरी या नेता इस मेले का उदधाटन करने के लिए तैयार नहीं होता. भावगढ़ बंध्या के मेला मैदान से जब गधे समवेत स्वर में हुंकार लगाते हैं तो लगता है गोया वे अपनी व्यथा बयान कर रहे हैं. पूछ घट गई सैकड़ों साल पुराने इस मेले में गधों की ढेंचू-ढेचूँ के अलावा घोड़ों की हिनहिनाहट भी सुनाई पड़ने लगी है.
गधों के व्यापारी मंगल चंद कहते हैं, "मशीन और आधुनिक वाहनों की वजह से गधों की पूछ कम हो गई है." इस मेले में दूर दूर से व्यापारी आते हैं और हफ़्ते भर तक रौनक़ रहती है. लेकिन जब मेले के उदघाटन का मौक़ा आता है तो मंत्री और नेता मुँह फेर लेते हैं. शायद वे गधों के निकट अपनी उपस्थिति के अहसास से झेंप जाते हैं. गधा पालक रामस्वरुप कहते हैं, "हर वक़्त फ़ीता काटने को उत्सुक नेताओं को इस मेले के नाम से परहेज़ क्यों है, हो सकता है उन्हें शर्म आती हो, पर नेताओं को क्यों, गधे तो ख़ुद नेताओं से परहेज़ करते हैं." मेला आयोजन समिति के भगवत सिंह कहते हैं कि नेताओं में यह धारणा बैठ गई है कि जो भी इस मेले का उदघाटन करेगा वह चुनाव हार जाएगा. इस बार भी पशुपालन मंत्री प्रभुलाल सैनी ने उदघाटन से इनकार कर दिया. मेले की दशा पर भगवत सिंह कहते हैं, "कभी लद्दाख़, अफ़ग़ानिस्तान और सिंध तक से यहाँ गधे बिकने के लिए आते थे. लेकिन अब यह सब अतीत की बातें हो गई हैं." राजनीतिज्ञ भले ही इस मेले से परहेज़ करते हों लेकिन चित्रकार एकेश्वर हटवाल हर साल यहाँ आते हैं और अपनी कूची से तस्वीरों में रंग भरते हैं. वे कहते हैं, "मुझे गधों के चित्र बनाना अच्छा लगता है क्योंकि गधा जानवरों में मजदूर है. मेरा इरादा ग़रीब गधा पालकों के लिए एक प्रदर्शनी लगाने का है भले ही यह घाटे का सौदा हो." शाहरुख ख़ान और ऐश्वर्या भी मेले में आपको शाहरुख ख़ान मिलेंगे तो ऐश्वर्या राय भी. चौंकिए नहीं. गधों के मालिक अपने गधों से दुलार करते हैं तो उन्हें इसी तरह के नामों से पुकारते हैं. गधा पालक लालचंद कहते हैं, "हम अपने गधों का नाम शाहरुख, सलमान, माधुरी, बसंती, हेमा जैसी हस्तियों के नाम पर रखते हैं. यह प्यार जताने का एक तरीक़ा है." इतना ही नहीं. गधों की एक सौंदर्य प्रतियोगिता भी होती है. जानवरों के लिए काम करने वाली एक संस्था हेल्प इन सफ़रिंग की राखी शर्मा इस बात से सहमत नहीं कि गधे बेवकूफ़ होते हैं. वे कहती हैं, "यह बेहद मासूम और परिश्रमी प्राणी होता है." उधर गधा पालक गधों की बेक़द्री से दुखी हैं. वे कहते हैं कि राजनीति में तो गधे और घोड़े सब बराबर हैं लेकिन अपने मैदान में घोड़े भारी पड़ रहे हैं. गधों के इस समागम में भांति भांति के गधे थे और सब अपने अपने दुख में दुबले हो रहे थे. लेकिन गधे की पीड़ा तो सिर्फ़ गधा ही समझ सकता है..... |
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