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बुधवार, 20 अक्तूबर, 2004 को 13:18 GMT तक के समाचार
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दो बच्चों के नियम को लेकर विवाद

बच्चे
जनसंख्या नियंत्रण के लिए बनाए गए क़ानून को लेकर विवाद है
जनसंख्या नियंत्रण के सवाल पर भारत में लंबे समय से विवाद चल रहा है. नया विवाद यह है कि क्या दो से अधिक बच्चे वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोकना ठीक है?

पिछले दिनों दिल्ली के भारतीय सामाजिक सस्थान में भारत के भिन्न -भिन्न राज्यों से आए पंचायत प्रतिनिधियों ने पंचायत स्तर पर लागू दो बच्चों के क़ानून को अलोकतांत्रिक ठहराया.

ये क़ानून राजस्थान और हरियाणा में 1994 से लागू है. इसके बाद चार और राज्यों - आंध्रप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा और मध्यप्रदेश में इसे लागू किया गया है.

इस क़ानून के मुताबिक़ वो व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता जिसके क़ानून के अनुसार निर्धारित निश्चित तारीख़ के बाद दो से अधिक बच्चे हो जाएँ. इसके अनुसार अगर किसी के पद रहते दो से अधिक बच्चे होते हैं तो उसे पद से हटाने का भी प्रावधान है.

जहाँ तक दो बच्चों वाले क़ानून को पंचायत में लागू करने की बात है, पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि एक तो यह व्यावहारिक नहीं दूसरा लोकतांत्रिक रुप में भी ग़लत है.

महिलाओं पर असर

सविंधान के 73वें संशोधन के बाद पंचायत में महिलाओं की भागीदारी 33 फ़ीसदी तक कर दी गई है.

महिलाएँ
इस क़ानून से सबसे अधिक नुक़सान महिलाओं को होने की बात कही जा रही है

विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत दो बच्चों वाले नियम का सबसे ज़्यादा असर महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी पर होगा.

उनका कहना है कि अक्सर महिलाओं, ख़ासतौर पर ग्रामीण महिलाओं के पास परिवार नियोजन के साधन अपनाने का अधिकार नहीं होता.

ऐसी स्थिति में पति की मर्ज़ी पर निर्भर महिलाओं पर इस नियम का ख़ासा असर पड़ेगा.

एक स्वयंसेवी संस्था में कार्य करने वाली पल्लवी का कहना है, "पितृ सत्तात्मक समाज अब भी है जहाँ पर लड़के की चाह सबसे ऊपर रहती है."

"सिर्फ़ दो बच्चों वाले क़ानून की स्थिति में अगर पहली लड़की हो गई है तो आपको दूसरा लड़का चाहिए. दूसरा लड़का चाहिए तो आप अल्ट्रासाउंड करवाएंगे और फिर गर्भपात कराएंगे जिससे कन्याभ्रूण हत्या होगी."

पल्लवी कहती हैं, " हम नसबंदी आदि के जो साधन उपलब्ध करवा रहे हैं वो कितने कारगर हैं ये भी देखना होगा. हमारे साथ एक महिला आई हैं और कई ऐसी महिलाए हैं जिन्होंने नसबंदी करवाई है और वह नाकाम हो गई. ऐसी स्थिति में अगर कोई क़ानून लागू करें तो उसके आगे-पीछे सोच लें."

नीति का सवाल

भारत की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति-2000 में भी बलपूर्वक जनसंख्या बढ़ोत्तरी को रोकने के बजाय स्वेछा से अपनाने का विकल्प दिया गया है. साथ ही एक मज़बूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की बात भी कही गई है.

जानकारों का मानना है कि दो बच्चों की नीति दरअसल जनसंख्या नीति के इस सिद्धांत की अनदेखी है.

 जितनी औरतें भारत में गर्भपात के कारण मरती हैं उतनी यूरोप में एक साल में नहीं मरतीं और अगर दूसरे शब्दों में इसे कहा जाए तो भारत में जितनी औरतें एक साल में मरती हैं वह इतनी हैं जैसे कि 300 सौ हवाई दुर्घटनाएँ एक साल में हो जाएँ
शबाना आज़मी

इस विषय पर काम कर रहीं अभिनेत्री शबाना आज़मी कहती हैं, "इस पर जो सरकार की नीति है उसे लागू करने की ज़रूरत है और इसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की ज़रुरत है."

वो कहती हैं, "हम भी चाहते हैं लोगों को ऐसा विकल्प मिले जिसके बारे में उनके पास जानकारी हो. लोगों को विकल्प मिले कि वह किस तरह के परिवार नियोजन साधन अपनाना चाहते हैं. अगर स्वास्थ्य सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो यह कैसे मुमकिन है."

"कुछ आँकड़े मैं गिनाना चाहूंगी, जितनी औरतें भारत में गर्भपात के कारण मरती हैं उतनी यूरोप में एक साल में नहीं मरतीं. और अगर दूसरे शब्दों में इसे कहा जाए तो भारत में जितनी औरतें एक साल में मरती हैं वह इतनी है जैसेकि 300 सौ हवाई दुर्घटनाएँ एक साल में हो जाएँ."

वर्जना

वही इस नियम का समर्थन कर रहे जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय जनसख्या नीति-2000 के अनुसार दस साल में जनसंख्या का स्थायीकरण शुरू हो जाना चाहिए और 2045 में जनसंख्या स्थायीकरण पूरा हो जाना चाहिए और ये तभी संभव है जब केवल दो बच्चों का परिवार हो.

 यदि हम बड़े परिवार की बात करते हैं तो हम कभी भी जनसंख्या का स्थायीकरण नहीं कर सकते. हमने देखा कि चीन में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी. परिवार नियोजन जब वहाँ चलाया गया तो वहाँ पर परिवार का आकार छोटा करते-करते एक बच्चे तक पहुँच गए. हालांकि कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए. लेकिन वहाँ जनसंख्या का स्थायीकरण हुआ
ज्ञानेंद्र, जनसंख्या विशेषज्ञ

जनसख्या विशेषज्ञ ज्ञानेन्द्र का कहना है, "यदि हम बड़े परिवार की बात करते हैं तो हम कभी भी जनसंख्या का स्थायीकरण नहीं कर सकते. हमने देखा कि चीन में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी. परिवार नियोजन जब वहाँ चलाया गया तो वहाँ पर परिवार का आकार छोटा करते-करते एक बच्चे तक पहुँच गए. हालांकि कुछ दुष्परिणाम भी सामने आए. लेकिन वहाँ जनसंख्या का स्थायीकरण हुआ और जनसंख्या के स्थायीकरण का विकास से सीधा संबंध है. बंगलादेश में भी अब से 30 साल पहले आबादी तेज़ गति से बढ़ रही थी. छोटे परिवार का वहाँ नारा दिया गया और जनसंख्या अब वहाँ रूक गई है."

इस फैसले पर बहस का नया दौर शुरू हो गया है.

क़ानून के जानकार चुनाव लड़ने के अधिकार को उतना ही महत्व देते हैं जितना की चुनाव में वोट डालने के मौलिक अधिकार को.

वे मानते हैं कि दो से अधिक बच्चों के माता-पिता पर चुनाव लड़ने पर पाबंदी एक तरह से लोकतंत्र की जड़ें खोखली कर सकती है.

वह भी ऐसे आधार पर जो बरसों से विवादित रहा है.

उनका कहना है कि 70 के दशक में सरकार द्वारा जबरन परिवार नियोजन का अभियान चलाया गया जिसमें पूरे परिवार नियोजन की कोशिशों पर बुरा प्रभाव पड़ा. इसका प्रभाव इतना गहरा था कि जनसंख्या नियंत्रण एक वर्जित धारणा की तरह हो गया.

इतनी अधिक वर्जना कि अभी तक किसी भी राजनैतिक पार्टी ने इसे अपनी पार्टी घोषणा पत्र में शामिल नहीं किया है.

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