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महाराष्ट्र में दलित राजनीतिक समीकरण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार का शोर थम गया है लेकिन जो बात साफ़ हो रही है वो ये कि न तो शिवसेना-भारतीय जनता पार्टी और न ही कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन आसानी से बहुमत पाने की स्थिति में है. इसके पीछे प्रमुख कारण हैं बहुजन समाज पार्टी, लोकजनशक्ति, रिपब्लिकन पार्टी के प्रकाश अम्बेडकर और जोगिन्दर कवाले धड़े का किसी गठबंधन का हिस्सा न होना. ये सभी दल दोनों प्रमुख गठबंधनों के लिए सरदर्द बने रहे हैं. महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में दलित मतदाता हैं और अन्य राज्यों की तुलना में ये अधिक पढ़े-लिखे और जागरुक हैं क्योंकि महात्मा गांधी और भीमराव अम्बेडकर दोनों ने पिछड़ों की शिक्षा पर ख़ासा ज़ोर दिया था. उनकी शक्ति का अंदाज़ा इस बात से लगता है कि सभी प्रमुख दलों में दलित प्रतिनिधित्व बढ़ा है. दैनिक भास्कर के नागपुर संस्करण के स्थानीय संपादक प्रकाश दुबे कहते हैं, "इस बार हो ये रहा है कि जो दूसरी पार्टियाँ हैं उसमें भी जो दलित नेतृत्व है उसने भी अपनी ताक़त दिखाने की कोशिश की है. अभी तक तो लोग मानते थे कि रिपब्लिकन पार्टियों से दलित जुड़े हैं. लेकिन लोकसभा चुनावों में रिपब्लिकन पार्टियों को जिस तरह का झटका लगा है उसके बाद बाक़ी दलों के दलित उम्मीदवारों की इच्छाएँ जाग गईं." दलित नेतृत्व का सवाल पर क्या दलित शक्ति जिन्हें डॉ. भीम राव अम्बेडकर के कारण भीम शक्ति कहा जाता है इसलिए सत्ता में उतना असर नहीं दिखा पाई कि दलित कई धड़ों-खेमों में बट गए? इंडियन जस्टिस पार्टी के उदित राज जिनकी पार्टी पहली बार महाराष्ट्र चुनाव में हिस्सा ले रही है इसे सही नहीं मानते, " एक दलित आवाज़ होने का मतलब है जनतंत्र की मूल भावना को ख़त्म करना. जैसे मराठों में कई टुकड़े हैं और कई धड़े हैं इसी तरह ये दलितों में भी स्वाभाविक है. स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा के बिना उनकी ताक़त नहीं बढ़ सकता." पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दलित नेतृत्व में अंदरुनी कलह, स्वयं के लिए सत्ता का मोह और नोट और वोट बटोरने की लालसा ने मतदाता को नाराज़ किया है और दलित नेतृत्व और दलों की गंभीरता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया है. महाराष्ट्र के कई दलित वोटरों से बात करने पर एक ही बात सामने आई कि वे मानते हैं कि दलितों को राजनीतिक दल वोट बैंक की तरह उपयोग करते हैं उनको देता कोई कुछ नहीं. दलित नेतृत्व भी बाकी दलितों को आगे बढ़ने में ज़्यादा रूचि नहीं दिखाते जैसा कि मुख्यधारा में पिछड़ों की राजनीति करने वाले करते रहे हैं. विभाजन सच्चाई ये भी है कि डॉ. अम्बेडकर की कर्मभूमि में यहाँ बड़ी संख्या में मतदाताओं और दलितों की आवाज़ बने रिपब्लिकन दल इतने हिस्सों में बंट गए हैं कि उनकी गिनती कर पाना मुश्किल है. पर रिपब्लिकन पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आए और नागपुर उत्तर से विधायक नीतिन राउत इसे सही नहीं मानते, "रिपब्लिक पार्टी के धड़े ज़रुर हुए हैं. हो सकता है कि किसी का व्यक्तिगत स्वार्थ रहा होगा या उनके पास कोई योजना नहीं रही होगी लेकिन दलित मानसिक तौर पर अभी भी संगठित हैं वे किसी भी दिन एक हो जाएँगे और किसी को पता नहीं चलेगा." वहीं प्रकाश दुबे का मानना है कि अपने नेतृत्व की सत्ता की लालसा को लम्बे समय से देख रहे दलित मतदाता सोचने लगे हैं कि वे इन नेताओँ की बजाए क्यों न स्वयं सत्ता का हिस्सा बन जाएँ. वैसे भी रिपब्लिकन पार्टियाँ मुख्य दलों की बी-सी-डी टीम बन गई है. साथ ही इन चुनावों में बहुजन समाज पार्टी ने 288 में से 272 में अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं जिसने सभी पार्टियों की चिन्ता बढ़ाई है. वे कहते हैं, " जो लोग ये मान कर चलते थे कि ये एक ऐसी पार्टी है जो दो-चार-आठ दस जगह हमारे उम्मीदवारों को तक़लीफ़ पहुँचा सकती है उसके सामने सबसे बड़ा संकट ये हैं कि अगर उनको थोड़े वोट भी मिल गए तो सारे समीकरण गड़बड़ा जाएँगे. दूसरा बहुजन समाज पार्टी ने दाँव खेला कि उसने सभी पार्टी से आए हुए लोगों को टिकट दी है इससे ये नहीं हो सकता कि कोई दल ये दावा करे कि उसके वोटों पर असर नहीं पड़ेगा." समझौता यानी महाराष्ट्र में भीम शक्ति को भी वही मर्ज़ लग गया है जो कि मुख्यधारा के किसी भी राजनीतिक दल को हो जाता है- सत्ता में बने रहने के लिए अपने विचारधारा और आदर्शों के साथ समझौता करना. इस धड़े में ज्योतिबा फूले, अम्बेडकर, साहू महाराज की सीख पाकर भूमि सुधार, रोज़गार, खाद्य सुरक्षा, जंगलों पर अधिकार जैसे मूलभूत अधिकारों की लड़ाई को तिलांजलि दे दलित नेतृत्व सत्ता की दौड़ में शामिल हो गया है. दलित वोट की क़ीमत समझ सभी दल उन्हें लुभाने में भी जुटे रहे. आम दलित वोट किधर पड़े हैं इसी से महाराष्ट्र की भावी राजनीति की दिशा तय होगी. |
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